China's conspiracy : पूर्वोत्तर को चीन की साजिश से बचाने के लिए उठाने होंगे ये कदम

-चीन यहां के लोगों की भावना भडक़ाकर कुचक्र रचता रहता है
-22 किलोमीटर चौड़े चिकन नेक या सिलिगुड़ी कॉरिडोर के उस पार पूर्वोत्तर में 272 जनजातियों के साढ़े चार करोड़ नागरिक रहते हैं।
-02 लाख 55 हजार 511 वर्ग किमी क्षेत्रफल है पूर्वोत्तर का, जो देश के कुल क्षेत्रफल का सात फीसदी है। 400 से अधिक भाषा-बोलियां हैं यहां।

अरुणाचल प्रदेश सहित पूर्वोत्तर के सीमांत राज्यों पर अरसे से चीन कुटिल चालें चलता रहा है। एक सितंबर को अरुणाचल प्रदेश से चीनी सेना ने पांच भारतीय युवाओं को अगवा कर लिया, जिन्हें बाद में छोड़ दिया गया। भू-राजनीतिक दृष्टि से इस इलाके पर चीन की नजर काफी पहले से है। यहां के लोग भारतीय हितों को सर्वोपरि देखते हैं, लेकिन सैन्यकरण और सुरक्षा को लेकर आ रही परेशानियों को दूर कर विश्वास बहाली बड़ी जरूरत है। क्योंकि चीन, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश के नागरिकों को भावनात्मक रूप से उकसाने के प्रयास करता रहा है। चीन, म्यांमार, भूटान, नेपाल और बांग्लादेश से जुड़े इस संवेदनशील क्षेत्र की धार्मिक विविधता अपने आप में अनूठी है।
स्थानीय विद्रोहियों को समाप्त करने के लिए भारत सरकार ने 1958 में यहां अफस्पा (सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम) लागू किया था। इससे काफी हद तक विद्रोह पर काबू भी पाया गया, लेकिन पूर्वोत्तर के लोगों से निकटता और जरूरी है। क्योंकि भौगोलिक रूप से चिकन नेक यानी सिलिगुड़ी कॉरिडोर से ऊपर का हिस्सा सांस्कृतिक रूप से देश से कटा हुआ लगता है। लोगों के भरोसे को मजबूत करने के लिए इस सांस्कृतिक अंतर को दूर करना जरूरी है। तीन वर्ष पहले डोकलाम विवाद भी चीन का इसी चिकन नेक तक पहुंचाने का प्रयास था।

ये घटनाएं दर्शाती हैं, चीन पूर्वोत्तर में फैला रहा है अशांति
चीन एक ओर पैंगॉन्ग झील और अन्य मोर्चों पर लगातार अपनी तैनाती बढ़ा रहा है तो दूसरी ओर भारत में अशांति फैलाने का प्रयास कर रहा है। पिछले दिनों पूर्वोत्तर राज्यों में चीन की शह पर एकाएक उग्रवादी संगठनों की भाषा बदल गई। उल्फा प्रमुख परेश बरुआ ने तो चीन के समर्थन में वीडियो तक जारी कर दिया, तो नगालैंड के उग्रवादी समूह एनएससीएन ने नगालैंड शांति वार्ता पर सवाल खड़े किए। इसी तरह अरुणाचल प्रदेश के तवांग में पिछले दिनों चीन के इशारे पर तवांग को अलग करने की मांग उठना इस बात के संकेत है कि पूर्वोत्तर में विश्वास का माहौल जरूरी है।

पाठ्यक्रमों में जुड़े यहां का गौरवशाली अतीत
नागरिकता रजिस्टर में जिन 20 लाख लोगों का नाम नहीं है, उनमें सात लाख के करीब असम और अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में रहते हैं। यहां के नागरिक कभी खुद को देश से अलग न समझें, इसके लिए भारत ने नस्लीय भेदभाव उन्मूलन के लिए 1967 में यूएन कन्वेंशन पर हस्ताक्षर किए थे। अब समय आ गया है कि इसे कानून का दर्जा दिया जाए। बहुसंस्कृति, जाति और धर्म वाले देश के रूप में भारत की छवि पूरी दुनिया में एक आदर्श राष्ट्र के रूप में होगी। साथ ही पूर्वोत्तर की संस्कृति से पूरे देश को जोडऩे के लिए और प्रयासों की आवश्यकता है। इसके लिए पाठ्यक्रमों में यहां के गौरवशाली अतीत और समृद्ध विरासत को शामिल किया जाना चाहिए। जैसे द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान वर्ष 1944 में हुए कोहिमा वार में यहां के वीर सपूतों ने देश के लिए अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया। इस युद्ध में ब्रिटेन की तरफ से युद्ध लड़ते हुए भारतीय सेना ने जापानी सैनिकों के छक्के छुड़ा दिए थे।

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