भारत में समलैंगिकता अब अपराध नहीं, सीजेआई बोले- उनको भी इज्‍जत से जीने का हक

भारत में समलैंगिकता अब अपराध नहीं, सीजेआई बोले- उनको भी इज्‍जत से जीने का हक

Dhirendra Kumar Mishra | Publish: Sep, 06 2018 08:05:09 AM (IST) | Updated: Sep, 06 2018 12:02:12 PM (IST) इंडिया की अन्‍य खबरें

हर नागरिक के लिए समलैंगिकता अपराध या एक अधिकार के लिहाज से आज का दिन अहम है।

नई दिल्‍ली। देश की शीर्ष अदालत (सुप्रीम कोर्ट) भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 377 की संवैधानिक वैधता पर आज फैसला सुनाएगा। इससे पहले जुलाई में कोर्ट ने चार दिन की सुनवाई के बाद 17 जुलाई को फैसला सुरक्षित रख लिया था। समलैंगिकता जैसे अहम मसलों पर फैसला आने की वजह से देश और दुनिया के लोगों की नजर सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हुई है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने नौ जुलाई को भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के तहत समलैंगिकता एक अपराध है पर सुनवाई को स्‍थगित करने की मांग खारिज कर दी थी। सुनवाई स्थगित करने की मांग केंद्र सरकार की ओर से की गई थी।

पांच जजों की बेंच
इस अहम मसले पर सुनवाई के लिए सर्वोच्च न्यायालय के पांच जजों की बेंच की देखरेख में सुनवाई पूरी हुई थी। सीजेआई दीपक मिश्रा के नेतृत्‍व में गठित इस बेंच का फैसला आज आने की उम्‍मीद है। इस बेंच में न्यायमूर्ति सीजेआई सहित रोहिंटन फली नरीमन, न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा, न्यायमूर्ति एएम खानविलकर और न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ सुनवाई कर रहे हैं ।

चार दिन चली थी सुनवाई
सहमति से समलैंगिक यौनाचार को अपराध की श्रेणी में रखने वाली धारा 377 पर चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने 10 जुलाई को सुनवाई शुरू की थी और चार दिन की सुनवाई के बाद कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया। पीठ ने सभी पक्षकारों को अपने-अपने दावों के समर्थन में 20 जुलाई तक लिखित दलीलें पेश करने को कहा था। उम्मीद जताई जा रही थी कि इस मामले में दो अक्टूबर से पहले ही फैसला आने की संभावना है क्योंकि उस दिन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा सेवानिवृत्त हो रहे हैं।

अभी तक समलैंगिकता एक अपराध
भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के तहत समलैंगिकता एक अपराध है। यह आईपीसी की धारा 377 के अप्राकृतिक (अननैचुरल) यौन संबंध को गैरकानूनी ठहराता है। इस धारा के तहत दो लोग आपसी सहमति या असहमति से अप्राकृतिक संबंध बनाते हैं और दोषी पाए जाते हैं उनपर दस साल की सजा व जुर्माने का प्रावधान है। बता दें कि सहमति से 2 पुरुषों, स्त्रियों और समलैंगिकों के बीच यौन संबंध भी इसके दायरे में आता है।

केंद्र ने अदालत पर छोड़ा
आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने नौ जुलाई को धारा 377 की सुनवाई को स्थगित करने से की मांग को खारिज कर दिया था। संविधान पीठ द्वारा भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के विरुद्ध याचिकाओं पर सुनवाई स्थगित करने की मांग केंद्र सरकार की ओर से की गई थी। जिसपर शीर्ष अदालत ने याचिका खारिज कर दी। केंद्र सरकार ने समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर किया जाए या नहीं इसका फैसला देश की शीर्ष अदालत पर छोड़ दिया है। वहीं इससे पहले केंद्र ने मामले के संबंध में जवाब दाखिल करने के लिए अदालत से समय मांगा, जिसके बाद प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति ए.एम. खानविलकर और न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ ने मामले को स्थगित करने से इनकार कर दिया। इससे पहले सर्वोच्च न्यायालय ने 2013 में समलैंगिक यौन संबंधों को दोबारा गैर कानूनी बनाए जाने के पक्ष में फैसला दिया था, जिसके बाद कई प्रसिद्ध नागरिकों और एनजीओ नाज फाउंडेशन ने इस फैसले को चुनौती दी थी। इन याचिकाओं को सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान पीठ के पास भेज दिया था। शीर्ष न्यायालय ने आठ जनवरी को कहा था कि वह धारा 377 पर दिए फैसले की दोबारा समीक्षा करेगा और कहा था कि यदि समाज के कुछ लोग अपनी इच्छानुसार साथ रहना चाहते हैं, तो उन्हें डर के माहौल में नहीं रहना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में 2013 में दिए अपने फैसले में दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा दो जुलाई, 2009 को दिए फैसले को खारिज कर दिया था। दिल्ली उच्च न्यायालय ने समलैंगिक सैक्स को अपराध की श्रेणी से बाहर करने के पक्ष में फैसला सुनाया था।

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