दुनिया के मोस्ट वांटेड आतंकी के बॉडीगार्ड को इस देश की सरकार ने रखा नौकरी पर

सामी ए ट्यूनीशिया का नागरिक है और जर्मनी में 1997 से रहा रहा है। साल 2000 में अफ़ग़ानिस्तान में कई महीनों तक कुख्यात आतंकी के साथ काम किया।

नई दिल्ली। कुख्यात आतंकी ओसामा बिन लादेन की मौत के सात साल बाद भी उसे जुड़े कई रहस्य सामने आते रहते हैं। नए मामले में ओसामा के बॉडीगार्ड रहे एक व्यक्ति को जर्मन सरकार ने नौकरी पर रखा हुआ है। उसे 95 हजार रुपए प्रति माह का वेतन मिलता है। जर्मनी दक्षिणपंथी पार्टी अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी ने यह खुलासा किया है। यह व्यक्ति ट्यूनीशिया का नागरिक है और जर्मनी में 1997 से रहा रहा है। उसका नाम सामी ए बताया गया है। जर्मनी की मीडिया ने उसके नाम को प्रकाशित नहीं किया है। हालांकि, सामी ए ने जिहादियों से किसी तरह के संबंध से इनकार किया है। उन्हें प्रताड़ना का सामना न करना पड़े, इस डर से उन्हें वापस ट्यूनीशिया नहीं भेजा गया था।

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2001 में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुआ हमला

आतंकी ओसामा बिन लादेन अल कायदा जिहादी नेटवर्क का प्रमुख था। साल 2001 में अमरीका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले को उसी ने अंजाम दिया था। दस साल बाद 2011 में उन्हें अमरीकी सैनिकों के एक विशेष दल ने पाकिस्तान में गोली मार दी थी। 9/11 हमले में शामिल कम से कम तीन आत्मघाती पायलट उत्तर जर्मनी के हमबर्ग से चलने वाले अलक़ायदा के नेटवर्क के सदस्य थे। जर्मनी में साल 2015 में आतंकवाद विरोधी जांच में पेश हुए गवाहों के मुताबिक़, सामी ए साल 2000 में अफ़ग़ानिस्तान में कई महीनों तक ओसामा बिन लादेन के बॉडीगार्ड रहे थे। इस आरोप को सामी ए ने इनक़ार किया था लेकिन जजों ने गवाहों की बात पर विश्वास जताया था।
टेक्निकल कोर्स की पढ़ाई की

साल 2006 में इस बात की भी जांच की गई थी कि सामी ए का अलक़ायदा से कथित संबंध था लेकिन उन पर किसी तरह की कार्रवाई नहीं हुई थी। सामी ए जर्मनी मूल की अपनी पत्नी और चार बच्चे के साथ बोकम शहर में रहते हैं। यह शहर पश्चिमी जर्मनी में स्थित है। साल 1999 में अस्थायी तौर पर रहने की इजाज़त मिलने के बाद उन्होंने कई टेक्निकल कोर्स की पढ़ाई की और 2005 में वो बोकम चले गए। सामी ए के साल 2007 में उनके शरण के आवेदन को अस्वीकार यह कहकर कर दिया गया था कि वह सुरक्षा के लिए ख़तरा हैं। उन्हें हर दिन पुलिस स्टेशन में हाज़िरी लगानी होती थी। इस दौरान उनसे काफी पूछताछ की गई। तब जाकर उन्हें शरण मिल सकी।

 

अमित कुमार बाजपेयी
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