सूडान में संकट: क्या किसी समझौते तक पहुंचेंगे सेना और प्रदर्शनकारी?

सूडान में संकट: क्या किसी समझौते तक पहुंचेंगे सेना और प्रदर्शनकारी?

Siddharth Priyadarshi | Publish: Apr, 15 2019 02:22:22 PM (IST) | Updated: Apr, 15 2019 04:21:41 PM (IST) विश्‍व की अन्‍य खबरें

  • सत्ता के संक्रमण से गुजर रहा है सूडान
  • पूर्व राष्ट्रपति बशीर की गिरफ्तारी के बाद सेना ने संभाली थी सत्ता
  • इब्न औफ के इस्तीफे के बाद लेफ्टिनेंट जनरल अल-बुरहान बने सैन्य परिषद के प्रमुख

खार्तूम। सूडान में पूर्व राष्ट्रपति उमर अल-बशीर के तख्तपलट के बाद देश कई संकटों का सामना कर रहा है। हालांकि बशीर के जाने को एक आम सहमति मिली हुई है लेकिन सेना के सत्ता पर काबिज होने के बाद देश के राजनीतिक हालात में अनिश्चितता बनी हुई है। उमर अल-बशीर के 30 साल के शासन के खत्म होने से पहले सूडान में लगभग चार महीने तक जोरदार विरोध प्रदर्शन हुए। लेकिन अल-बशीर के बाद आई नई सत्ता के खिलाफ खड़े होने में प्रदर्शनकारियों को 24 घंटे से भी का वक्त लगा। शुक्रवार की शाम को जनरल इब्न औफ ने लेफ्टिनेंट जनरल अब्देलफतह अल-बुरहान को देश की सत्ताधारी सैन्य परिषद का नेतृत्व करने के लिए नामित किया। बता दें कि एक दिन पहले ही जनरल इब्न औफ ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था।

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सेना और आम लोगों में भरोसे का संकट

अल-बशीर के करीबी सहयोगी इब्न औफ की विदाई ने राजधानी खार्तूम में हजारों लोगों के बीच जश्न की एक लहर फैला दी। सड़कों पर सार्वजनिक रूप से खुशी मनाई गई जिसमें हजारों लोग शामिल थे। लोगों के उपद्रव से बचने के लिए सेना और राष्ट्रपति आवास मुख्यालय के बाहर कर्फ्यू लगा दिया गया है। इब्न औफ के इस्तीफे के बाद प्रदर्शनकारियों ने जमकर नारेबाजी की। दो साल की संक्रमणकालीन सैन्य परिषद की स्थापना के लिए इब्न औफ की घोषणा के बाद लोगों में अविश्वास और गुस्से की लहर दौड़ गई थी क्योंकि लम्बी क्रांति के बाद लोग खुद को ठगा हुआ महसूस करने लगे थे। शनिवार को राष्ट्र के लिए अपने पहले टेलिविजन संबोधन में नए प्रमुख अल-बुरहान ने लोगो के साथ नरमी बरतने के संकेत दिए।

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समझौते के कितने आसार

नए काउंसिल प्रमुख, जिन्हें माना जाता है कि राजनीतिक रूप से अल-बशीर या इब्न औफ के बाद अधिक लोकप्रिय माना जा रहा है, उन्होंने कहा है कि सैन्य शासन से नागरिक-नेतृत्व वाले शासन में संक्रमण अभी चल रहा है और अगले दो साल तक जारी रह सकता है। इसके लिए राजनीतिक दलों और नागरिक समाज समूहों को सेना के साथ बातचीत के लिए बुलाया गया है। बदलाव के दौर से गुजर रहे प्रशासन ने नागरिकों को होने वाले नए फैसलों की जानकारी देने का ऐलान किया है। सेना का कहना है, "30 वर्षों के बाद, एक असैनिक सरकार को सत्ता सौंपना लगभग असंभव है। दोनों के बीच का गठबंधन सभी के लिए सबसे सुरक्षित और सबसे अच्छा विकल्प है। वे दोनों एक-दूसरे को रोककर रखेंगे।" दरअसल शनिवार को इस मामले पर कई दौर की वार्ता हुई। इस वार्ता में आयोजकों ने सैन्य नेताओं के सामने कई मांगों को प्रस्तुत किया, जिसमें सशस्त्र बलों के संरक्षण में चार साल की नागरिक सरकार का गठन भी शामिल था। रविवार को सैन्य परिषद ने सरकार का नेतृत्व करने के लिए "किसी स्वतंत्र देशभक्त व्यक्ति" की पहचान करने के लिए एक समझौते का आह्वान किया। लेकिन लोगों का आरोप है कि देश पर पकड़ बनाए रखने के लिए सेना आंतरिक और रक्षा मंत्रालयों को नहीं छोड़ना चाहती।

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क्या होगा भविष्य

जानकारों का कहना है कि इस मामले में गेंद दोनों पक्षों के पाले में है। द अफ्रीका सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज के निदेशक जोसेफ सीगल ने मीडिया से बातचीत में कहा है कि ताजा घटनाक्रम विरोधी दलों और सैन्य नेताओं के लिए एक अच्छा मौका होगा। उन्होंने कहा, "सेना को पता है कि अगर उन्होंने सत्ता पर कब्ज़ा करने की कोशिश की तो उन्हें भारी विरोध का सामना करना पड़ेगा। इससे उनके लिए शासन चलाना बहुत मुश्किल हो जाएगा। इसके अलावा नए प्रमुख अल-बुरहान का लक्ष्य देश में सामंजस्य को बनाए रखना प्रतीत होता है।" उधर विरोधी भी जानते हैं कि सूडान को एक गंभीर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है, और अगर उन्होंने अपना आंदोलन तेज किया तो कई तरह की अंतर्राष्ट्रीय सहायता और समर्थन की आवश्यकता होगी। अभी प्रदर्शनकारियों को समझौता करने की आवश्यकता है। विशेष रूप से, उन्हें एक नागरिक-नेतृत्व वाली सरकार की बहाली के लिए सेना के संरक्षण की जरुरत है।

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