अंडों से बाहर आए घडिय़ाल के बच्चे

- देवरी घडिय़ाल केन्द्र पर जन्मे १८८ घडिय़ाल
- कॉलोनी बनाकर चंबल नदी किनारे अंडे देती मादा घडिय़ाल

By: Ashok Sharma

Published: 26 Jun 2020, 10:15 PM IST

मुरैना. हैचिंग विधि द्वारा अंडों से १८८ नन्हें घडिय़ाल दुनियां में कदम रख चुके हैं। देवरी घडिय़ाल केन्द्र पर इन अंडों को तकनीकी विधि से उनको पर्याप्त तापमान देकर सुरक्षित रखा जाता है। मादा घडिय़ाल चंबल नदी किनारे कॉलोनी बनाकर १५ मार्च से २० अप्रैल तक अंडे देती है। ये घडिय़ाल के बच्चे मई के अंतिम सप्ताह से २० जून तक कंपलीट होकर बाहर निकलते हैं। मादा घडिय़ाल चंबल नदी किनारे सेंट बैंक अथवा ढालनुमा रेत में बड़े बड़े ग्रुप होते हैं वहां कॉलोनी बनाते हैं, वहां रेत के अंदर पानी गहरा होना चाहिए। उस स्थान को मादा घडिय़ाल अच्छा मानती हैं और वहीं पर अंडे देती है।
अंडे देने से पहले ट्राइलनेस्ट करती है मादा घडिय़ाल
मादा घडिय़ाल जहां अंडे देती है वहां ट्राइलनेस्ट करती है अर्थात बार बार एक से पांच तक गड्ढे खोदती है और यह देखती है कि यहां अंडे नष्ट तो नहीं हो जाएंगे। जब वह मान लेती है कि यह जगह अंडे देने के लिए उपयुक्त है तभी वहां पर अंडे देती है। मादा घडिय़ाल सभी गड्ढों में अंडे नहीं देती है जिन गड्ढों में अंडे देती है, उनको बंद कर देती है और कुछ को खुले छोड़ देती है।
सुरक्षा के लिए लगाते हैं मोस्क्यूट जाल
घडिय़ाल केन्द्र देवरी के केयर टेकर ज्योति डंडोतिया के निर्देशन में चंबल नदी किनारे मादा घडिय़ाल द्वारा दिए गए अंडों की स्टाफ सुरक्षा करता है। कोई जानवर उन अंडों को खा न जाए इसके लिए मोस्क्यूट जाल (आयरनमेस) लगा देते हैं, जहां अंडे दिए गए होते हैं। इसके अलावा स्टाफ उस पीरियड (अंडे देने के बाद) में रोजाना वॉच करता है कि आज कितने अंडे दिए हैं। उसी हिसाब से रजिस्टर मेंटेन किया जाता है। जिससे उनको समय पर देवरी घडिय़ाल केन्द्र ले जाया जा सके।
२० दिन पहले हटा देते हैं आयरनमेस
चंबल नदी किनारे जहां मादा घडिय़ाल अंंडे देती है, वहां सुरक्षा के लिए अंडों के ऊपर लगाई गई आयरनमेस को बीस दिन पूर्व हटा दिया जाता है जिससे मादा घडिय़ाल समय पर पंजों से खोदकर अंडों के ऊपर से रेत हटा सके और बच्चे बाहर आ सकें।
४० दिन बाद लाते हैं घडिय़ाल केन्द्र पर अंडे
केयर टेकर ज्योति डंडोतिया ने बताया कि चंबल नदी किनारे से हर साल २०० अंडे ४० दिन बाद घडिय़ाल केन्द्र पर लाते हैं जिससे उनको यहां तकनीकी विधि से हैचिंग कर पैदा किया जा सके। अंडों के लिए ३० से ४० डिग्री के बीच तापमान होना जरूरी है। केन्द्र पर तापमान को सेट करके रखते हैं। वहीं जिस तरह चंबत रेत में अंडे रहते हैं, वही स्थिति निर्मित करनी होती है। यहां भी रेत के बीच में ही अंडे रखे जाते हैं। चंबल नदी किनारे पर्याप्त तापमान न मिलने पर बच्चों की पैदावार श्योर नहीं रहती। इसलिए केन्द्र पर हर साल २०० अंडे लाते हैं। उनको पैदा होने के बाद उनका पालन पोषण करके एक निश्चित समय में चंबल में छोड़ दिया जाता है।
कथन
- घडिय़ाल का अंडा आठ से नौ सेंटीमीटर का होता है। चंबल किनारे से २०० अंडे हर साल देवरी घडिय़ाल केन्द्र लाए जाते हैं। इस बार भी लाए गए थे। उनको लाने की प्रक्रिया बहुत जटिल है। उनको सेटबंैक से पेटी में उसी पॉजीसन में रखते हैं जिस पॉजीशन वहां पर रखे होते हैं। जरा सी लापरवाही हुई तो बच्चा नष्ट भी हो सकता है। इस बार १८८ घडिय़ाल के बच्चे जन्मे हैं। १२ अंडे में बच्चे विकसित नहीं हो सके।
ज्योति डंडोतिया, केयर टेकर, देवरी घडिय़ाल केन्द्र

Ashok Sharma
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