लॉकडाउन में पशु पालकों पर दोहरी मार

दूध उत्पादक पशु पालकों को समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करें। जबकि दुग्ध उत्पादन के मामले में अंचल का नाम ख्यात है। यहां से दूध का निर्यात उत्तरप्रदेश, दिल्ली और राजस्थान तक में होता है।

By: rishi jaiswal

Published: 23 Apr 2020, 10:24 PM IST

मुरैना. कोरोना संक्रमण के चलते देशव्यापी लॉक डाउन ने गांवों में दुग्ध उत्पादक पशु पालकों के समक्ष मुश्किल खड़ी कर दी है। शहर में संचालित बड़ी डेयरियों पर कारोबार बंद होने के साथ ही चिलर भी बंद हैं।

ऐसे में दूध की खपत आधी ही रह गई है। इन हालात में सीधे दूध आपूर्ति करने वाले दूधियों ने जहां शहर में दाम बढ़ाकर मांगना शुरू कर दिए हैं, वहीं गांवों में दुग्ध उत्पादक किसानों से दूध खरीदते समय दाम कम कर दिए हैं।

दूध उत्पादक पशु पालकों को समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करें। जबकि दुग्ध उत्पादन के मामले में अंचल का नाम ख्यात है। यहां से दूध का निर्यात उत्तरप्रदेश, दिल्ली और राजस्थान तक में होता है।

जबकि दुग्ध उत्पादों का अंचल में भी खासा कारोबार होता है। पनीर, श्रीखंड, दही और मावा के उत्पादन के मामले भी अंचल का नाम है।

क्या होगा दुग्ध उत्पादकों का भविष्य

दुग्ध उत्पादन का किसानों की आमदनी बढ़ाने का एक वैकल्पिक स्रोत है। जिले में 12-15 लाख लिटर दूध का उत्पादन होता है। इसमें से आधा दूध दुग्ध उत्पादों को तैयार करने में खप जाता है।

लेकिन इन दिनों को शादी-समारोह, होटल-ढाबे, चाय-कॉपी का कारोबार सब बंद है। यदि लॉक डाउन लंबा चला तो समस्या और बढ़ जाएगी।

गोवंश और भैंस वंशीय पशु पालकों का कहना है कि दूध न बिकने के बावजूद पशुओं पर खर्च में कोई कमी नहीं आई है। कोई वाहन या कारखाना हो तो उसे बंद करने पर अन्य खर्च बच जाते हैं, लेकिन पशु पालकों को यह सुविधा नहीं मिल पाती है।

ऐसे में पशु पालक किसान पशुओं को फसलें कटने से खाली हुए खेतों में चराने के विकल्प पर विचार कर रहे हैं। हालांकि अभी भी गेहूं की फसल खेतों में खड़ी है जिससे परेशानी आ रही है।

किसानों का जो दूध 30-35 रुपए लिटर तक गांवों से दूधिए खरीदकर लाते थे वे अब 20-25 रुपए लिटर मांग रहे हैं। ऐसे में किसान भविष्य में दुग्ध उत्पादक पशु पालन से विमुख हो सकते हैं।

नवाचार अपनाकर निकलेंगे इस मंदी के दौर से

दुग्ध उत्पादक किसान और युवा इस स्थिति का मुकाबला करने के लिए नवाचार अपना रहे हैं। अब वे दूधियों को सस्ता दूध देने की बजाय उसका घी बनाकर जमा कर रहे हैं।

दुग्ध उत्पादक किसानों को उम्मीद है कि बाद में घी अच्छे दामों पर बिक सकता है। देशी रई से निकले घी का बाजार भाव 700-800 रुपए किलो तक मिल जाता है।

इन दिनों गांवों में हरी सब्जियां भी कम पहुंच पा रही हैं जिससे किसान दूध के उत्पादों से काम चल रहा है। कभी रबड़ी बनाते हैं तो कभी छाछ से रायते की डिस तैयार करते हैं। दूध के साथ दही और अपनी जरूरत का पनीर बनाकर भी उपयोग में ले रहे हैं।

गांव में दूध उत्पादन से लगभग हर किसान जुड़ा है। कृषि की लागत कम करने और आमदनी बढ़ाने के लिहाज से यह आवश्यक भी हो गया है। लेकिन इस समय बुरा हाल है।

जो दूध गांव से 30-35 रुपए लिटर जा रहा था उसके 20-25 रुपए देने की बात कही जा रही है, इसलिए घी तैयार करवा रहे हैं।

अरविंद सिंह गुर्जर, चुरहेला।

बड़ी डेयरियां और चिलर बंद हैं जिससे दूध के अन्य उत्पाद भी तैयार नहीं हो पा रहे हैं। ऐसे में गांव से दूध लेने आने वाले दूधिए कम दाम दे रहे हैं। मजबूरी में हमें घी बनाने के विकल्प अपनाने पड़े हैं। इंतजार है कि लॉक डाउन खुले और सब कुछ पहले जैसा सामान्य हो जाए।

रामचित्र सिंह महाना, नूराबाद।

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