बाबूजी! दांत हैं नहीं, दो माह से खानी पड़ रही है ठंडी रोटी

वृद्धाश्रम के मुख्य रसोइया को उस अधिकारी के बंगले पर किया अटैच, जहां पहले से रसोइयों की मौजूद है फौज

मुरैना. बाबूजी! दांत हैं नहीं, दो माह से ठंडी रोटी खानी पड़ रही हैं, यहां तक कि पेट भी नहीं भर रहा, यह दर्द था वृद्धाश्रम की वृद्ध महिला प्रकाश कौर का। उन्होंने बताया कि मुख्य रसोइया था उसको यहां से हटा दिया है, अब खाना बनाती है सहायिका। चूंकि अकेली है जब पूरा खाना बन जाता है, तब वही परोसती है तब तक रोटियां ठंडी हो जाती हैं और फिर दांत न होने से वह चबाई भी नहीं जाती। पत्रिका प्रतिनिधि जब आश्रम पहुंचे तो वृद्धों ने अपने दर्द बयां किए। वृद्धाश्रम में सबकुछ है, अगर कमी है तो मानवता की। यहां पदस्थ स्टाफ घड़ी लगाकर अपनी ड्यूटी करता है और महीने पर तनख्वाह का ध्यान रखता है अगर वृद्धों की सेवा मानवता के नाते करें तो वहां कोई समस्या ही नहीं रहे।

कर्मचारियों की बोलचाल की भाषा व व्यवहार की वृद्धों ने शिकायत की। विडंवना इस बात की है कि वृद्ध पहले से अपनों के दर्द के सताए हुए हैं। अगर वृद्धाश्रम में भी उनके साथ ठीक से बर्ताव नहीं किया गया तो फिर वह कहां जाएंगे। बताया गया है कि वृद्धाश्रम की रसोई में मुख्य रसोइया रुद्रास प्रजापति व एक महिला सहायिका काम करती थी। तब यह था कि मुख्य रसोइया खाना बनाता और सहायिका परोसती थी तो वृद्धों को गर्म खाना खाने को मिल जाता था, लेकिन दो माह पूर्व मुख्य रसोइए को जिला प्रशासन के एक जिम्मेदार अधिकारी के बंगले पर अटैच कर दिया गया है।

वृद्धाश्रम में फैल रही अव्यवस्था

बताया जा रहा है उक्त अधिकारी के यहां पहले से चार-पांच रसोइया तैनात हैं, लेकिन कुछ अधीनस्थों ने साहब के यहां अपनी दुकान जमाने के चक्कर में वृद्धाश्रम से मुख्य रसोइया को उनके बंगले पर अटैच कर दिया है। इसके चलते वृद्धाश्रम में अव्यवस्था फैल रही है। यहां वृद्ध महिला-पुरुष परेशान हैं। इस समय आश्रम में 14 वृद्ध महिला व पुरुष हैं उनके लिए खाना बनाने और परोसने के लिए सिर्फ एक महिला कर्मचारी है।


वृद्धों को खाना भी समय पर नहीं मिलता

मुख्य रसोइया के अन्यंत्र अटैच कर देने से आश्रम में रह रहे वृद्धों की भोजन व्यवस्था गड़बड़ा गई है। खाना बनाने के लिए सहायिका है, लेकिन गर्म-गर्म खाना परोसने के लिए कोई नहीं है। सहायिका जब रसोई के पूरे कार्य से फुर्सत हो जाती है तब वृद्धों को भोजन परोसा जाता है तब तक खाना ठंडा हो चुका होता है।


व्यवस्थापक कार्यालयीन समय और संचालक अपनी मर्जी के मालिक

यूं तो वृद्धाश्रम के संचालन के लिए एक संचालक तैनात किया है, उनके रहने व बैठने के लिए परिसर में आवास व कार्यालय भी बना है, लेकिन ये अपनी मर्जी के मालिक हैं, जब इच्छा होती है तब आश्रम आते हैं, अन्यथा लंबे समय तक गायब हो जाते हैं। विभाग ने एक महिला को व्यवस्थापक के रूप में तैनात किया है। वह कार्यालयीन समय पर आती है और आश्रम में समय पास कर वापस चली जाती है। इनको आश्रम की व्यवस्थाओं से कोई मतलब नहीं है।

अधिकारियों ने भी मोड़ा मुंह

विडंवना इस बात की है कि जिले में एक मात्र वृद्धाश्रम हैं। जहां 14 वृद्ध महिला व पुरुष रह रहे हैं। इस आश्रम में रह रहे वृद्ध अपने आपको उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। इनका कहना है कि स्थानीय अधिकारी हमारी सुनते नहीं हैं और जिले के प्रशासनिक अधिकारियों को हमारे बीच आने के लिए समय नहीं है। वर्तमान में पदस्थ प्रशासनिक अधिकारियों ने अभी तक एक दिन भी वृद्धाश्रम की विजिट नहीं की है। यहां तक विभाग के प्रभारी अधिकारी भी एक दिन के लिए आश्रम नहीं पहुंचे हैं।


वृद्धाश्रम में एक महिला है जो खाना बना रही है। 14 वृद्धों का खाना एक महिला आसानी से बना सकती है। मुख्य रसोइया को कहां और किसने अटैच किया है, यह वरिष्ठ अधिकारियों का मामला है। इस मामले में मैं कुछ नहीं कह पाऊंगा।
शिवकुमार शर्मा, संचालक, वृद्धाश्रम

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महेंद्र राजोरे Desk
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