घर लौटने की जल्दी में भूखे-प्यासे पैदल ही चले जा रहे श्रमिक

पत्रिका के सामाजिक सरोकार अभियान में समाजसेवियों ने शनिवार को दोपहर में हाइवे से निकलने वाले श्रमिकों को प्राथमिकता और आवश्यकता के आधार पर सहायता प्रदान की।

By: Ravindra Kushwah

Published: 16 May 2020, 10:10 PM IST

मुरैना. भूखे-प्यासे श्रमिकों को खाने के लिए केले, बिस्कुट और पीने को पानी के अलावा जरूरत के हिसाब से दवा, बच्चों को पहनने के लिए जूते-चप्पल भी भेंट किए। श्रमिक पैदल और बाइक से ही 200-300 किमी का सफर तय करके अपने घरों को लौट रहे हैं।
देने वाला राम कार्यक्रम के संयोजक उमाकांत उपाध्याय सुसानी, समाजसेवी अशोक सिंह सिकरवार, सुनील पचौरी, पार्षद प्रमोद, मयंक वर्मा, दीपक तोमर, कमलेश माहौर और भूपेंद्र पाराशर दोपहर में पत्रिका टीम के साथ हाइवे पर काका धर्मकांटे के पास पहुंचे और सड़क किनारे खड़े हो गए। इस दौरान दतिया से पानीपत जाते हुए गौरव कश्यप व उनकी पत्नी महक कश्यप २ साल के बेटे को सीने से चपेटे हुए पैदल आते दिखे। धूप में पैदल चलते हुए उनका थकान और भूख से बुरा हाल था। उन्हें रोककर पानी पिलाया, खाने को केले और बिस्कुट के साथ बच्चे को पहनने के लिए सैंडल भेंट किए तो इस दंपती के चेहरे पर संतोष के भाव दिखे। पास में ही एक घर के पास गुमटी के लिए बने टपरे में बैठकर दंपती ने केले और बिस्कुट खाए और बच्चे को खिलाने के बाद वे फिर अपने सफर पर चल पड़े। वहीं हरियाणा के हांसी से 10 युवा, महिला व बच्चों के साथ झांसी के पास महोवा के लिए पैदल ही जा रहे भरत ने बताया कि वे दो दिन से पैदल ही चल रहे हैं, कभी कोई ट्रक में बैठा देता है तो रात मिल जाती है। यहां एक बस ग्वालियर की ओर जाती दिखी, रोककर बैठाने को कहा तो 300-300 रुपए किराया मांगा इसलिए पैदल जा रहे हैं। उसके साथ विनोद, सावित्री सहित १० लोग थे। भूखे और प्यासे थे। केले और बिस्कुट खाकर उन्हें राहत मिली तो चलने की सामथ्र्य भी बढ़ी। भरत से जब पूछा की वे राजघाट के पास मप्र की सीमा में बने कैंप में रुके क्यों नहींïï तो उनका जवाब था कि इसके बारे में उन्हें जानकारी नहीं थी और किसी ने हमें रोका नहीं। रास्ते जब ग्वालियर की ओर बस जाती दिखी ौर उसमें जगह खाली थी तो बैठाने को कहा। बस के स्टाफ ने उनसे ३००-३०० रुपए किराया मांगा। इतना पैसा उनके पास नहीं था। इसलिए पैदल ही सफर पर चले जा रहे थे। इसी तरह वन विभाग के चेकपोस्ट के पास दिल्ली से झांसी के आगे बीना के लिए जाते हुए जगदीश अहिरवार और उनकी पत्नी गिरिजा मिले। भूख से उनका भी बुरा हाल था। केले व बिस्कुट के साथ बच्चों के लिए जूते-चप्पल मिले तो उन्हें राहत मिली और बोले अब बीना तक का सफर आसान हो जाएगा। रात तक वे बीना पहुंच जाएंगे। पत्रिका की पहल पर समाजसेवियों ने यह अभियान जारी रखने का निर्णय लिया है।
कोई रोकता-टोकता नहीं
बॉर्डर क्रॉस करके मप्र की सीमा में आ रहे वही श्रमिक सरकारी योजना का लाभ ले पा रहे हैं जिन्हें इसकी पहले से जानकारी है। वरना वहां कोई रोकता-नहीं, इसीलिए वाहन चालक मनमाना किराया वसूलते हैं। लोग ट्रकों, हल्के लोडिंग वाहनों में सवार होकर भी अपने घरों की ओर जा रहे हैं। लेकिन उन्हें यह नहीं मालूम कि घर पहुंचने के बाद काम मिल जाएगा या नहीं। पैदल और परेशानी भरा सफर तय कर रहे ज्यादातर लोग रोज कमाने-खाने वाले हैं।

Ravindra Kushwah
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