शनि जयंती, वट अमावस और सूर्यग्रहण का योग एक साथ

शनि जयंती पर विश्व प्रसिद्ध ऐंती पर्वत स्थित शनि मंदिर में आम लोगों को पूजा-पाठ, दर्शन लाभ नहीं मिलेगा, लोग घरों से करेंगे पूजा-अर्चना

मुरैना. शनि जयंती के बावजूद गुरुवार को लोगों को विश्व प्रसिद्ध ऐंती पर्वत स्थित शनिदेव मंदिर में प्रवेश नहीं मिलेगा। लोग अपने घरों से ही पूजा-अर्चना एवं पाठ कर सकेंगे। मंदिर में केवल पुजारी और उनके साथ खास लोग ही पूजा-अर्चना और दर्शन कर सकेंगे, जबकि इस शनि जयंती पर वट अमावस के साथ सूर्य ग्रहण भी है। शनिदेव के पिता भगवान सूर्य को ग्रहण का प्रभाव भारत में नहीं दिखेगा, लेकिन ग्रहण तो लगेगा।


कलेक्टर बी कार्तिकेयन के अनुसार शनि जयंती पर कोरोना प्रोटोकाल का पालन करते हुए भक्तों के बिना मंदिरों में भगवान शनिदेव का तिल-तेल से अभिषेक और पूजन किया जाएगा। शनि मंदिर में सुबह ब्रह्ममहूर्त में शनिदेव का पंचामृत से स्नान करवा के देश के पवित्र नदियों के जल से अभिषेक किया जाएगा। इसके बाद शनि देव को तिली व सरसों के मिश्रित तेल से विभिन्न मंत्रों के उच्चारण के साथ तेल अभिषेक किया जाएगा, लेकिन कोरोना गाइडलाइन के चलते भक्तों की सीमित संख्या में ही सभी आयोजन होंगे। सूर्य और छाया की चार संतानों में से एक शनिदेव की नवग्रह में गिनती होती है। पुराणों के अनुसार वे पृथ्वी से करीब 153.6 लाख किलोमीटर ऊपर स्थित हैं। मंदगति से चलने वाले शनिदेव ढाई वर्ष एक राशि में रहते हैं। पुराणों में उल्लेख है कि वे हमेशा अपनी आंखें नीची करके ही रहते हैं। यदि उनकी दृष्टि किसी पर पड़ जाती है तो उसका विनाश निश्चित है। शनिदेव की प्रसन्नता के लिए शनिवार के दिन तेल, शमी के पत्ते, काला तिल, काला कपड़ा, लोह सामग्री चढ़ाई जाती है। जिस व्यक्ति को शनि का ढैया या साढ़ेसाती अशुभ है तो वह परेशान रहता है। शनि देव जप, दान और उनके स्तोत्र पठन से प्रसन्न होते हैं।

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महेंद्र राजोरे Desk
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