Movie Review: पुरुषवादी सोच का आधा-अधूरा नतीजा है 'Half Girlfriend'
Dilip Chaturvedi
Publish: May, 19 2017 03:36:00 (IST)
Movie Review: पुरुषवादी सोच का आधा-अधूरा नतीजा है 'Half Girlfriend'
HALF GIRLFRIEND

निर्देशक: मोहित सूरी, कलाकार: अर्जुन कपूर, श्रद्धा कपूर, विक्रांत मेस्सी, सीमा बिस्वास, रेटिंग: 2/5

मुंबई। फिल्म देखने जाने से पहले इस सवाल पर गौर जरूर करें- क्या कोई लड़की खुद को हाफ गर्लफ्रेंड कहलाना पसंद करेगी? खुद लड़कियां इस सवाल पर गौर करें, उन्हें खुद ब खुद जवाब मिल जाएगा। वैसे भी यदि कोई पुरुषवादी सोच के साथ किसी लड़की को हाफ गर्लफ्रेंड कहेगा, तो लड़की का एक ही जवाब होगा- नहीं, मैं हाफ गर्लफ्रेंड नहीं हूं। दरअसल, यदि कोई लड़की किसी की गर्लफ्रेंड है, तो वह गर्लफ्रेंड है, इसमें हॉफ गर्लफ्रेंड को कोई औचित्य नहीं है। असल में यह सिर्फ और सिर्फ पुरुषवादी सोच का नतीजा है। ऐसे में हम यही कह सकते हैं कि चेतन भगत के नॉवेल पर आधारित फिल्म हाफ गर्लफ्रेंड पर सिर्फ पुरुष की सोच व उसके पक्ष को दर्शाया गया है। इस फिल्म की जो कहानी है, उसके आधार पर फिल्म का नाम हाफ गर्लफ्रेंड नहीं, बल्कि 'हमारी अधूरी कहानी' होना चाहिए था। चूंकि यहां सवाल यह भी उठता है कि दर्शक इस फिल्म पर अपना क्या नजरिया रखते हैं, यह देखना भी दिलचस्प होगा...फिलहाल, आइए जानते हैं फिलम की कहानी, अभिनय, निर्देशन व कमजोर के बारे में...

कहानी...
फिल्म की कहानी शुरू होती है माधव झा (अर्जुन कपूर) से। जो अपनी गर्लफ्रेंड अरे माफ कीजिएगा हाफ गर्लफ्रेंड रिया सोमानी (श्रद्धा कपूर) की तलाश करता हुआ परेशान दिखाई देता है। रिया किसी कारण से माधव को छोड़कर चली गई और माधव अपने टूटे दिल के साथ उसे ढूंढ रहा है। इसके बाद कहानी सीधे फ्लैश बैक में चली जाती है। यहां दिखाई देगा माधव, रिया और बास्केटबाल। दिल्ली के एक कॉलेज में कैसे इन दोनों की मुलाकात होती है फिर एक-दूसरे के नजदीक आते हैं और अचानक दूर चले जाते हैं। यह सब कुछ दर्शक फिल्म के फस्र्ट हाफ  में देखते हैं। लेकिन इंटरवल के बाद कहानी जोर पकड़ती है। फिल्म के साथ-साथ दर्शक भी पटना से लेकर न्यूयॉर्क तक का सफर करते हैं और फिल्म एक प्यारे से नोट पर जाकर खत्म हो जाती है।

अभिनय...
एक्टिंग की बात करें, तो अर्जुन कपूर इस कैरेक्टर में कहीं से फिट नजर नहीं आते। चूंकि वो चेतन भगत के फेवरिट है, इसलिए उन्हें इसमें लेना शायद निर्देशक की मजबूरी रही हो। असल में बिहारी एक्सेंट बोलने के चक्कर में अर्जुन की हिंदी को सुनना कानों में दर्द पैदा करता है। अंग्रेजी जुबान के साथ अमीर शहरी लड़की के किरदार में श्रद्धा कपूर ने बेहतरीन काम किया है। माधव के दोस्त का किरदार निभाने वाले विक्रांत मेस्सी अपने रोल में सबसे ज्यादा प्रभावित करते हैं। उन्होंने मानो जान डाल दी अपने किरदार में...जब भी वो फ्रेम में आते हैं, उन पर नजरें नहीं हटतीं।

निर्देशन...
मोहित सूरी के निर्देशन में कोई खामी नजर नहीं आती है। नई पीढ़ी के निर्देशकों में से वो एक ऐसे निर्देशक हैं, जो दर्शकों का दिल जीतना बखूबी जानते हैं। इस फिल्म में भी वो कुछ ऐसा ही करने की कोशिश करते दिखाई दिए हैं। लेकिन आधे प्यार और अधूरी कहानी को लेकर वो पूरी फिल्म बनाने में चूक गए, क्योंकि आशिकी 2 और एक विलेन जैसा करिश्मा इस फिल्म के साथ नहीं दिखाई दे रहा है। 

कमजोर कडिय़ां...
-फिल्म की कहानी काफी कमजोर है। स्क्रीनप्ले बहुत ही ठंडा है। चेतन भगत के नॉवेल पर आधारित बनी फिल्मों में जो बात '2 स्टेट्स' और '3 इडियट्स' में थी ,वैसी इस फिल्म में नजर नहीं आती। 

-फिल्म के संवाद भी काफी कमजोर हैं। रोमांस और ड्रामा में भी काफी फीकापन नजर आता है। किसी भी रोमांटिक फिल्म को देखते वक्त इंसान उसमें खो जाना चाहता है, लेकिन इस फिल्म के दौरान कुछ ऐसा फील नहीं हो पाता है, जो कि स्क्रीनप्ले की कमी है।
 
-कहानी बांध पाने में असफल है और कौन सा किरदार आखिरकार क्या करना चाह रहा है, यह बता पाने में मेकर असमर्थ रहे हैं।

-फिल्म का गीत संगीत अच्छा है, लेकिन इसमें भी कुछ कमी नजर आती है, क्योंकि मोहित सूरी की फिल्मों का संगीत काफी प्रभावी होता, जो इसमें एक-दो गीत को छोड़कर बाकी किसी गाने पर नजर नहीं आता है। 

क्यों देखें?
यदि आप चेतन भगत के फैन हैं और आपने उनकी नॉवेल हाफ गर्लफ्रेंड नहीं पढ़ी, साथ ही रोमांटिक फिल्मों के शौकीन हैं, तो आपको यह फिल्म कुछ हद तक अच्छी लग सकती है। लेकिन फिल्म देखने के बाद आपके दिमाग में कुछ चीजें खटकेंगी...आप कहानी को लेकर दुविधा भी महसूस कर सकते हैं। आपको मूड हैपी एंडिंग की तलाश करेगा, लेकिन आपको इसमें निरााश मिलेगी।