मूवी रिव्यू : हंसा-हंसा के बहुत कुछ बता रही है 'हिंदी मीडियम'

By: भूप सिंह
| Published: 19 May 2017, 04:17 PM IST
मूवी रिव्यू : हंसा-हंसा के बहुत कुछ बता रही है 'हिंदी मीडियम'
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मूवी रिव्यू : हंसा-हंसा के बहुत कुछ बता रही है 'हिंदी मीडियम'

स्टारकास्ट- इरफान खान, सबा कमर, दीपक डोबरियाल, अमृता सिंह
डायेरक्टर- साकेत चौधरी
रेटिंग- *** (तीन स्टार)

बाहुबली 2 की धमाकेदार एंट्री के दो हफ्तों के बाद सिमेमाघरों में दो फिल्में रिलीज हुई हैं। उनमें से एक है इरफान खान की 'हिंदी मिडियम'। इस फिल्म की कहानी इरफान खान और पा​किस्तानी एक्ट्रेस सबा कमर की 'बेटी' के इर्द—गिर्द घुमती हुई नजर आ रही है। इस फिल्म में एक कपल अपनी बेटी को सबसे अच्छी अंग्रेजी स्कूल में दाखिला दिलाने की जद्दोजहद में जुटे नजर आते हैं। इसके लिए पैरेंट्स बने इमरान और सबा अमीर से गरीब भी बनते हैं. लेकिन इस मूल विषय के साथ ही यह फिल्‍म और बहुत कुछ कहती है.  ये अमीर और गरीब के बीच की खायी की बात करती है, ये स्कूलों में चल रही धांधली पर भी रोशनी डालती है, ये फिल्‍म अंग्रेजी की गुलाम हिंदुस्तानी मानसिकता की और  इशारा करती है और साथ ही ये भी उजागर करती है की भाषा कभी भी किसी इंसान की श्रेष्ठता साबित नहीं कर सकती. साकेत चौधरी द्वारा निर्देशित इस फिल्‍म में भी कुछ खूबियां तो कुछ खामियां हैं, जिन्‍हें हम आपके सामने रख रहे हैं।



कहानी-
राज बत्रा (इरफ़ान खान)और मीता बत्रा (सबा कमर) एक पंजाबी दंपत्ति हैं, जिनकी एक बेटी है, पिया। ये एक मिडल क्लास परिवार है, जो थोड़े ही समय से थोड़े से अमीर हो गए हैं। इनकी इच्छा है की इनकी बेटी पिया किसी बढ़िया इंग्लिश स्कूल में भर्ती हो जाए ताकि उसकी ज़िन्दगी सुधर जाए, पर ऐसा हो नहीं पाता, क्योंकि आजकल बच्चे के अंग्रेजी स्कूल में पढने के लिए खुद माँ बाप को अंग्रेजी का प्रकांड पंडित होना ज़रूरी है। मीता और राज टयूशन भी लेते हैं पर कुछ नहीं होता। आखिरकार वो गरीबकोटे से अपनी बेटी का एडमिशन कराने की सोचते हैं और गरीब पडोसी श्यामप्रकाश (दीपक डोबरियाल)के साथ मिलकर गरीबी का स्वांग रचते हैं। फिर क्या होता है जानने के लिए देख कर आइये 'हिंदी मीडियम'।



फिल्म की छोटी-छोटी मगर मोटी बातें-

एडमिशन तो एक मुद्दा है ही..लेकिन इसके अलावा भी फिल्म में बच्चों से जुड़ी कई ऐसी बातें दिखाई गई हैं जो आमतौर पर हमारे घरों में होती हैं। बहुत ही सरल भाषा में कई बड़ी समस्याओं पर व्यंगात्मक तरीके से बात की गई है। जैसे बच्चे अगर स्कूल जाने से मना कर दें तो हम उन्हें लालच देते हैं। फिल्म में भी राज अपनी बच्ची को लॉलीपॉप देने की बात करता है तब उसे ऐसा करने से मना किया जाता है। अगर आपको अपने बच्चे से देश की गरीबी के बारे में बताना हो तो क्या कहेंगे। इस पर राज हंसते हुए कहता है कि उसे बताना क्या है गरीबी तो हर जगह दिख रही है जैसे रेड लाइट पर भीख मांगते बच्चें…



एक्टिंग-
इरफान को भले कोई भी रोल दिया जाए वो अपने आपको को ढाल ही लेते हैं। इस फिल्म में भी उन्होंने एक—एक सनी में जान डाल दी है। चाहें कॉमिक टाइमिंग की बात हो या फिर सीरियस सीन हो इरफान हर जगह बेस्ट हैं। इरफान का साथ पाकिस्तानी एक्ट्रेस सबा कमर ने बखूबी निभाया है। बेटी को अंग्रेजी मीडियम में एडमिशन दिलाने के लिए वो अपने पति को डराने से भी बाज नहीं आती हैं। वो फिल्म में कई बार कहती दिखी हैं, ‘सरकारी स्कूल में जाएगी तो कुछ नहीं सीख पाएगी, कोई अंग्रेजी में बात करेगा तो उसकी रूह कांप जाएगी, सोसाइटी में फिट नहीं हो पाई तो लोनली और डिप्रेस हो जाएगी… और फिर अगर ड्रग्स लेने लगी तो?’ सबा और इरफान की केमेस्ट्री खूब जमी है इस फिल्म में।

‘तनु वेड्स मनु’ में पप्पी के किरदार से मशहूर हुए दीपक डोबरियाल ने एक गरीब परिवार के मुखिया के रोल में जी जान डाल दी है। स्कूल के प्रिसिंपल की भूमिका में अमृता सिह हैं और उन्होंने काफी इंप्रेस भी किया है।

डायरेक्शन-
डायरेक्टर साकेत चौधरी इससे पहले ‘प्यार के साइड इफेक्टस’ (2006) और ‘शादी के साइड इफेक्ट्स’ (2014) जैसी फिल्म बना चुके हैं। इन्हें किसी भी कहानी को सरल लेकिन प्रभावशाली तरीके से पेश करने के लिए जाना जाता है। इस बार भी उन्होंने ना ही बहुत भारी संवाद का उपयोग किया है ना ही दर्शकों पर बहुत प्रेशर डालने की कोशिश की है। आम ज़ुबान, सरल भाषा और हंसी-मजाक में ही सारी समस्याओं को दिखा दिया है। फिल्म का क्लाइमैक्स बॉलीवुड की मसाला फिल्मों जैसा है जिसे और भी प्रभावशाली तरीके से पेश किया जा सकता था। लेकिन इसके बावजूद पूरी फिल्म देखने लायक और मजेदार है।

संगीत-
सचिन जिगर का संगीत ठीक ठाक है, बहुत अच्छा नहीं तो बहुत बुरा भी नहीं है। अमर मोहिले का बैकग्राउंड म्‍यूजिक बढ़िया है।

क्यों देखें-

बच्चों की शिक्षा बहुत ही गंभीर विषय है जिसपर बहस होनी चाहिए। इस पर गरीब बच्चे का भी उतना ही हक जितना अमीर का है लेकिन फिर भी उसका हक मार लिया जाता है। देश में कानून तो है पर उस पर कितना अमल होता है ये हर किसी को दिख रहा है। इतने गंभीर विषय पर बनी इस फिल्म को बहुत ही भारी भरकम ना बनाते हुए ह्यूमर के तड़के के साथ दर्शकों के सामने परोसा गया है। जिसे देखते वक्त बिल्कुल भी टेंशन नहीं होती। लेकिन देखने के बाद आप सोचने पर मजबूर हो जाते हैं।
Irrfan Khan
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