शुभमंगल का प्रतीक है स्वास्तिक, मध्य में बसते हैं भगवान विष्णु

शुभमंगल का प्रतीक है स्वास्तिक, मध्य में बसते हैं भगवान विष्णु
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भारतीय संस्कृति में लंबे समय से स्वास्तिक को शुभ व लाभ के साथ मंगल का प्रतीक माना जाता है। जब भी कोई नए कार्य की शुरुआत करते है, तब सबसे पहले स्वास्तिक का चिन्ह बनाते है व उसकी पूजन होती है।

रतलाम। भारतीय संस्कृति में लंबे समय से स्वास्तिक को शुभ व लाभ के साथ मंगल का प्रतीक माना जाता है। जब भी कोई नए कार्य की शुरुआत करते है, तब सबसे पहले स्वास्तिक का चिन्ह बनाते है व उसकी पूजन होती है। ज्योतिषी आनंद त्रिवेदी के अनुसार संस्कृत में स्वास्तिक का शाब्दिक अर्थ बेहतर या श्रेष्ठ होता है।

ज्योतिषी त्रिवेदी ने बताया कि 5 नवंबर को लाभ पंचमी व 11 नवंबर को देवउठनी ग्यारस के दिन घर के मुख्य दरवाजे सहित मंदिर में स्वास्तिक बनाना चहिए। न सिर्फ हिंदु धर्म बल्कि इसे अन्य समाज में भी पवित्र माना गया है। स्वास्तिक सकारात्मक उर्जा का प्रतिक है। यही वो कारण है जब इसको शुभ कार्य करने से पहले बनाया जाता है।


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दो प्रकार के मिलते हैं दो प्रकार के स्वास्तिक 
ज्योतिषी त्रिवेदी के अनुसार रतलाम के बाजार में दो प्रकार के स्वास्तिक मिल रहे है। एक दांया व एक बांया। दाहिना स्वास्तिक नर का तो बांया स्वास्तिक नारी का प्रतिक माना गया है। स्वास्तिक की खड़ी रेखा सृष्टि की उत्पत्ती का प्रतीक है तो आड़ी रेखा सृष्टि के विस्तार की। इसका मध्य बिंदु विष्णु की नाभि का कमल माना गया है। इसके चार बिंदु चार दिशा का प्रतिक है।

इस तरह बनाए स्वास्तिक
ज्योतिषी त्रिवेदी के अनुसार घर या कार्यालय के साथ पूजन के लिए बने मंदिर में ब्रह मुहूर्त में केसर, कुमकुम, सिंदुर आदि को तेल में मिलाकर स्वास्तिक बनाए। ये करने से जिंदगी के साथ घर में भी शुभ परिवर्तन होता है।
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