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चीन डीएनए से छेड़छाड़ कर सैनिकों को बना रहा खूंखार!

- अंतर्राष्ट्रीय खुफिया एजेंसियों को आशंका, गुप्त तरीके से काम कर रहा ड्रैगन
- अमरीका, रूस और फ्रांस भी ऐसी गुप्त परियोजनाओं पर कर रहे काम

 

मुंबई

Published: January 10, 2022 09:10:36 pm

अरुण कुमार
जयपुर. कोरोना वायरस के आरोपों के बाद अब अंतर्राष्ट्रीय खुफिया एजेंसियों को आशंका है कि चीन चूहों, बंदरों, चिम्पैंजियों समेत इंसानों में भी जेनेटिक बदलाव कर रहा है। अरोप हैं कि चीन अपने सैनिकों को क्रूर और ताकतवर (Super Soldiers) बनाने के लिए गुप्त तरीके से डीएनए संरचना बदल रहा है। पिछले साल जून में ब्रिटेन के चर्चित पत्रकार बेकर ने भी अपनी रिपोर्ट में बताया था कि चीन ने लैब में एक हजार से ज्यादा जानवरों के डीएनए बदल दिए हैं। हाल ही में अमरीकी नेशनल इंटेलिजेंस के पूर्व डायरेक्टर जॉन रेटक्लिफ ने वॉल स्ट्रीट जर्नल में प्रकाशित अपने आलेख में कहा है कि चीन सैनिकों को सुपर सोल्जर बनाने की तैयारी में है। वर्ष 2019 में दो अमरीकी शोधार्थियों ने भी चीन के ऐसे इरादों की बात कही थी, जिनकी रिपोर्ट द जेम्सटाउन फाउंडेशन में प्रकाशित भी हुई। शोध में बताया गया है कि चीन अपने सैनिकों खूंखार, ताकतवर, विषम परिस्थतियों में जीवित रहने की क्षमता तथा भूख पर स्वैच्छिक नियंत्रण (Super Soldiers) आदि खूबियों के लिए उनके डीएनए से छेड़छाड़ कर रहा है।
जिस प्रक्रिया से चीन सैनिकों में बायोलॉजिकल छेड़छाड़ कर रहा है, उसे मेडिकल टर्म में क्लस्टर्ड रेगुलरली इंटरस्पेस्ड शॉर्ट पेलिंड्रोमिक रिपीट्स (सीआरआईएसपीआर) कहा जाता है। हालांकि चीनी सैनिका अपने इन शारीरिक बदलावों को लेकर बेखबर हैं। अमरीका और रूस में भी इस तरह के गुप्त प्रोजेक्ट चल रहे हैं। फ्रांस ने तो नैतिकता के दायरे में उन्नत सैनिकों के विकास की अनुमति भी दे दी है। भारत में नई जीन एडिटिंग तकनीक पर विचार का प्रस्ताव जेनेटिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति के पास दो साल से लंबित है।
खुफिया दस्तावेजों से खुला भेद
सीआरआईएसपीआर तकनीक के बारे में चीनी रक्षा विभाग का एक दस्तावेज गलती से लीक हो गया। इसमें चीन ने खुद माना है कि वो साल 2016 से जीन-एडिटिंग पर काम कर रहा है, ताकि सैनिकों की ताकत को बढ़ाया जा सके। हालांकि चीन ने ऐसे इंसानों को भारी कृषि कार्यों, खदानों, समुद्र की गहराई में खोज करने तथा अंतरिक्ष आदि में भेजने की भी बात कही है।
विश्व की शक्तियों में होड़
2018 में चीन के वैज्ञानिक हे जियानकुई ने गर्भ में भ्रूण का डीएनए संशोधित कर जुड़वा बहनों को एचआईवी संक्रमण से बचाया था। इस कारनामे पर दुनियाभर ने भारी आक्रोश जताया था। चीन समेत दुनिया के अधिकतर देशों में इस तरह जीन को संशोधित करने पर रोक है। अभी तक इस तकनीक का इस्तेमाल ऐसे भ्रूण पर ही किया गया है, जिन्हें तुरंत मार दिया जाता है।
अमरीका और रूस भी सक्रिय
2017 में द गार्डियन अखबार ने दावा किया कि अमरीकी सेना जेनेटिक एक्सटिंक्शन टेक्नोलॉजी में करोड़ों डॉलर निवेश कर रही है। ये तकनीक आक्रामक प्रजातियों का सफाया कर सकती है। 2017 में रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने चेतावनी दी थी कि इंसान बहुत जल्द ही परमाणु बम से भी खतरनाक हो जाएगा, उसकी आक्राामकता और ताकत कल्पना से परे होगी।
आरोपों पर चीन की सफाई
चीन समय समय पर कहता रहा है कि वह लैबोरेटरी में ऐसे संकर मनुष्य तैयार कर रहा है जिनके अंग मनुष्यों में स्थापित किए जा सकें। यानि कि इंसानों को लैबमेड इंसान की किडनी लगाई जा सकेगी। इसी प्रकार जरूरतमंद लोगों को आसानी से अंग उपलब्ध हो सकेंगे।
जीन एडिटिंग से नैतिक चिंताएं
इससे भविष्य में 'डिज़ाइनर बेबीÓ के जन्म की अवधारणा को बल मिलेगा। यानी बच्चे की आंख, बाल और त्वचा का रंग ठीक वैसा ही होगा, जैसा उसके माता-पिता चाहेंगे। आर्थिक रूप से संपन्न लोगों को अपने बच्चे को सुंदर और बुद्धिमान बनाने का मौका मिलेगा, जो सामाजिक भेदभाव को बढ़ाएगा।
कब किस देश में हुए प्रयोग
- जर्मन वैज्ञानिक हैंस फ्रिडेन्थल ने शोध के दौरान वर्ष 1900 में चिम्पैंजी, गोरिल्ला और मनुष्यों में एंथ्रोपॉइड प्रजनन कोशिकाएं समान पााईं और कहा कि मनुष्यों और बंदरो में क्रास से संकर जीव तैयार हो सकता है।
- 1920 में डच वैज्ञानिक हरमन मैरी बर्नेलॉट मोएन्स और जर्मन सेक्सोलॉजिस्ट हरमन रोहलेडर ने मानव शुक्राणुओं से मादा चिंपैंजियों का गर्भाधान कर परीक्षण की मांग की लेकिन इससे पहले ही उन्हें हटा दिया गया।
- 1920 में रूसी तानाशाह स्टालिन के आदेश पर वैज्ञानिक इलिया इवानोव ने मानव- चिंपैंजी क्रास से तीन मादा मादा चिंपैंजी पैदा किए थे। हालांकि कुछ ही दिनों में उनकी मौत हो गई।
- 1967 में चीन ने मानव और चिम्पैंजी की क्रासब्रीड ह्यूमेेंजी बनाने की कोशशि की जो बोलने, सुनने के अलावा शक्तिशाली हो और आदेशों को माने। इस दौरान एक चिम्पैंजी गर्भवती भी हुई लेकिन मौत हो गई।
- द सन की रिपोर्ट के अनुसार 1970 में अमरीका की लैब में एक ह्यूमेंजी का जन्म हैविटाइजेशन प्रोजेक्ट के दौरान हुआ था। हालांकि सुरक्षा कारणों के चलते लैब कर्मचारियेां ने ही उसे मार दिया था।
- 1980 के दशक में चीनी वैज्ञानिक डॉ जी योंगजियांग ने दावा किया कि लैब में एक ऐसा जीव तैयार किया जा रहा है जो इंसानों से बात करेगा और अन्य जानवरों की तुलना में दिमाग वाला होगा।
जीनोमिक्स से सबका भला जरूरी
जीनोम एडिटिंग संभव है, लेकिन खतरनाक और असुरक्षित भी। दुनिया के तमाम देशों में यह वैन है, मगर फिर भी कई देशों पर चोरी छिपे प्रयोग के आरोप लगते रहे हैं। भले ही यह वैज्ञानिकों को किसी जीव का डीएनए बदलने की क्षमता देता है, लेकिन यह मानव जाति के भले के लिए होनी चाहिए ना कि विभेद पैदा करने के लिए।
- डॉ. यू. एस. विशाल राव, आन्कोलॉजिस्ट, एचसीजी अस्पताल, बेंगलूरु

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