स्कूटर से शुरू हुआ था बच्चों को स्कूल छोडऩे का सिलसिला, वैन आंटी आशा ने हौसलों से लिखी उम्मीदों की कहानी

स्कूटर से शुरू हुआ था बच्चों को स्कूल छोडऩे का सिलसिला, वैन आंटी आशा ने हौसलों से लिखी उम्मीदों की कहानी

Prateek Saini | Publish: Nov, 10 2018 06:44:03 PM (IST) | Updated: Nov, 10 2018 06:44:04 PM (IST) Mumbai, Mumbai, Maharashtra, India

आशा के मजबूत हौंसलों ने कभी किसी से हार नहीं मानी...

अरुण लाल की रिपोर्ट...

(मुंबई): कौन कहता है कि आसमां में सुराख हो नहीं सकता! जरा तबीयत से पत्थर तो उछालो यारों!! जी हां... ऐसी ही कुछ कहानी है आशा वाघेला की, जो आज हजारों महिलाओं की प्रेरणास्त्रोत हैं। आशा के मजबूत हौंसलों ने कभी किसी से हार नहीं मानी। कभी स्कूटर से बच्चों को स्कूल छोडऩे का सिलसिला आज पांच वैन और दो बसों तक जा पहुंचा है। करीब पांच सौ बच्चों को सही सलामत घर से स्कूल और स्कूल से घर पहुंचाने का जिम्मा उठाने वाली आशा को इलाके में हर कोई सम्मान से वैन आंटी के नाम से जानता है।

 

1990 में आया जीवन में भूचाल

आशा एक सामान्य घरेलू महिला थीं। पढ़ी-लिखी न होने के कारण उनका जीवन बेहद सामान्य था। दो छोटे बच्चे और पति ही उनकी दुनिया थे। सब ठीक चल रहा था तभी वर्ष 1990 में उनके पति का बिजनेस पूरी तरह से चौपट हो गया। सदमे से पति पैरेलॉइज हो गए, रिश्तेदारों ने भी मुंह मोड़ लिया। लाखों का कर्ज और दो बच्चों की परवरिश के चलते आशा का जीवन निराशा से भर गया। 5वीं तक पढ़ी आशा ने कभी बाहर की दुनिया नहीं देखी थी। दो बच्चे और बिस्तर पर लाचार पति को संभालने के लिए उन्होंने घर बेच दिया।

 

ऐसे शुरू हुआ काम

 

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अाशा ने बताया कि घर बेचने के बाद मिले पैसों से कर्ज चुकाया और कुछ दिन रोटी-पानी का इंतजाम हुआ। बच्चों को वैन से स्कूल भेजने के लिए पैसे नहीं थे, सो पति का स्कूटर सीखा और बच्चों को स्कूल खुद छोडऩे लगी। तभी पड़ोस की महिला ने भी अपने बच्चे को भी स्कूल भेजने और बदले में कुछ रुपए देने को कहा। बस... यही से जिंदगी की गाड़ी चल निकली। इसके बाद आशा ने वैन चलानी सीखी। अब सवाल था वैन कैसे खरीदी जाए। लोगों से मदद मांगी पर अधिकतर ने मजाक उड़ाया। तभी एक बैंक मैनेजर ने आशा को एक लाख का लोन दिलाया और वैन आ गई लेकिन इस लोन को चुकाना बड़ी बात थी।

 

पति को हार्टअटैक ने तोड़ दिया

आशा की जिंदगी पटरी पर आ रही थी कि उनके पति को हार्टअटैक आया। परिवार फिर आर्थिक रूप से टूट गया। अस्पताल के खर्च ने कर्ज में धकेल दिया। तभी आशा का बड़ा बेटा जो 12वीं में पढ़ रहा था, पार्ट टाइम जॉब शुरू किया। धीरे-धीरे घर की हालत सुधरी लेकिन आशा बच्चे को पढऩे की उम्र में काम करते देख परेशान थीं। लेकिन आशा ने उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा और बच्चों को वैन से स्कूल छोड़ती रहीं।


और फिर बदल गई दुनिया

आशा बताती हैं कि उन्होंने मुश्किलों से कभी हार नहीं मानी और आज उनके पास पांच मारुति वैन और दो मिनी बस हैं। लोगों को उनपर भरोसा है कि हर बच्चा सही सलामत पहुंचता है। आशा आज भी बस चलाकर बच्चों को स्कूल पहुंचाने जातीं हैं। वे कहतीं हैं कि उनके बहुत से बच्चे बड़े होकर देश-विदेश में नाम कमा रहे हैं। कई बार जब वे वैन आंटी बोलते हैं तो वे समझ नहीं पाती कि उन्होंने बच्चों के लिए कुछ किया या बच्चों ने उनका जीवन संवार दिया है।

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