Mumbai News : सावित्रीबाई फुले जयंती : महिला शिक्षा के लिए ऐसे दिया योगदान की बन गया इतिहास

आज देश की तमाम राजनीतिक पार्टियां महिला शिक्षा को लेकर अलग-अलग दावे पेश कर रही हैं पर वास्तव में इसकी नींव सावित्रीबाई फुले ने 19वीं सदी में ही रख दी थी। सावित्रीबाई फुले एक समाजसेवी और शिक्षिका थीं, जिन्होंने शिक्षा ग्रहण कर समाज की कुरीतियों को मिटाया, साथ ही देश में लड़कियों के लिए शिक्षा के दरवाजे खोल दिए।

By: Binod Pandey

Updated: 03 Jan 2020, 03:59 PM IST

मुंबई. परदा प्रथा और महिलाओं के घर से बाहर जाने पर रोक के युग में महिला शिक्षा की अग्रणी पैरोकार सावित्रीबाई फुले को पहला महिला आधुनिक स्कूल खोलने का श्रेय है। आज जब उनकी जयंती है तो उनकी इस योगदान पर चर्चा सर्वत्र हो रही है, लेकिन उस युग में महिलाओं के लिए एक स्कूल की बात करना उसी तरह है जैसे आज मंगल ग्रह पर जीवन की खोज करने जैसा है।


महिलाओं की शिक्षा की प्रबल समर्थक सावित्रीबाई फुले 1848 में पुणे में देश का पहला आधुनिक महिला स्कूल खोला था. सावित्रीबाई फुले और उनके पति ज्योतिराव फुले ने जातिवाद, छुआछूत और लैंगिक भेदभाव के खिलाफ भी लड़ाई लड़ी थी। इसके बाद यह क्रांतिकारी कदम उठाया जो आज इतिहास बन चुका है, लेकिन आज उन्हीं के पदचिन्हों पर चलकर महिला शिक्षा की बातें जोर-शोर से उठाई जा रही है, महिलाओं को स्वावलंबी बनाया जा रहा है।

Mumbai News : सावित्रीबाई फुले जयंती : महिला शिक्षा के लिए ऐसे दिया योगदान की बन गया इतिहास

आज देश की तमाम राजनीतिक पार्टियां महिला शिक्षा को लेकर अलग-अलग दावे पेश कर रही हैं पर वास्तव में इसकी नींव सावित्रीबाई फुले ने 19वीं सदी में ही रख दी थी। सावित्रीबाई फुले एक समाजसेवी और शिक्षिका थीं, जिन्होंने शिक्षा ग्रहण कर समाज की कुरीतियों को मिटाया, साथ ही देश में लड़कियों के लिए शिक्षा के दरवाजे खोल दिए। जब समाज में लैंगिक आधार पर भेदभाव किए जाते थे, तब किसी महिला स्कूल की बात सोचना भी क्रांति से कम नहीं था।


शिक्षा के साथ स्त्रियों के अधिकार की बात
सावित्री फुले ने अपने पति ज्योतिराव फुले के साथ मिलकर 19वीं सदी में स्त्रियों के अधिकारों, शिक्षा, छुआछूत, सतीप्रथा, बाल-विवाह और विधवा-विवाह जैसी कुरीतियां और समाज में फैले अंधविश्वास के खिलाफ संघर्ष किया। दोनों ने 1848 में पुणे में देश का पहला आधुनिक महिला स्कूल खोला था। सावित्रीबाई फुले और ज्योतिराव फुले ने जातिवाद, छुआछूत और लैंगिक भेदभाव के खिलाफ भी लड़ाई लड़ी थी।

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नौ साल की छोटी उम्र में हो गई थी शादी
सावित्री बाई की शादी नौ साल की बहुत छोटी उम्र में हो गई थी। वर्ष 1840 में उनका विवाह 12 साल के ज्योतिराव फुले से हुआ था। दोनों की कोई संतान नहीं थी इसलिए उन्होंने यशवंतराव को गोद लिया। सावित्रीबाई को पढऩा लिखना उनके पति ने सिखाया। जब वह खुद शिक्षित हो गईं तब उन्होंने अन्य महिलाओं को भी पढ़ाना शुरू कर दिया। 1848 में जब उन्होंने पुणे में स्कूल खोला तो उसमें नौ लड़कियों ने दाखिला लिया था। सावित्रिबाई उस स्कूल की प्रधानाध्यापिका बनीं थीं।

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अस्पताल भी खोली
शिक्षा के अलावा कई अन्य समाजिक सुधार के लिए सावित्रीबाई ने मुहिम शुरू किया था। 19वीं सदी में हिन्दुओं में प्रचलित बाल विवाह के खिलाफ उन्होंने लोगों को जागरुक किया। बेटे के साथ मिलकर 1897 में प्लेग के मरीजों के इलाज के लिए अस्पाताल खोला। पुणे स्थित इस अस्पताल में यशवंतराव मरीजों का इलाज करते और सावित्रीबाई मरीजों की देखभाल करती थीं। इसी दौरान वह खुद भी बीमार हो गईं और 10 मार्च 1897 को उनका देहांत हो गया।


कीचड़ फेंकते थे लोग
महिला शिक्षा की बात पर सावित्रीबाई का जमकर विरोध होता था, लोग उन पर कीचड़ तक फेंंकते थे। इसी वजह से जब वह घर से बाहर निकलती तो एक अतिरिक्त साड़ी लेकर चलती जिससे कीचड़ से सन जाने पर कपड़े बदले जा सके।

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