Mumbai News : प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक का कमाल, सुर्खियों में नौनिहाल, अभिभावकों को रोजगार

  • शिक्षक ने ग्रामीणों का पलायन रोकने के लिए उन्हें हरी सब्जियों की खेती के लिए किया प्रेरित
  • पलायन रुकने से बढ़ी स्कूल में बच्चो की संख्या

By: Binod Pandey

Updated: 24 Jul 2020, 06:46 PM IST

योगेंद्र सिंह
पालघर. कहते हैं कि हौसला मजबूत हो और समाज के लिये कुछ कर गुजरने का जज्बा हो तो बड़ी से बड़ी रुकावट दूर की जा सकती है। इस कहावत को पालघर जिला परिषद के प्राथमिक स्कूल के एक शिक्षक ने सही साबित कर दिखाया है। जनजातीय क्षेत्रों में रहने वाले गरीब आदिवासी परिवार हर वर्ष मजदूरी के लिए शहरों की ओर पलायन कर जाते है। और इनके साथ इनके छोटे-छोटे बच्चे भी चले जाते है।

जिससे वह शिक्षा से वंचित रहकर बाल मजदूरी के जाल में फंस जाते है। शिक्षक के प्रयास से इन ग्रामीणों को क्षेत्र में ही रोजगार मिले जिससे उनका पलायन रुक गया और इससे स्कूल में बच्चों की संख्या में कम नहीं हुई, बच्चे पढ़ रहे हैं तो उनके पिता रोजगार कर सभी का भरण-पोषण कर रहे हैं।

बीड़ जिले के रहने वाले बाबू चांगदेव मोरे ने 2009 में विक्रमगढ़ तालुका के जांभे के जिला परिषद के प्राथमिक स्कूल में एक शिक्षक के रूप में कार्य करना शुरू किया। चार वर्षों बाद उन्हें डोल्हारी बुद्रुक के खोमरपाडा स्थित स्कूल में शिक्षक के रूप में नियुक्ति मिली। इस गांव में 35 परिवार रहते है। और करीब 1500 की इनकी आबादी है। यहां मोरे ने देखा कि मजदूरी के लिए पलायन कर रहे गांव के लोगो के साथ बड़ी संख्या में स्कूल में पढऩे वाले बच्चे भी जा रहे है। जिसके बाद बाबू मोरे ने इस समस्या का हल निकालने की ठानी और कृषि विभाग व शिक्षा विभाग के अधिकारियों की मदद से स्कूल परिसर में खाली पड़ी जगह में लोगो को हरी ताजी सब्जियां उगाने के लिए प्रेरित किया। शिक्षक बाबू मोरे का कहना है, कि शुरू में लोगो को कुछ नया करने के लिए मानसिक रूप से तैयार करना चुनौती थी। लेकिन समझने के बाद गांव के लोग जो अभी तक केवल चावल की खेती पर आश्रित थे वह अब 25 एकड़ में जी जान से मेहनत से सब्जियों की खेती कर अच्छी आय प्राप्त कर रहे है। और अपने परिवार के साथ सुखमय जीवन व्यतीत कर रहे है। एक ग्रामीण ने बताया कि शिक्षक बाबू मोरे ने जीवन को नई राह दी है। शिक्षक के सार्थक प्रयास की जिले भर में प्रशंसा हो रही है।

लोगों ने मदद के लिए बढ़ाया हाथ
शिक्षक बाबू मोरे के अनोखे उपक्रम को मुंबई की अक्षरधारा नामक संस्था का भी साथ मिला है। और उसने ग्रामीणों की मदद के लिए एक लाख 35 हजार रुपये की मदद दी है। 2019-20 में ग्रामीणों ने 35 टन प्याज का उत्पादन किया है।


सब्जियों की भरमार
ग्रामीण अलग-अलग क्यारियों में धनिया, मेथी, पालक और चौलाई लगाई गई। भिंडी,फूलगोभी, पत्तागोभी, टमाटर और बैगन के लिए अलग-अलग लाईन में थरहा तैयार किया जाता है। और यहां कई प्रकार की सब्जियों की भरमार रहती है। ग्रामीण आस-पास के बाजारों और मुंबई के व्यापारियों को सब्जियां बेच रहे है।

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स्कूलों में बढ़ी बच्चो की संख्या
शिक्षक का प्रयास अब रंग लाया है। सब्जियों से हो रही आय से लोगों के परिवार चल रहे हैं। जिससे मजदूरी के लिए लोगों का गांव से होने वाला पलायन काफी हद तक रुक गया है। जिसका परिणाम है, कि जिस स्कूल में पहले 60 बच्चे थे वहां अब बच्चों की संख्या 115 तक पहुंच गई है। और यह बच्चे बाल मजदूरी से बचकर स्कूल में शिक्षा प्राप्त कर अपना भविष्य संवार रहे हैं।


स्कूल बंद लेकिन बच्चों के लिए उपलब्ध शिक्षक
कोरोना संक्रमण के कारण स्कूल बंद है। लेकिन, ग्रामीणों को अपना परिवार मानने वाले शिक्षक बाबू मोरे गांव में ही डटकर बच्चों के सीधे संपर्क में हैं। और उन्हें कोरोना के संक्रमण से बचने के लिए जागरूक कर आगे बढऩे के लिए लगातार प्रेरित कर रहे है।

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