script10101 | इतिहास के इन रहस्‍यों सेे अनभिज्ञ राजस्‍थान की नई पीढी | Patrika News

इतिहास के इन रहस्‍यों सेे अनभिज्ञ राजस्‍थान की नई पीढी

हजारों-लाखों वर्ष पुराना इतिहास स्कूल और कॉलेजों के पाठ्यक्रम में नगण्य

नागौर

Published: December 08, 2021 06:02:34 pm

रुद्रेश शर्मा @ नागौर
राजस्थान मानव सभ्यता के विकास का केंद्र रहा है। इसके कई प्रमाण प्रदेश के विभिन्न जिलों में मिल चुके हैं। लेकिन हमारे स्कूल और कॉलजों में पढ़ रहे विद्यार्थी इस पुरातात्विक इतिहास से अनभिज्ञ हैं। फिलहाल स्कूल और कॉलेजों में इसका नाममात्र इतिहास पढ़ाया जा रहा है।
Shail Chitra
बूंदी जिले में लाखों साल पुराने शैल चित्र
जानकारों के मुताबिक राजस्थान में कालीबंगा (हनुमानगढ़), डीडवाना (नागौर), बिंजोर (श्रीगंगानगर), सुनारी, नीम का थाना (झुंझुनु), बेराट्, सांभर (जयपुर), आहड़ (उदयपुर) सहित कई जिलों में हजारों लाखों सालों पहले मानव सभ्यता के अवशेष मिल चुके हैं। इनमें से कई जगह भारतीय एवं राजस्थान के पुरातत्व विभाग ने उत्खनन कार्य किया है। आर्किओलोजिकल स्टडी के लिए प्रसिद्ध पुणे स्थित डेकन कॉलेज के कई शोधार्थियों ने इन पर कार्य किया है। राजस्थान पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग जयपुर के अलावा उदयपुर स्थित राजस्थान विद्यापीठ प्रदेश का एकमात्र ऐसा विश्वविद्यालय है। जिसने लगभग सात से आठ पुरास्थलों में उत्खनन किया है। इस कार्य को प्रो.ललित पांडेय ने प्रारंभ कराया था। नागौर जिले के डीडवाना में पौने दो लाख वर्ष प्राचीन पाषाण उपकरण मिलते हैं। जो पाषाण युग के मानव के सबसे प्रारंभिक प्रमाण हैं।
कुक्की ने खोजे लाखों वर्ष पुराने शैल चित्र
बूंदी निवासी पुरा अन्वेषण ओमप्रकाश कुक्की प्रदेश के कई जिलों में लाखों वर्ष पुराने आदि मानव के बनाए शैल चित्र (रोक पेंटिंग) व पाषाण युग के औजार खोज चुके हैं। वे बताते हैं कि बूंदी व भीलवाड़ा जिले के पठारी क्षेत्र में उन्होंने विश्व की सबसे लम्बी (३५-४० किमी) रोक पेंटिंग खोजी है। कुक्की बूंदी, बारां, झालावाड़, करौली, भीलवाड़ा, चित्तौड़, टोंक, अलवर में करीब सौ से अधिक पुरा महत्व की साइट्स खोजने का दावा करते हैं। वे बताते हैं कि ये सभी लाखों वर्षो पुराने पाषाण युग के हैं। पुरातत्व विभाग सहित कई प्रतिष्ठित संस्थान इन पर शोध कर चुके हैं।

कॉलेज में पढ़ा रहे सिर्फ सिंधु घाटी सभ्यता
अभी मात्र कॉलेजों में इतिहास विषय में राजस्थान की सिंधु घाटी सभ्यता ही विद्यार्थियों को पढ़ाई जा रही है। नागौर के डॉ.बी.आर. मिर्धा कॉलेज में इतिहास के व्याख्याता डॉ.रणजीत पूनिया के अनुसार फिलहाल राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र में सिंधु घाटी सभ्यता का कुछ हिस्सा ही कॉर्स में शामिल है। जबकि पाषाण काल तो इससे भी लाखों वर्ष पहले का है। स्कूल व्याख्याता जगदीश विश्नाई के अनुसार अभी स्कूलों के इतिहास विषय में राजस्थान में मानव सभ्यता के विकास का कालखंड शामिल नहीं है।
राजस्थान मानव सम्यताओं के विकास का केंद्र रहा है। प्रदेश के कई जिलों में पुरातात्विक महत्व के स्थान विभिन्न स्तर पर हुए उत्खनन में प्राप्त हो चुके हैं। लेकिन पाठ्यक्रम में इनका बहुत कम हिस्सा है। इन्हें स्कूल व कॉलेजों के पाठ्क्रम में शामिल कर पढ़ाया जाना चाहिए।
- प्रो. ललित पांडेय, पुरातात्विक इतिहास विशेषज्ञ, उदयपुर
नागौर जिले के डीडवाना सहित प्रदेश में कई स्थानों पर प्रागैतिहासिक कालीन खोजें हो चुकी है। इन्हें पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए ताकि विद्यार्थी इनके बारे में जान और समझ सके।
- डॉ.अरुण व्यास, विभागाध्यक्ष, भूगर्भ शास्त्र, बांगड़ कॉलेज, डीडवाना

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