scriptBirth of pre-mature children increased after corona in Nagaur | कोरोना के बाद नागौर की महिलाओं में बढ़ गई ये समस्या, जानिए क्या हुआ | Patrika News

कोरोना के बाद नागौर की महिलाओं में बढ़ गई ये समस्या, जानिए क्या हुआ

महिलाओं द्वारा गुटखे का सेवन करना भी बन रहा बच्चों की कमजोरी का बड़ा कारण

कोरोना महामारी के बाद बढ़ा प्री-मैच्योर व कम वजन वाले बच्चों के जन्म का आंकड़ा

जेएलएन राजकीय जिला अस्पताल में वर्तमान में भर्ती हैं प्री-मैच्योर पांच बच्चे

नागौर

Published: July 12, 2022 09:19:03 pm

नागौर. नागौर जिला मुख्यालय के जेएलएन अस्पताल की एमसीएच विंग के एसएनसीयू वार्ड में जून 2021 से 30 जून 2022 तक की अवधि में 1156 नवजात ऐसे भर्ती किए गए हैं, जो प्री-मैच्योर हैं और वजन भी ढाई किलो से कम है। चिंता की बात यह भी है कि इसमें ढाई किलो से कम वजन वाले नवजातों की संख्या जहां 684 है, वहीं डेढ़ किलो से कम वजन वाले नवजात भी 472 हैं, जिन्हें करीब एक-एक महीने तक एसएनसीयू में भर्ती रखना पड़ रहा है। प्रसूति रोग विशेषज्ञों का कहना है कि प्री-मैच्योर बच्चों के जन्म की समस्या कोरोना महामारी के बाद ज्यादा बढ़ी है। यानी कोरोना महामारी का यह साइड इफैक्ट है कि बच्चे प्री-मैच्योर पैदा हो रहे हैं। डॉक्टरों का यह भी कहना है कि कोरोना के बाद प्रजनन (फर्टिलिटी) दर भी कम हुई है। पहले महिला को दवा देने के बाद उसका असर आ जाता था, लेकिन अब दवा भी कम असर कर रही है।
Birth of pre-mature children increased after corona in Nagaur
Birth of pre-mature children increased after corona in Nagaur
एमसीएच विंग के एसएनसीयू वार्ड में भर्ती होने वाले कुल नवजात बच्चों में 50 से 60 फीसदी बच्चे प्री-मैच्योर व कम वजन वाले हैं। इससे बड़ी चिंता यह है कि इसमें 20 फीसदी नवजात तो डेढ़ किलो से कम वजन वाले जन्में हैं। यह आंकड़े तो केवल जिला मुख्यालय के सरकारी अस्पताल के हैं, इसके अलावा जिले के अन्य अस्पतालों एवं दूसरे जिलों में होने वाले प्रसव में भी कई बच्चे प्री-मैच्योर व कम वजन वाले हैं।
प्री मैच्योर मतलब...

प्री-मैच्योर बेबी यानि जिन बच्चों का जन्म नौ महीने से पहले हो जाता है। इन बच्चों का जन्म सातवें या आठवें महीने में होता है और इनकी इम्यूनिटी नौ महीने के बाद पैदा हुए बच्चों की तुलना में कमजोर होती है, इसलिए इन्हें ज्यादा और खास देखभाल की जरूरत होती है। विशेषज्ञों के अनुसार प्रेग्नेंसी के 37वें सप्ताह से पहले पैदा हुए बच्चों को प्री-टर्म बेबी कहा जाता है। इन बच्चों को इंफेक्शन लगने का खतरा रहता है और ये फुल टर्म बेबी की तरह पूरी तरह से विकसित भी होते हैं। यही वजह है कि प्रीमैच्योर बेबी को ज्यादा समय तक अस्पताल में रहना पड़ता है।
29 दिन बाद दी छुट्टी

निरमा नाम की महिला के प्री-मैच्योर बच्चा होने पर उसे 13 जून को एमसीएच विंग के एसएनसीयू में भर्ती किया गया। कम वजन एवं सांस में तकलीफ की वजह से उसे भर्ती किया गया। सही समय पर बच्चे को जीवनरक्षक दिया गया तथा डॉक्टरों द्वारा इलाज एवं रेज़िडेंट्स व नर्सिंग स्टाफ़ कि नियमित निगरानी के चलते बच्चे के स्वास्थ्य में सुधार आया और वजन बढ़ने लगा तो सोमवार को उसे 29 दिवस बाद डिस्चार्ज किया गया।
बढ़ रही है प्री-मैच्योर बच्चों की संख्या
अस्पताल में पिछले एक साल में जन्म लेने वाले बच्चों में 1156 नवजात ऐसे हैं, जिनका वजन कम होने के कारण उन्हें एसएनसीयू में भर्ती किया गया। लेकिन रेज़िडेंट डाक्टर्स की उपलब्धता के चलते 24 घंटे ऐसे केसेज़ की निगरानी और भी बेहतर हो गई है एवं बच्चों को और भी बेहतर सुविधा मिले इसके प्रयास भी निरंतर किए जा रहे हैं। बच्चों के प्री-मैच्योर जन्म लेने के पीछे कई कारण हैं। इसमें दो बच्चों के बीच तीन साल से कम अंतर व तीन-चार बच्चों के बाद होने वाले बच्चों का भी वजन कम होता है।
- डॉ. विकास चौधरी, प्रभारी, एसएनसीयू, जेएलएन अस्पताल, नागौर
कोरोना के बाद बढ़ी परेशानी
कोरोना के बाद प्री-मैच्योर बच्चों की जन्म दर बढ़ गई है। हालांकि पहले भी होते थे, लेकिन कोरोना महामारी के बाद प्री-मैच्योर डिलीवरी, पेट में बच्चे का खत्म होना तथा गर्भपात की समस्या बढ़ी है। इसके अलावा फर्टिलिटी रेट भी कम हुई है। बच्चों के प्री-मैच्योर पैदा होने का एक बड़ा कारण महिलाओं द्वारा गुटखे का ज्यादा सेवन करना भी सामने आ रहा है।
- डॉ. रामस्वरूप सांखला, स्त्री रोग विशेषज्ञ, जेएलएन अस्पताल, नागौर

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