scriptBisrais got support from their loved ones | अपनों से छूटा साथ तो नसीब ने थामा हाथ | Patrika News

अपनों से छूटा साथ तो नसीब ने थामा हाथ

रवीन्द्र मिश्रा
नागौर . कहते हैं ‘जिसका कोई नहीं उसका तो खुदा है यारों...’। यह बात अपनों से बिसराए इन बुजुर्गों पर सटीक बैठती है, जो आज वृद्धाश्रम में रहकर खुद को खुश नसीब समझते हैं। आश्रम की व्यवस्था भी ऐसी कि अब कोई यहां से जाना नहीं चाहता।

नागौर

Updated: January 11, 2022 08:10:46 pm

- कुछ ने परिवार वालों की रुसवाई से परेशान होकर घर छोड़ा

- कोई अकेला गुजार रहा था जिंदगी तो आश्रम बना सहारा

- नागौर के राठौड़ी कुआं में संचालित वृद्धाश्रम में प्रसन्न जीवन गुजार रहे बुजुर्ग
अपनों से बिसरायों को मिला सहारा
नागौर. वृद्धाआश्रम में निवासरत बुजुर्ग
हम बात कर रहे हैं नागौर शहर में ग्रीन वैल चिल्ड्रन सोसायटी की ओर से संचालित वृद्धाश्रम की। राठौड़ी कुआं स्थित इस वृद्धाश्रम की शुरुआत 2018 में एक वृद्ध को रखकर की गई थी। आज यहां बारह बुजुर्ग अपना जीवन बिता रहे हैं। इनमें कोई अपनों से बिसराया हुआ है तो कोई ऐसा भी है जिसका कोई नहीं है। यहां अब्दुला भी है तो हनुमान भी। साथ रहना-साथ खाना और भगवान के भजन ने इनकी जिंदगी में फिर से रंगभर दिए हैं। विडम्बना यह है कि जिन बुजुर्गों को परिजन खुद छोड़ कर गए, उन्होंने वापस मुंह मोड़ कर नहीं देखा।
आश्रम में पांच लोगों का स्टाफ है, जो बुजुर्गों की सेवा सुश्रुषा में जुटा है। इनमें एक अधीक्षक सहित दो रसोईया व तीन सेवादार हैं। जो इनकी देखभाल करते हैं। पूरी तरह दानदाताओं पर निर्भर इस आश्रम को सरकार से फिलहाल कोई सहयोग नहीं मिल रहा।
इनकी कहानी इन्ही की जुबानी

घरवालों से बनी नहीं तो वृद्धाश्रम आया
ढिंगसरा गांव के 70 वर्षीय भीखाराम नायक का बेटे-बहुओं सहित भरापूरा परिवार था। लेकिन आपस में स्वभाव मेल नहींं खाने के कारण नागौर आ गए। यहां लक्ष्मीतारा सिनेमा के पास किराए का कमरा लेकर रहते और खुद ही बनाकर खाते थे। कुछ समय पहले उनके पैरों में जख्म हो गया। जख्म भी ऐसा कि उसने नासूर का रूप ले लिया। इस बीच उनके जंवाई को वृद्धाश्रम के बारे में जानकारी मिली। उसने यहां के व्यवस्थापक से सम्पर्क किया और भीखाराम को रखने की बात की। व्यवस्थापक के मंजूरी देने पर तीन साल पहले वह उसे यहां छोड़ गया। वृद्धाश्रम के सेवादारों ने उसकी काफी देखरेख की। इतना ही नहीं खुद अधीक्षक सुनील गोस्वामी ने उसके जख्मों की मरहम पट्टी की और नियमित रूप से अस्पताल मेंं उपचार करवाया। आज हालत यह है कि वह खुद अपने पैरों पर दौडऩे लगे हैं। भीखाराम के मन में टीस है तो बस इतनी कि तीन साल में कोई भी परिजन उसकी सुध लेने नहीं आया। यहां तक कि जवांई ने भी दुबारा आकर नहीं संभाला। अब वह वृद्धाश्रम में काफी आराम से है। और यहां के स्टाफ के लिए दिल से दुआएं देता है।
खून बेचकर घर भेजता था रुपए

वृद्धाश्रम में दिन गुजार रहे 65 वर्षीय प्रकाशचंद गुप्ता की कहानी भी दिल को छूने वाली है। कभी अपने शरीर से खून का कतरा बेचकर घर वालों को रुपए भेजने वाले गुप्ता वृद्धाश्रम की टीम के सम्पर्क में आए और आज वे यहां सुखी और स्वस्थ्य जीवन यापन कर रहे हैं। आश्रम में भजनों की स्वर लहरियां बिखरते हुए बातचीत में अपना दर्द बयां करते हुए गुप्ता ने बताया कि वे मूलरूप से मध्यप्रदेश में श्यामगढ़ के रहने वाले हैं। तीन भाइयों में वे मझले हैं। उनकी शादी नहीं हुई। तीनों भाई गांव में किराणा की दुकान करते थे। बाद में भाई अपने परिवारों में व्यस्त हो गए। उनकी ओर किसी का ध्यान नहीं रहने से वे एक दिन ट्रेन में बैठकर जयपुर आ गए। वे रेलवे स्टेशन और बस स्टैण्ड पर दिन काटने लगे। कोई दानदाता भोजन दे जाता तो पेट भर लेते। बाद में वह खून बेचने वाले दलालों के सम्पर्क में आ गए। और अपने शरीर का खून बेचने लगे। एक बार खून देने पर दलाल उन्हें 800 रुपए देते। इससे वह अपना गुजारा चलाने लगे। कई बार तो वह दिन में दो बार खून देते थे। इनमें से कुछ पैसे बचने पर वह घर भाइयों को भेजते। घर वालोंं ने उसके पैसे तो रख लिए, लेकिन आज तक उनकी सुध नहीं ली। एक बार आश्रमवालों ने उसे आने जाने का टिकट व नए कपड़े बनवाकर गांव भी भेजा पर परिवार ने खास तवज्जो नहीं दी। वह अब आश्रम से कहीं नहीं जाना चाहते।
साथ वाले ही करने लगे शोषण

वृद्धाश्रम में रहने वाली 70 वर्षीय वच्छला बाई की कहानी भी कुछ कम दर्दभरी नहीं है। वच्छला बाई महाराष्ट्र के अमरावती की रहने वाली है। उसके एक बेटी है, जिसकी शादी होने के बाद वह एकाकी जीवन बिताने लगी। वह ट्रेनों में भीख मांगकर अपना पेटभरती थी। एक बार ट्रेन में भीख मांगती हुई वह नागौर पहुंच गई। वह यहां भिखारी गिरोह के चंगुल में फंस गई। ये लोग उससे दिनभर भीख मंगवाते और शोषण करते। इससे वह सदमे में आकर सुधबुध खो बैठी। वह अपना नाम तक भूल गई और किसी को भी पास आता देख सहम जाती। एक दिन वृद्धाश्रम की टीम उसके लिए नया सवेरा बनकर पहुंची। पहले तो वह टीम के लोगों को देखकर डर गई। बाद में उसे बातचीत में दिलासा दी और वृद्धाश्रम लाया गया। आश्रम के केयर टेकर छगन सिंधी बताते हैं कि उसके दिलोदिमाग में इतना डर था कि वह पानी तक से डर जाती थी। उसे स्नान किए हुए भी काफी समय हो गया था। आज वह यहां आराम से रह रही है। खास बात यह है कि उसकी याददाश्त भी लौटने लगी है। यही स्थिति अब्दुला की है। वह भी महाराष्ट्र का रहने वाला है। उसके आगे-पीछे कोई नहीं है। आश्रम की टीम उसे अजमेर स्टेशन से लेकर आई थी। वह स्टेशन के बाहर जो कुछ मिल जाता, उसी से पेटभर कर जीवन काट रहा था। यहां उसके भी अच्छे दिन आ गए।
पेंशनर को भी चाहिए सुकून
आश्रम में रहने वाले हनुमानराम (बदला हुआ नाम) अपने जीवन का अंतिम पड़ाव सुकून से बिताने के लिए खुद ही वृद्धाश्रम में चले आए। उनके तीन पुत्र व तीन बेटियां है। वे खुद आर्मी से सेवानिवृत्त हैं। जोधपुर में उनका खुद का मकान है। परिवार में बच्चों व उनके विचार मेले नहीं खाने से हमेशा घर में कलह का वातावरण रहता था। इससे तंग आकर वे खुद ही यहां रहने चले आए । अब हमउम्र के साथियों के बीच अच्छा लगता है। दोनों वक्त का भोजन और भजन समय पर मिल जाता है और इस उम्र में चाहिए क्या। आश्रम के लोग सभी का पूरा ख्याल रखते हैं।
डरे सहमे मिलते हैं ये लोग

वृद्धाश्रम के अधीक्षक बताते हैं कि स्टेशन, बस स्टेण्ड या किसी प्रमुख मंदिर के बाहर जीवन काटने वाले बुजुर्गों के बारे में हमें जानकारी मिलती है तो टीम वहां पहुंचती है। कई बार टीम के लोगों को देखकर ये सहम जाते हैं। इन्हें संदेह होता है कि कहीं ये किडऩी बेचने वाले, नशे का कारोबार करने वाले या फिर भीख मंगवाने वाले गिरोह के लोग तो नहीं हैं। ऐसी विकट परिस्थिति में शहर के स्थानीय व्यक्ति व समाजसेवियों जो रोजाना इन लोगों के सम्पर्क में रहते हैं, उनका सहयोग लेकर इनसे बातचीत करते हैं। उनकी साइकोलॉजी पढ़ते हैं। इसके बाद समझाइश कर उन्हें वृद्धाश्रम में आने के लिए तैयार करते हैं। एक बार आश्रम में आने के बाद वे लोग वापस जाना नहीं चाहते। एक सर्वे के अनुसार आज भी जोधपुर में 3 से 4 हजार वृद्ध ऐसे हैं जो भटकते रहते हैं, लेकिन वृद्धाश्रम में नहीं आना चाहते। इसके पीछे एक कारण अनुशासन भी है। उनको बंधकर रहना पसंद नहीं है। शुरुआत में यहां तीन लोग आए थे, लेकिन नशे के आदि होने के कारण चले गए। दूसरा, कुछ लोग घर में रहते हुए भी बेहद परेशान है पर समाज के डर से वृद्धाश्रम नहीं आते।
सुनील गोस्वामी,
अधीक्षक, वृद्धाश्रम , राठौड़ी कुआं, नागौर।

इनका कहना

वृद्धाश्रम फिलहाल भामाशाहों के सहयोग से चल रहा है। सरकार से सहायता के लिए एप्लाई किया था, लेकिन अभी कुछ नहीं हुआ। सबसे ज्यादा आवश्यकता खुद के भवन की है। सरकार जमीन आवंटित कर दे तो दानदाताओं के सहयोग से अच्छा भवन तैयार करवा सकते हैं।
साहेबराम चौधरी, संस्थापक, वृद्धाश्रम, नागौर।

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