वीडियो : पत्तों को पानी देकर पेड़ को स्वस्थ नहीं रख सकते - डॉ. कोठारी

आचार्य महाप्रज्ञ प्रज्ञा संवर्धिनी व्याख्यानमाला में राजस्थान पत्रिका के प्रधान संपादक डॉ.गुलाब कोठारी का व्याख्यान

By: shyam choudhary

Published: 10 Apr 2019, 01:05 PM IST

नागौर. ‘जब हम किसी समाज को बदलने की बात करते हैं, सुधारने की बात करते हैं, तब व्यक्ति केन्द्र में होता है। जड़ अगर स्वस्थ है तो पेड़ स्वस्थ होगा, हम पत्तों को पानी देकर पेड़ को स्वस्थ नहीं रख सकते। अगर हम आचार्य महाप्रज्ञ के जीवन को देखें तो हमें हर पन्ने पर कुछ न कुछ नया सीखने को मिल जाता है। अफसोस तब होता है जब हम आंख मूंद कर परम्परा के निर्वहन रूप में कुछ काम करते चले जाते हैं और आचार्य तुलसी और आचार्य महाप्रज्ञ ने जो तत्व ज्ञान दिया, उस तत्व की बात छोड़ते जा रहे हैं, याद नहीं कर पा रहे हैं या हम उनकी चर्चा नहीं कर पा रहे हैं।

यह विचार राजस्थान पत्रिका के प्रधान संपादक डॉ.गुलाब कोठारी ने लाडनूं स्थित जैन विश्व भारती विश्वविद्यालय में मंगलवार को महादेव लाल सरावगी अनेकांत शोधपीठ के अंतर्गत संचालित आचार्य महाप्रज्ञ प्रज्ञा संवर्धिनी व्याख्यानमाला -7 में व्यक्त किए। डॉ. कोठारी ने कहा कि यहां मूल प्रश्न यह उठता है कि क्या हम एक अच्छे समाज के प्रति चिंतित हैं। अगर हमारे मन में यह चिंता है तो हम समाज हित में चर्चा जरूर करते। उन्होंने कहा कि उन्हें आचार्य महाप्रज्ञ से जुड़े रहने की खुशी है, आचार्य महाप्रज्ञ कभी अकेले नहीं जीए। उन्होंने कभी किसी काम का श्रेय अपने ऊपर नहीं लिया। उन्होंने हमें तत्व ज्ञान का बोध कराया।

खुद को गौण रखना सीखें
डॉ.कोठारी ने कहा कि महाप्रज्ञ आज भी तरंगों के रूप में हमारे मध्य उपस्थित हैं, उनके आधे शरीर में आचार्य तुलसी तो आधे शरीर में आचार्य महाश्रमण नजर आते थे, उन्होंने समाज को रूपांतरित करने का कार्य किया था, वे सदैव कर्म में लीन रहकर श्रेय से दूर रहते थे। जो व्यक्ति खुद को गौण रखना चाहता है, वही महान होता है। मात्र अपनी सोचने वाला असल में सबसे छोटा होता है। पूरे परिवार में मां बड़ी होती है, वह सबका ख्याल रखती है, लेकिन वह कभी खुद को आगे नहीं लाती। उन्होंने कहा कि आज तक कोई बीज नहीं बना, जो अपने फल खुद खा सके। समाज को कुछ देने के लिए खुद के अस्तित्व को भूलना पड़ता है। जिस प्रकार बीज जमीन में गडकऱ पेड़ बनता है, उसी प्रकार हमें पेड़ बनकर दूसरों को छाया देनी हैं, फल देने हैं।

अपरिग्रह व अहिंसा को जानें
डॉ.कोठारी ने जैन धर्म के सिद्धांतों की बात करते हुए कहा कि हमने अपने अंदर हिंसा पाल रखी है, अहिंसा व अपरिग्रह के बारे में जाना ही नहीं। उन्होंने वर्तमान समय में साधु-संतों द्वारा किए जा रहे अनावश्यक खर्च की ओर इशारा करते हुए कहा कि दूसरों को अपरिग्रह का संदेश देने वाले खुद परिग्रह की ओर जा रहे हैं। जिंदगी को बनाने का दायित्व आप स्वयं पर है, यदि इसे नकार दिया तो कीमत आपको स्वयं चुकानी पड़ेगी। आधुनिक परिदृश्य पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि आज मनुष्य पीछे छूट गया है और कम्प्यूटर आगे निकल गया है। जीवन संतुलित होना चाहिए, सुख में नाचने या दु:ख में रोने की आवश्यकता नहीं है, परिवर्तन तो प्रकृति का नियम है। स्वयं का आत्मविश्लेषण करें, क्योंकि प्राण के बिना शरीर भी निर्जीव है।

डॉ. कोठारी एमिरेट्स प्रोफेसर पद पर नियुक्त
आचार्य महाप्रज्ञ प्रज्ञा संवर्धिनी व्याख्यानमाला के दौरान जैन विश्व भारती संस्थान के कुलपति प्रोफेसर बीआर दुग्ग्ड़ ने मुख्य वक्ता डॉ.गुलाब कोठारी को संस्थान के जैन विद्या एवं तुलनात्मक धर्म तथा दर्शन विभाग में एमिरेट्स प्रोफेसर के पद पर नियुक्त किया। प्रोफेसर दुग्गड़ ने विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों से कहा कि अब संस्थान एवं विभाग में डॉ. कोठारी के शैक्षणिक अनुभवों का लाभ नियमित मिल सकेगा। प्रोफेसर आनंद प्रकाश त्रिपाठी ने अतिथियों का परिचय कराया। मंच पर समाजसेवी भागचंद बरडिय़ा, प्रो. समणी ऋजु प्रज्ञा उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन शोधपीठ के सहायक निदेशक डॉ. योगेश कुमार जैन ने किया।

 

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