script'Censor' on water wastage in JLN | जेएलएन में पानी की बर्बादी पर ‘सेन्सर’ | Patrika News

जेएलएन में पानी की बर्बादी पर ‘सेन्सर’

रवीन्द्र मिश्रा

नागौर. रहीमदास जी ने कहा है रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून... । यानी पानी का हमेशा संचय कीजिए, क्यों कि पानी के बिना सबकुछ सूना है। लेकिन आज के दौर में जल संरक्षण और संचय को लेकर लोग लापरवाही बरत रहें है।

नागौर

Published: December 07, 2021 05:50:59 pm

नवाचार : सेंसर से बंद-चालू होती है पानी की सप्लाई, टंकी भरने पर स्वत: बंद हो जाती है मशीन

-नागौर में राजस्थान की पहली सरकारी इमारत जहां सेंसर रोकता है पानी

- नागौर के जेएलएन अस्पताल की एमसीएच विंग में ऑटोकट से रुक रही पानी की बर्बादी
- ऊपर की टंकी खाली होने पर चल जाती है पम्प हाउस की मोटर
जेएलएन में पानी की बर्बादी पर ‘सेन्सर’
नागौर. एससीएच विंग में बने पम्प हाउस में लगे सेन्सर।
यही कारण है कि हर साल गर्मियों के मौसम में लोगों को पेयजल संकट का सामना करना पड़ता है। पश्चिमी राजस्थान के मारवाड़ में तो हालत और भी विकट हो जाती है। इसी पानी की बर्बादी को रोकने के लिए नागौर जिला मुख्यालय स्थित जवाहरलाल नेहरू राजकीय चिकित्सालय (जेएलएन अस्पताल) के प्रबंधन ने आज अस्पताल की एमसीएच विंग में बने पम्पहाउस में लगाए गए सेन्सर मशीन को ऑटोमैटिक रूप से बंद व चालू कर देते हैं। इससे पानी की बर्बादी रुकने में काफी हद तक मदद मिली है। दावा किया जा रहा है कि जेएलएन भवन प्रदेश का पहला ऐसा सरकारी भवन है, जहां पानी की सप्लाई पर सेंसर का कंट्रोल है। राजधानी तक के सरकारी भवनों में ऑटोमैटिक जलापूर्ति की व्यावस्था नहीं है।
दिल्ली में देखा उपकरण नागौर में हुआ नवाचार
जेएलएन चिकित्सालय के इलेक्ट्रिशियन सुखाराम चौधरी एकबार दिल्ली गए थे। वहां उन्होंने किसी से इस तरह की मशीन के बारे में सुना कि वह पानी की मोटर को स्वत: ही बंद और चालू कर देती है। उसके बाद सुखाराम उस मशीन की तलाश में जुट गए। दिल्ली के भागीरथ पैलेस में एक दुकान पर उन्हें सेन्सर मशीन मिली। एक मशीन लाकर पहले उन्होंने अपने मकान की मोटर में लगाई। उसे मोटर से कनेक्ट करने के बाद ऊपर की टंकी मेंं पानी खाली होने पर हौद की मोटर स्वत: ही चल जाती और टंकी भरने पर मोटर बंद हो जाती। यह सुविधा देख उन्होंने जेएलएन अस्पताल के पीएमओ को अस्पताल की टंकियों को इससे जोडऩे का प्रस्ताव रखा, लेकिन कोई ध्यान नहीं दिया। बाद में डाक्टर शंकरलाल जब पीएमओ बने तो उन्हें इसके बारे में बताया। उन्हें सुखराम का नवाचार पसंद आया।
फरवरी 2020 में शुरू हुआ काम
अस्पताल मेंं राजस्थान मेडिकल रिलीफ सोसायटी (आरएमआरएस) की 25 नवम्बर 2019 को हुई बैठक में तत्कालीन कलक्टर दिनेश यादव ने चिकित्साल के मुख्य भवन व एमसीएच विंग के ऊपर लगी पानी की टंकियों को ऑटोसेन्सर लगाकर एक ही पाइप से जोडऩे की अनुमति दी। इसके बाद एमसीएच विंग के ऊपर लगी पानी की तीन टंकियों को नीचे बने पम्पहाउस में तीन अलग-अगल मोटरें लगाकर ऑटो सेन्सर से जोड़ा गया। इसके बाद एमसीएच विंग में नर्सिंग अधीक्षक कार्यालय के ऊपर बनी पानी की टंकी को दो इंच की पाइप लाइन डालकर जेएलएन की सभी 85 टंकियों को ऑटोमैटिक सिस्टम से जोड़ा गया। एमसीएच विंग मेंं करीब 10-10 हजार लीटर की तीन टंकिया ऊपर बनी हुई है तथा नीचे करीब साढ़े सात लाख लीटर का 35 फीट चौड़ा व 80 फिट लम्बा हौद बना हुआ है। जिसमें चार मोटर लगाई हुई है तथा जेएलएन की 85 छोटी टंकियों को इनसे जोड़ा गया है।

इन वार्डों को जोड़ा
अस्पताल के मेल सर्जिकल वार्ड, फिमेल सर्जिकल वार्ड, मेल मेडिकल वार्ड, फिमेल मेडिकल वार्ड, पुराना जेएसवाई वार्ड, लैब, ब्लड बैंक,एआरटी सेन्टर, ओटी, एक्स रे रूम, आई वार्ड, आई सीयू सहित अन्य वार्डो व ऑफिस आदि की टंकियां ऑटोकट सिस्टम से जुड़ी
हुई है।
ऐसे करता है सेन्सर काम
ऑटोकट सेन्सर सिंगल फेज की मोटर के साथ जुड़ता है, जो 250 वोल्ट के करंट पर चालू होता है। लेकिन सेन्सर 12 वॉल्ट बिजली ही यूज करता है। इससे किसी व्यक्ति को करंट आने की संभावना ना के बराबर होती है। इसे पम्पहाउस में मोटरों के स्विच के पास जोड़ा हुआ है। इसमें पांच तार होते हैं, तीन तार (टोप- मीडियम- बोटम) ऊपर की टंकी में जोड़े हुए होते हैं तथा दो तार पम्प हाउस की मशीन से जोड़े हुए है। दो अन्य तार स्विच व पैनल से जोड़े गए है। टॉप लेवल (टंकी पूरी भरी होने ) पर सेन्सर काम नहीं करेगा। ऊपर टंकी का जल स्तर मीडियम स्तर पर आने पर पम्पहाउस की मोटर स्वत: चालू हो जाती और जलस्तर बोटम लेवल रहने पर लगातार मोटर चलती है और ऊपर की टंकी भरने पर मोटर स्वत: बंद हो जाती है। इसके लिए नीचे बने हौद में करीब एक फीट पानी रहना जरूरी है, ताकि कम पानी के कारण मोटर नहीं जले। एक फीट से ऊपर पानी रहने पर मोटर अपने आप चालू हो जाती है और पानी ऊपर चढऩे लगता है। यदि शहरवासी इस सेन्सर प्रणाली को निजी मकानों में काम लें तो नागौर में जल की बर्बादी को काफी हद तक रोका जा सकता है।

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