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नागौर

देश में चार साल पहले होनी थी जनगणना, अब तक नहीं हुई, जानिए मोदी सरकार क्यों नहीं करवा रही जनगणना

– जनगणना के अभाव में 2011 की जनसंख्या के आधार पर तय हो रही हैं नीतियां व बजट
– कोरोना महामारी में भारत सरकार ने टाली थी जनगणना, लेकिन चार साल बीतने को आए, फिर भी शुरू नहीं करवाई

नागौरJul 11, 2024 / 09:58 am

shyam choudhary

World Population Day
नागौर. जनगणना किसी देश में लोगों की केवल संख्या की गिनती नहीं है, यह निम्न स्तर पर निर्णय लेने के लिए जरूरी बहुमूल्य आंकड़े उपलब्ध कराती है। यह एक महत्वाकांक्षी अभ्यास है, जिसके जरिए प्रशासकों, नीति निर्माताओं, अर्थशास्त्रियों और जनसंख्याविदों को ढेर सारे आंकड़े मिलते हैं। यह आंकड़े उन लोगों के लिए भी उपयोगी हैं, जो यह जानना चाहते हैं कि दुनिया भर में दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला देश भारत किस दिशा में आगे बढ़ रहा है। दरअसल, इन आंकड़ों की बदौलत ही सरकार राज्य को बजट आवंटित करती है। इन सब के बावजूद भारत में चार साल पहले होने वाली 2021 की जनगणना अब तक शुरू नहीं हो पाई है। हर वर्ष 11 जुलाई को विश्व जनसंख्या दिवस इसलिए मनाया जाता है कि ताकि जनसंख्या सम्बंधित समस्याओं पर वैश्विक चेतना जागृत की जा सके।
गौरतलब है कि भारत सरकार ने कोविड-19 संक्रमण के चलते 16वीं भारतीय जनगणना को टाल दिया था, लेकिन अब तक कोई नई तारीख जारी नहीं हो सकी है। हालांकि दुनिया के कई देशों ने भारत सरकार से अलग नजरिया अपनाते हुए माना कि आंकड़े जुटाना जरूरी काम है और कोविड की वजह से उसे रोका नहीं जाना चाहिए, बल्कि उन्होंने ये माना कि कोविड का असर लोक जीवन पर जिस तरह पड़ा है, उसकी जानकारी भी जनगणना में जुटाई जा सकती है।
नागौर जिले की जनसंख्या बढ़कर करीब 40 लाख पहुंची

नागौर की बात करें तो वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार जिले की जनसंख्या 33 लाख 7 हजार के करीब थी, जो अब बढ़कर करीब 40 लाख पहुंच चुकी है, लेकिन योजनाएं एवं सरकारी काम पुराने आंकड़े के अनुसार हो रहे हैं।
जानिए, क्या होता है जनगणना

दुनिया के लगभग सभी देशों में हर एक दशक बाद ये देखा जाता है कि किसी इलाके में कितने लोग रहते हैं। इसमें कई दूसरे पैटर्न भी देखे जाते हैं, जैसे आर्थिक और धार्मिक-सामाजिक स्थिति। इसमें यह भी दिखता है कि कितने लोगों ने अपनी जगहों से पलायन किया। भाषा, कल्चर, साक्षरता, डिसएबिलिटी, उम्र, लिंग जैसी बातें भी इसमें जुटाई जाती हैं।
जनगणना में देरी से नुकसान

इसमें सबसे अहम है- बजट का आवंटन। कोई भी सरकारी स्कीम या योजना जनसंख्या के आंकड़ों को देखते हुए काम करती है। यदि असल डेटा ही अपडेट नहीं होगा तो बहुत से ऐसे परिवार होंगे, जिन्हें सरकारी सुविधाओं का फायदा नहीं मिल सकेगा। सरकार अब भी साल 2011 के मुताबिक रिसोर्स दे रही है, इससे करोड़ों लोग कई जरूरी योजनाओं से छूट रहे हैं। राजस्थान की बात करें तो गत चुनाव में पंचायतों का परिसीमन भी 2011 की जनगणना के अनुसार किया गया था। जनगणना नहीं होने से इस साल के अंत में होने वाले पंचायतीराज के चुनाव में भी यही होता नजर आ रहा है।
लम्बे समय के लिए टल सकती है जनगणना

सूत्रों का कहना है कि 2021 की जनगणना अब लंबे समय तक के लिए टल चुकी है। यदि सब कुछ सामान्य तरीके से हुआ होता तो 2021 में सरकारी शिक्षक घर-घर जाकर देश में रहने वाले हर आदमी का आंकड़ा जुटा चुके होते, लेकिन अब जो स्थितियां बन रही हैं, उसमें यह कहना भी मुश्किल है कि जनगणना-2021 कभी होगी या नहीं। यदि इस बार जनगणना नहीं हुई तो 2030 में भी सरकार और सरकारी तथा निजी संस्थाएं 2011 यानी पिछली जनगणना के आंकड़ों के आधार पर नीतियां बना रही होंगी।
जनगणना का इतिहास

भारत में पहली जनगणना ब्रिटिश शासन में 1872 में शुरू हुई थी। 1881 के बाद से बिना किसी व्यवधान के अब तक हर दस साल बाद जनगणना होती रही है। एकमात्र अपवाद 1941 है, जब दूसरे विश्व युद्ध की छाया भारत पर पड़ी थी और जनता से आंकड़े जुटाए जाने के बावजूद उन्हें व्यवस्थित और प्रकाशित नहीं किया गया। इस एक अपवाद को छोड़ दें तो चाहे चीन के साथ युद्ध के माहौल में 1961 का साल हो या बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान पाकिस्तान के साथ तनाव का साल 1971 हो, भारत में जनगणना का काम कभी नहीं रुका। फिर 2021 में ऐसा क्या हुआ कि भारत में जनगणना नहीं हुई। सरकार का कहना है कि कोविड संक्रमण फैलने के कारण ये फैसला किया गया।
केवल जनगणना ही क्यों रोकी

यह सच है कि कोविड के कारण देश और दुनिया में कई तरह के उथल-पुथल हुए और कई काम टल गए, लेकिन हमें यह भी याद रखना चाहिए कि कोविड के दौरान ही भारत के कई राज्यों जैसे बिहार, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, केरल, पंजाब, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव हुए। इस दौरान तमाम उपचुनाव और देश भर में नगर निकाय चुनाव भी हुए। इन चुनावों के लिए रोड शो भी हुए और रैलियां भी निकाली गईं। इन रैलियों में से कई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने भी संबोधित किया। इन सबके बावजूद जनगणना को टाल दिया गया।
समयबद्ध जनगणना अति आवश्यक

जनगणना का मुख्य उद्देश्य हमारे मानव संसाधन का पता करना, वर्तमान की संभावनाओं को तलाशना एवं अतीत के साथ दुनिया के अन्य देशों से संतुलन बनाना है। हर 10 वर्ष की जनगणना हमारे नीतियों एवं नए आयामों को तय करने में लाभकारी साबित होती है। समयबद्ध जनगणना अति आवश्यक है । इससे हम सतत विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करने में अग्रसर होंगे। जनसंख्या में वृद्धि एवं हमारे खाद्य उत्पादन, लोगों को उचित भोजन और शून्य भूखमरी एवं कुपोषण इत्यादि के संतुलन को तय करने में इसकी महत्ती भूमिका है।
– डॉ विकास पावडिया, कृषि अर्थशास्त्री, कृषि महाविद्यालय, नागौर।

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