प्रदेश में कोरोना के खौफ ने घटाए 51 फीसदी अपराध

प्रदेश में अप्रेल 2019 की तुलना में अप्रेल 2020 में 51त्न तथा मार्च 2020 की तुलना में अप्रेल 2020 में 47त्न फीसदी अपराध हुए कम, महिला अत्याचार के मामलों में 70 प्रतिशत तक कमी, लॉकडाउन में ढील मिलते ही फिर बढऩे लगे अपराध

By: shyam choudhary

Published: 24 May 2020, 11:13 AM IST

नागौर. प्रदेश में कोरोना ने आर्थिक विकास के पहिये को भले ही रोक दिया हो, लेकिन अपराध के क्षेत्र में इस वायरस ने वो काम कर दिया, जो पुलिस आज तक नहीं कर पाई। कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए लगाए गए लॉकडाउन का असर यह हुआ कि एक ही महीने में अपराध का ग्राफ 47.67 प्रतिशत गिर गया।
राजस्थान में मार्च-2020 में जहां हत्या, डकैती, लूट, अपहरण, बलात्कार सहित अन्य आईपीसी के 14 हजार 733 मामले दर्ज किए गए, वहीं अप्रेल-2020 में यह संख्या मात्र 7 हजार 710 रह गई, यानी 47.67 प्रतिशत की कमी। अप्रेल 2020 की तुलना अप्रेल 2019 से करें तो स्थिति और अच्छी रही। गत वर्ष की तुलना में इस वर्ष अप्रेल में 51.16 प्रतिशत अपराध कम हुए। हालांकि 3 मई व 17 मई के बाद लॉकडाउन में जिस अनुपात में छूट मिली, उसी अनुपात में अपराध वापस बढऩे लगे हैं।

प्रदेश में अपराधों की तुलनात्मक स्थिति
अपराध - अप्रेल 2019 - मार्च 2020 - अप्रेल 2020
हत्या - 131 - 125 - 89
हत्या का प्रयास - 148 - 153 - 132
डकैती - 4 - 8 - 5
अपहरण - 607 - 478 - 164
बलात्कार - 468 - 354 - 193
बलवा - 19 - 17 - 14
नकबजनी - 442 - 426 - 221
चोरी - 2791 - 2207 - 559
अन्य भा.द.सं. - 11092 - 10884 - 6302
योग भा.द.सं. - 15786 - 14733 - 7710

महिला अपराधों का ग्राफ 70 फीसदी गिरा
अन्य अपराधों की तुलना में महिला अत्याचार से जुड़े अपराध के ग्राफ में और ज्यादा कमी आई है। दहेज मृत्यु, दहेज आत्महत्या का दुष्प्रेरण, महिला उत्पीडऩ, बलात्कार, छेड़छाड़, अपहरण सहित अन्य मामलों में अप्रेल 2019 की तुलना में अप्रेल 2020 में 69.96 प्रतिशत कमी आई है, जबकि मार्च 2020 की तुलना में अप्रेल 2020 में 65.85 फीसदी गिरावट आई है। नागौर जिले की बात करें तो इस वर्ष जनवरी में 42, फरवरी में 56, एक से 21 मार्च तक 38 मामले घरेलू लड़ाई-झगड़े व दहेज प्रताडऩा के दर्ज किए गए, जबकि 22 मार्च से 20 अप्रेल तक मात्र 5 मामले दर्ज किए गए हैं।

पत्रिका व्यू... पुलिस इंफ्रास्ट्रक्चर में हो सुधार
पीआरएस इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार पुलिस बल पर अत्यधिक बोझ है। जनवरी 2016 में राज्य पुलिस बलों में 24 प्रतिशत रिक्तियां थीं। हालांकि 2016 में हर एक लाख व्यक्ति पर पुलिसकर्मियों की स्वीकृत संख्या 181 थी, जबकि वास्तविक संख्या 137 थी। उल्लेखनीय है कि संयुक्त राष्ट्र के मानक के अनुसार एक लाख व्यक्तियों पर 222 पुलिसकर्मी होने चाहिए। इसके साथ पदोन्नति प्रक्रिया में भी देरी होने से पुलिसकर्मी अच्छा प्रदर्शन करने को प्रोत्साहित नहीं हो पाते। कैग की ऑडिट में राज्य पुलिस बलों में हथियारों की कमी पाई गई है। राजस्थान के पुलिस बलों में अपेक्षित हथियारों में 75 प्रतिशत की कमी है। इसके साथ पुलिस में राजनीतिक कार्यकारिणी की शक्तियों का दायरा कानून के तहत सीमित किया जाना चाहिए। प्रशासनिक सुधार आयोग ने टिप्पणी की थी कि राजनीतिक शक्ति का दुरुपयोग किया जाता है और मंत्री व्यक्तिगत एवं राजनीतिक कारणों के लिए पुलिस बलों का उपयोग करते हैं।

शुरू के लॉकडाउन में कम हुए अपरपाध
लॉकडाउन में सब लोग घरों में बंद थे, इसलिए अपराध कम होना लाजमी है। निश्चित तौर पर केसेज का रजिस्ट्रेशन कम हुआ है, लेकिन अब लॉकडाउन में छूट मिलने से अपराध धीरे-धीरे अपराध बढऩे लगे हैं। इसमें भी मारपीट के मामले ज्यादा हैं, लोग धैर्य खोने लगे हैं। इसके साथ ही मैंने रेंज के सभी अधिकारियों को इसके भी निर्देश दिए हैं कि पुलिस का जो मुख्य काम अपराध की रोकथाम व नियंत्रण का है, उस पर भी ध्यान देना है।
- हवासिंह घूमरिया, रेंज आईजी, अजमेर

shyam choudhary Reporting
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