दलिया-खिचड़ी तो मिल जाती, बच्चे घर से लाते हैं पानी

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By: Pratap Singh Soni

Published: 10 Jan 2019, 06:14 PM IST

चौसला. महिला बाल विकास विभाग की ओर से क्षेत्र में संचालित आंगनबाड़ी केन्द्रों में नौनिहालों को खाने में गर्म खिचड़ी व दलिया तो परोस देते हैं, लेकिन बच्चों को भोजन करने के बाद पीने लिए पानी नहीं मिल रहा है। पानी का जुगाड़ कार्यकर्ता आस-पास के घरों से या अपने घर से लाकर करना पड़ रहा है। कई गांवों में विभाग के बनाए गए भवन सार-संभाल नहीं होने से गिर गए हैं, तो कई जगह जर्जर होकर गिरने के कगार पर हैं। कई केन्द्रों के तो खिडक़ी दरवाजे तक टूट गए हं,ै ऐसी स्थिति होने के कारण जर्जर भवनों को खाली करवाकर विभाग नेे बच्चों को स्कूलों के भवानों में शिफ्ट कर दिया है, जो भवन अभी सुरक्षित हैं, वहां पानी, बिजली, शौचालय जैसी मूलभूत सविधाओं की कमी है।
आंगनबाड़ी केन्द्रों के मासूमों को भोजन करने के बाद हलक तर करने के लिए इधर-उधर भटकना पड़ रहा है। क्षेत्र के सभी गांवों और ढाणियों में विभाग के बनाए एक भी भवन में पानी, बिजली, शौचालय जैसी मूलभूत सुविधा नहीं है। हां कुणी देवनारायण मंदिर के पास आंगनबाड़ी केन्द्र के सामने दो होज व एक जीएलआर बना हुआ है, लेकिन इसे बनाने के बाद एक बूंद भी पानी नहीं डालने से वे बदहाल हो गए हैं।

कहीं पर बच्चे नहीं
सर्वे के दौरान कुछ आंगनबाड़ी केन्द्रों में कार्यकर्ता, आशा सहयोगिनी, साथिन तो मिली, लेकिन बच्चे नहीं मिले। कार्यकर्ता ने बताया कि दो दिन में ठंडी हवा चलने से बच्चे कम आ रहे हैं। यहां पानी, बिजली, शौचालय आदि सुविधाएं नहीं होने व जर्जर भवनों के कारण अभिभावक बच्चों को भेजना ही नहीं चाहते महीने में 20-25 दिन हमें ही अभिभावकों के घर जाकर बच्चों को लाना पड़ता है। ऐसे में कई केन्द्रों पर नामांकन के मुताबिक कहीं एक चौथाई तो कहीं पर आधे और कई केन्द्रों पर तो मिले ही नहीं।

खिडक़ी दरवाजे टूटे, जर्जर भवन
अधिकतर आंगनबाड़ी केन्द्र जर्जर हालत में हो गए है और कई केन्द्रों के खिडक़ी दरवाजे टूट गए हैं। जानकारी के अनुसार इन्हें बनाने के बाद देख-रेख नहीं होने से बरसात के दिनों में छत से पानी टपकता है और दीवारों में दरारें आ गई है। कई केन्द्रों में फर्श का तो नामोनिशान तक नहीं है चूहे बिल खोद रखे है।

घर से बनाकर लाते हैं खाना
आंगनबाड़ी में एक बरामदा बड़ा हॉल व रसोई बनी हुई है, पेयजल व चूल्हे सिलेण्डर की व्यवस्था नहीं होने से कार्यकर्ताओं को दलिया एवं खीचड़ी अपने घर बनाकर लाना पड़ता है। इससे नौनिहालों को ही नहीं कार्यकर्ताओं को भी परेशानी हो रही है। मूलभूत सुविधाएं नहीं होने और जर्जर भवनों के डर से अभिभावक भी अपने नौनिहालों को भेजने से कतरा रहे है। पत्रिका टीम ने कस्बे सहित आस-पास के गांव कुणी, बनगढ़, लाखनपुरा, लूणवां, गोविन्दी मारवाड़, राजास, पिपराली में संचालित आंगनबाड़ी केन्द्रों का सर्वे किया तो यह हकीकत देखने को मिली।

इनका कहना
आंगनबाड़ी केन्द्रों पर पीने के पानी की व्यवस्था तो नहीं है, लेकिन कार्यकर्ता अपने घर से पानी लाकर बच्चों को पिलाती है।
गीतादेवी कुमावत, सुपरवाइजर, महिला बाल विकास विभाग

Pratap Singh Soni
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