भगवान रूपी माता-पिता का अनादर उचित नहीं

भगवान रूपी माता-पिता का अनादर उचित नहीं
सैनिक बस्ती में प्रवचन

Ravindra Mishra | Updated: 17 Sep 2019, 06:32:30 PM (IST) Nagaur, Nagaur, Rajasthan, India

नागौर. मूर्ति में भगवान का अस्तित्व स्वीकार कर पूजन करना एक प्रकार हो सकता है, लेकिन पोषण करने वाले भगवान रूपी माता-पिता का अनादर करना सही नहीं है। केवल मूर्ति में ही नहीं, जगत में भी परमात्मा का स्वरूप देखना चाहिए । यह बात बड़ा रामद्वारा सूरसागर के महंत रामप्रसाद महाराज ने सोमवार को सैनिक बस्ती में प्रवचन के दौरान कही ।

नागौर. उन्होंने कहा कि सियाराम मय सब जग जानी, भावों के अनुसार तन, मन व शरीर से किसी को भी कष्ट नहीं पहुंचाना भी भगवत भक्ति का एक स्वरूप है । प्रहलाद की कथा का संदर्भ में बताते हुए संत ने कहा कि प्रहलाद के अनुसार परमात्मा सब के लिए है। हरि व्यापक सर्वत्र समाना, यह भाव एक भक्त में भी होना जरूरी है । सत्य की विवेचना करते हुए उन्होंने कहा कि जाके हिरदे सांच है, ताके हिरदे आप, यानि सत्य की प्रतिष्ठा करने वाले के हृदय में स्वयं भगवान का निवास रहता है । तीर्थ यात्रा करने के बाद भी अगर सत्य का सहारा नहीं लेते हैं तो तीर्थ यात्रा व्यर्थ है । कहा भी जाता है कि सत्यम् परं धीमहि । सत्य होगा तो वहां न्याय होगा । सत्यमेव जयते, अर्थात सत्य ही जीतता है । एक झूठ का सहारा लेने पर सौ झूठ उसमें बोलने पड़ते हैं, फिर भी झूठ बोलने वाला कभी सफल नहीं हो पाता । उन्होंने कहा कि झूठ के सहारे से व्यक्ति जन्म और मृत्यु के फेर में फंस जाता है । संत वाणी प्रवचन के अंतर्गत उन्होंने रामदास महाराज की अनुभव वाणी के अनेक दोहा, चौपाइयों को तथा अनेक भजनों को संगीतमय पृष्ठभूमि में प्रस्तुत किया । इस अवसर पर ब्रजमोहन सोनी,सत्यनारायण सोनी, मधुसूदन जाजू, ओमप्रकाश लोहिया, श्रीकांत बंग, ओमप्रकाश कासट, कृपाराम देवड़ा, शिवनारायण चांडक,बजरंग शमा,राजाराम चांडक, नृत्यगोपाल मित्तल, बालकिशन भाटी, राजाराम चांडक, विष्णु चांडक आदि मौजूद थे।

कृष्णा के आश्रय से तृष्णा खत्म
डेह. रामद्वारा में महंत आनंदीराम आचार्य ने सोमवार को प्रवचन करते हुए कहा कि प्रत्येक वस्तुएं पदार्थ और व्यक्ति एक ना एक दिन सबको जीर्ण-शीर्ण अवस्था को प्राप्त करना है। जरा किसी को भी नहीं छोड़ती। जरा का मतलब नष्ट होना, बुढापा या काल, तृष्णैका तरुणायते, तृष्णा कभी वृद्ध नहीं होती सदैव जवान बनी रहती है और ना ही इसका कभी नाश होता है। घर बन जाए यह आवश्यकता है, अच्छा घर बने यह इच्छा है और एक से क्या होगा, दो तीन घर होने चाहिए, बस इसी का नाम तृष्णा है। तृष्णा कभी खत्म नहीं होती। उन्होंने कहा कि विवेकवान बनो, विचारवान बनो, और सावधान होओ। खुद से ना मिटे तृष्णा तो कृष्णा से प्रार्थना करो। कृष्णा का आश्रय ही तृष्णा को खत्म कर सकता है।

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