scriptI get life, but family breaks every time to save my breath | मुझे तो जिंदगी मिल जाती है, लेकिन सांसे बचाने को हर बार टूटता है परिवार | Patrika News

मुझे तो जिंदगी मिल जाती है, लेकिन सांसे बचाने को हर बार टूटता है परिवार

राजकीय बांगड़ अस्पताल में शुरू हो डायलिसिस की सुविधा
-दो साल पहले हुई गुर्दे की बीमारी के बाद प्रहलाद के परिवार पर छाया आर्थिक संकट

- दो छोटे भाईयों सहित परिवार में है 11 लोग
- रोजगार के लिए एकमात्र साधन छोटे भाई का ठेला

- सरकारी अस्पताल में नहीं डायलिसिस की सुविधा इसलिए प्रत्येक बार दो हजार रुपए खर्च कर निजी स्तर पर करवाना पड़ता हैं डायलिसिस

नागौर

Published: July 27, 2022 11:39:46 pm

डीडवाना. मेरे किडनी की बीमारी है। परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर है कि घर के राशन का खर्च भी नहीं चल पा रहा। मुझे महीने में छह -सात बार से अधिक डायलिसिस करवाना पड़ता है। डायलिसिस करवाने में कम से कम दो हजार रुपए का खर्च आता है, हर बार उधारी या फिर किसी से मांगकर व्यवस्था करनी पड़ती है। ऐसे में मेरी जिंदगी को तो कुछ सांसे मिल जाती है, लेकिन मेरी सांसे बचाने के लिए परिवार को हर बार टूटना पड़ता है। यह कहना है गुर्दे (किडनी) की बीमारी से ग्रस्त प्रहलाद का।
कमजोर आर्थिक स्थिति वाले गुर्दा रोगी के परिवार के लोगों को उसकी जिंदगी बचाने के लिए जिस मानसिक यातना का सामना पड़ता है उसे शब्दों में बयां करा कठिन है। ऐसे एक दो नहीं डीडवाना क्षेत्र में कई रोगी है जिनके परिवार की आर्थिक स्थिति अत्यन्त खराब है। सरकारी अस्पताल में डायलिसिस की सुविधा नहीं हर बार दो से चार हजार रुपए का खर्च उठाना एक गरीब परिवार के लिए काफी दर्द भरा है।
मुझे तो जिंदगी मिल जाती है, लेकिन सांसे बचाने को हर बार टूटता है परिवार
डीडवाना. घर में अपने दो बच्चों के साथ प्रहलाद।
हर रोज मर-मरकर जी रहे प्रहलाद जैसे अनेको लोग-
किड़नी के मरीज प्रहलाद ने पत्रिका से दर्द बांटते हुए बताया कि परिवार में बूढ़े माता-पिता के अलावा दो छोटे भाई है तथा मैरे दो बच्चे व पत्नी है। एक छोटा भाई जो ठेला लगाकर परिवार के लिए राशन-पानी की व्यवस्था करता है। दूसरा उसकी मदद के लिए ठेले पर काम करता है। घर की स्थिति आर्थिक स्थिति काफी कमजोर है। घर के एक कमरे में छत की पट्टियां गिर चुकी है, जहां लोहे की चद्दर लगाई हुई थी। दूसरे कमरे में भी पट्टियों की हालत थी, छत से पानी टपक रहा था, इस कक्ष की पट्टियां भी कभी भी टूटकर गिर सकती है। ऐसे में बीमारी पर हजारों रुपए का खर्च करें या फिर घर की मरम्मत करवाई जाए। यह स्थिति किसी एक प्रहलाद की नही, बल्कि उसके जैसे अनेक गुर्दा रोगियों की है जिनके बीमारी लगने के बाद डायलिसिस करवाने का खर्च कोढ में खाज का काम करता है।
प्रहलाद ने बताया कि करीब डेढ साल हो गया। सप्ताह में तीन बार डायलिसिस करवाना पड़ता है, सांस ही नहीं आ रहा है। डीडवाना में पहले चिरंजीवी स्वास्थ्य बीमी योजना थी, अब नहीं है। प्रत्येक बार डायलिसिस के लिए दो हजार रुपए लगते हैं। हर बार डायलिसिस के लिए लोगों से रुपए उधार लेने पड़ते हैं। जिला अस्पताल में डायलिसिस की सुविधा शुरू हो जाए तो मेरे जैसे अनेक मरीजों को फायदा मिल सकेगा। जब स्वस्थ था तब मैं ठेला लगाता था,उस समय जैसे-तैसे गुजारा होता था। अब तो परेशानी और बढ़ गई।

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