scriptIf the corrupt are not punished, then why action? | भ्रष्टाचारियों को सजा नहीं देनी तो कार्रवाई का रस्म अदायगी क्यों? | Patrika News

भ्रष्टाचारियों को सजा नहीं देनी तो कार्रवाई का रस्म अदायगी क्यों?

भ्रष्टाचार रोकने के लिए एसीबी आए दिन कर रही अधिकारियों एवं कर्मचारियों को ट्रेप, लेकिन सरकार नहीं दे रही अभियोजन की स्वीकृति

- प्रदेश के आईएएस, आईपीएस, आरएएस व आरपीएस अधिकारियों के विरूद्ध दर्ज प्रकरणों में से 12 प्रकरणों में एसीबी को अभियोजन स्वीकृति का इंतजार

- पिछले दो साल में 535 प्रकरणों में 662 अधिकारी/कर्मचारी हुए गिरफ्तार

नागौर

Published: November 02, 2021 10:16:44 pm

नागौर. पिछले दो-ढाई साल में जितने अधिकारी एवं कर्मचारी रिश्वत लेने व पद का दुरुपयोग करने के मामले में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) द्वारा गिरफ्तार किए गए हैं, संभवतया उतने पहले कभी नहीं हुए। प्रदेश में दिनों दिन बढ़ रही भ्रष्टाचार की बेल को नष्ट करने के लिए एसीबी ने ताबड़तोड़ कार्रवाई की है, लेकिन इस कार्रवाई का जब दूसरा पहलू देखते हैं तो फिर ‘भ्रष्टाचार’ की ‘बू’ आने लगती है।
If the corrupt are not punished, then why action?
If the corrupt are not punished, then why action?
वजह है भ्रष्टाचार में लिप्त अधिकारियों व कर्मचारियों के खिलाफ सरकार द्वारा अभियोजन स्वीकृति नहीं देना, जबकि राज्य सरकार के गृह विभाग के मुख्य सचिव ने 24 फरवरी 2011 को एक परिपत्र जारी कर पूर्व में जारी दो परिपत्रों का हवाला देते हुए कहा कि एसीबी के प्रकरणों में अभियोजन स्वीकृति देने के सम्बन्ध में निर्धारित प्रक्रिया की पालना नहीं की जाती है। विशेष तौर पर अभियोजन स्वीकृति के प्रकरणों में मनाही की स्थिति में निर्धारित बिन्दुओं की पालना अत्यंत आवश्यक है। गृह विभाग ने परिपत्र में स्पष्ट आदेश जारी किए कि अभियोजन स्वीकृति के हर मामले में अधिकतम 3 माह का समय निर्धारित है। यदि कोई भी सक्षम अधिकारी निर्धारित समय से अधिक समय लेता है तो अधिक समय लगने का स्पष्ट कारण अपनी स्वीकृति के आदेश में लिखा होगा।
अभियोजन स्वीकृति के लिए गृह विभाग ने तीन महीने का समय निर्धारित कर रखा है, वहां तीन वर्ष बाद भी स्वीकृति नहीं मिल पाती है। गौर करने वाली बात यह है कि कई प्रकरण पांच साल से अधिक समय से भी लम्बित हैं। यह जानकारी खुद राज्य सरकार ने विधानसभा में एक विधायक द्वारा पूछे गए सवाल के जवाब में दी है।
हां या ना, कुछ तो कहे, रोकने का क्या अर्थ
प्रदेश में वर्ष 2019-20 व 2020-21 में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने एक अप्रेल 2019 से 31 मार्च 2021 तक की अवधि के दौरान भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अन्तर्गत कुल 535 प्रकरणों में 662 अधिकारियों व कर्मचारियों को गिरफ्तार किया है। इन प्रकरणों में से 186 प्रकरणों में चालान तथा 2 प्रकरणों में अंतिम प्रतिवेदन न्यायालय में प्रस्तुत किया गया है। एसीबी के अनुसार 347 प्रकरण अन्वेषण की विभिन्न प्रक्रियाओं में लम्बित हैं।
ये तो बड़े अफसरों की सूची है, छोटे अफसरों व कर्मचारियों की तो बाकी है

रिश्वत मांगने व पद का दुरुपयोग करने के आरोप में जिन आईएएस, आईपीएस, आरएएस व आरपीएस अधिकारियों के खिलाफ एसीबी ने प्रकरण दर्ज किए और अभियोजन स्वीकृति के लिए सरकार को प्रस्ताव भेजा, उनमें 12 अफसर ऐसे हैं, जिनकी अभियोजन स्वीकृति सरकार ने नहीं दी है। रिश्वत मांगने के मामले में अजमेर यूआईटी के सचिव नीशु कुमार अग्निहोत्री के खिलाफ 21 जून 2013 को एसीबी में प्रकरण दर्ज हुआ और एसीबी ने एक सितम्बर 2016 को अभियोजन स्वीकृति के लिए प्रस्ताव भेजा, लेकिन अब तक नहीं मिली। इसी प्रकार चिकित्सा विभाग में एनएचएम के अतिरिक्त निदेशक एवं संयुक्त सचिव रहते नीरज के. पवन द्वारा पद का दुरुपयोग करने का प्रकरण 30 मार्च 2017 को दर्ज हुआ और 14 नवम्बर 2017 से, जोधपुर की तत्कालीन जिला रसद अधिकारी निर्मला मीणा के खिलाफ 10 जुलाई 2018 से, तत्कालीन नगर परिषद आयुक्त नरेन्द्र कुमार थोरी के खिलाफ 12 जुलाई 2018 से, बीकानेर यूआईटी के तत्कालीन सचिव अरुण प्रकाश शर्मा व दुर्गेश बिस्सा के खिलाफ 23 जुलाई 2018 से, झोटवाड़ा एसीपी आस मोहम्मद के खिलाफ 22 अक्टूबर 2019 से, बाड़मेर के तत्कालीन तहसीलदार चंद्रभानसिंह के खिलाफ 2 दिसम्बर 2019 से, रायसिंहनगर के एएसपी अमृतलाल जीनगर के खिलाफ एक अक्टूबर 2020 से, एसीबी के ही तत्कालीन उप अधीक्षक भैरूलाल मीना के खिलाफ 5 फरवरी 2021 से, बारां के तत्कालीन कलक्टर इंद्रसिंह राव के खिलाफ 8 फरवरी 2021 से अभियोजन स्वीकृति लम्बित है। इसी प्रकार बांदीकुई की तत्कालीन एसडीएम पिंकी मीणा व दौसा के तत्कालीन एसडीएम पुष्कर मित्तल के खिलाफ 9 मार्च 2021 से तथा जयपुर आयुक्तालय के तत्कालीन एएसपी राजेन्द्र कुमार त्यागी के खिलाफ एक अप्रेल 2021 से अभियोजन स्वीकृति नहीं दी है। ये भी ऐसे ही आदेश, जो केवल जारी हुए
भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई की अनुमति नहीं देने के साथ राज्य सरकार द्वारा गुटखे पर पाबंदी व शराब बंदी के लिए जारी किए गए आदेश भी केवल कागजी साबित हुए हैं। ये ऐसे आदेश हैं जो सरकार की मंशा पर सवालिया निशान खड़ा कर रहे हैं।

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