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पीएम फसल बीमा योजना का लाभ लेना है तो पहले इन बातों को जानना जरूरी

- अभिनव राजस्थान पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. अशोक चौधरी ने कृषि विभाग के प्रमुख सचिव को लिखा पत्र
- राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित समाचार की कटिंग भी भेजी

नागौर

Published: March 21, 2022 03:54:11 pm

नागौर. फसल बीमा कम्पनियों द्वारा क्लेम देने से बचने के लिए अपनाए जा रहे हथकंडों एवं कृषि विभाग के कर्मचारियों व अधिकारियों की लापरवाही को लेकर अभिनव राजस्थान पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. अशोक चौधरी ने कृषि विभाग के प्रमुख सचिव दिनेश कुमार को पत्र लिखा है।
डॉ. चौधरी ने अपने पत्र के साथ प्रमुख सचिव को राजस्थान पत्रिका में 16 मार्च को ‘50 फीसदी फसल खराबे को डकार गई बीमा कम्पनी’ शीर्षक से प्रकाशित समाचार की कटिंग भी भेजी है। उन्होंने पत्र के माध्यम से बताया कि फसल बीमा योजना वाकई में किसानों के लिए जीवनदायिनी है, यदि इसको नियमों और पारदर्शिता से लागू किया जाए। ऐसा होने पर खेती में भी घाटा नहीं होगा और बीमा कम्पनी भी वाजिब लाभ कमा सकेगी, लेकिन वर्तमान में कम्पनियां लाभ की बजाय लूट पर अधिक ध्यान लगाए हुए है। कमाल की बात यह है कि इसमें अधिकारियों की मिलीभगत कम है, बल्कि खेती के प्रति उनकी उदासीनता अधिक है।
चौधरी ने प्रमुख सचिव से आग्रह किया है कि प्रदेश के लाखों किसानों को आर्थिक न्याय दिलवाएं। इसके लिए क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं करना है, बल्कि बने बनाए नियमों को लागू करवाना है।
PM crop insurance scheme
PM crop insurance scheme
इन बिन्दुओं पर काम करें तो किसानों को होगा लाभ

  • चौधरी ने पत्र में बताया कि किसी भी बीमा में सबसे पहला डॉक्यूमेंट होता है- पॉलिसी। नियम है कि यह पॉलिसी पंचायतों के माध्यम से हर किसान के घर तक पहुंचे, अभी यह नहीं हो रहा है। कभी कभार रस्म अदायगी के लिए किसी स्थान पर शिविर का नाटक होता है पर हर किसान तक यह डॉक्यूमेंट नहीं पहुंचता है। जिस किसान ने हजारों रुपए का प्रीमियम दिया है, उस पर बीस-तीस रुपए खर्च करके उसके घर तक यह पोलिसी पहुंचाई जानी चाहिए, जैसे जीवन बीमा या वाहन बीमा में होता है।
  • अचानक किसी कारण से फसल नुकसान की रिपोर्ट नियम से बैंक, तहसील, कृषि विभाग और कम्पनी, सभी को लेनी चाहिए, लेकिन सब किसान को फुटबॉल बना देते हैं और अक्सर वह थक जाता है। जो किसान रिपोर्ट लिखवाने में या सर्वे करवाने में सफल हो जाते हैं, उनको यह नहीं पता होता, कि आखिर रिपोर्ट में लिखा क्या है? नियम से इस सर्वे की रिपोर्ट उसकी तसल्ली के लिए उसके पास पहुंचनी चाहिए, ताकि वह आश्वस्त हो सके।
  • फसल कटाई प्रयोग (क्रॉप कटिंग) इस योजना का प्राण है, इसी के आधार पर किसी गांव में नुकसान का आकलन होता है, लेकिन कृषि और राजस्व विभाग के अधिकारी इसको लेकर बहुत उदासीन रहते हैं और कम्पनी के एजेंट के कहे अनुसार आंकड़े भरकर बिना फील्ड में गए दस्तखत कर देते हैं। उनको यह भी नहीं लगता कि उनकी इस लापरवाही से गांव के लाखों रुपए का नुकसान कर रहे हैं।
  • नियम है कि किसी भी गांव में जिनका क्लेम पारित हुआ है, उनकी विस्तृत सूची, पूरे विवरण के साथ ग्राम पंचायतों और बैंकों के नोटिस बोर्ड पर चिपकाई जानी चाहिए, ताकि पूरे गांव के सामने स्थिति स्पष्ट हो जाए। इसके बावजूद ये सूचियां बाहर नहीं आती हैं और किसान इधर से उधर पूछते हुए भटकता रहता है।
  • प्रीमियम की तारीख तो फिक्स होती है पर क्लेम का कोई अता पता नहीं होता है। आजादी के 75 साल के बाद भी भारत के किसान के साथ यह सौतेला व्यवहार क्या दर्शाता है? कभी राजस्थान सरकार तो कभी भारत सरकार अपना हिस्सा जमा नहीं करवाती है और कम्पनी को क्लेम लटकाने का अवसर मिल जाता है।

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