scriptKuchera, which is called a wheat store, is forced to buy wheat itself. | गेहूं का भंडार कहलाने वाला कुचेरा खुद गेहूं खरीदने को मजबूर | Patrika News

गेहूं का भंडार कहलाने वाला कुचेरा खुद गेहूं खरीदने को मजबूर

locationनागौरPublished: Nov 09, 2023 01:50:54 pm

Submitted by:

Ravindra Mishra

- कुचेरा की कणक के नाम से थी गेहूं की अलग पहचान
- फ्लोराइड की अधिकता और पानी की गहराई ने बिगाड़ा किसानों का समीकरण

  गेहूं का भंडार कहलाने वाला कुचेरा खुद गेहूं खरीदने को मजबूर
कुचेरा. फ्लोराईड की अधिकता से खेत में बने क्यारों में जमी सफेदी।
नागौर जिले का कुचेरा क्षेत्र किसी जमाने में गेहूं का भंडार कहलाने वाले कुचेरा क्षेत्र के लोगों को खुद बाहर से गेहूं खरीदने को मजबूर होना पड़ रहा है। एक समय था जब कुचेरा, गाजू, निम्बड़ी चांदावता, रूपाथल, अड़वड़, इग्यार, लूणसरा, भावला क्षेत्र में गेहूं की बम्पर पैदावार होती थी। अच्छी पैदावार वाली उपजाऊ जमीन व गेहूं की खेती के अनुकूल पानी के चलते कुचेरा के खेतों में 12 से 15 क्विंटल प्रतिबीघा तक गेहूं का उत्पादन हुआ करता था। इस कारण इस उपजाऊ क्षेत्र को गेहूं का भंडार कहा जाता था। अधिक उपज की चाह में किसानों की ओर से जहरीले रसायनों के अनियंत्रित व असंतुलित उपयोग, 1996 में आई बाढ़ व अन्य कारणों से पानी की गहराई और उसमें फ्लोराइड की मात्रा बढ़ने से गेहूं का उत्पादन घटता गया। आज उत्पादन सिमटकर 2 से 4 क्विंटल प्रतिबीघा रह गया। इससे किसानों को खर्च भी नहीं निकलने के कारण गेहूं की बुवाई से मुंह मोड़ना पड़ा। वर्तमान में कुछ ही किसान घर पर खाने लायक गेहूं उगाते हैं।
अलग थी पहचान
कुचेरा क्षेत्र के गेहूं की अलग ही पहचान थी। कुचेरा की कणक कहलाने वाले सुर्ख लाल रंग व कठोर गेहूं की रोटी, हलवा, मालपुए, पूड़ी आदि स्वाद और रंग में उत्तम गुणवत्ता के बनते थे। इसी कारण शादी विवाह व अन्य आयोजनों में कुचेरा के गेहूं पहली पसंद थे।
800 से 1000 फिट गहराई
90 के दशक तक कुचेरा क्षेत्र में 250 से 300 फिट तक मीठा व अच्छी गुणवत्ता वाला पानी मिल जाता था। तब किसान ओपन कुआं ही खुदवाते थे। उससे क्यारियां बनाकर सिंचाई की जाती थी। पानी के अधिक दोहन व बाढ़ के बाद यहां पानी की गहराई बढ़ते- बढ़ते कुओं की जगह नलकूप ने ले ली। वर्तमान समय में क्षेत्र में पानी की गहराई 800 से 1000 फीट तक पहुंच गई है।
ऊसर हो रही जमीन
क्षेत्र में पानी की गहराई बढ़ने के साथ ही उसमें फ्लोराइड की मात्रा भी बढ़ गई। इससे फसल उत्पादन व गुणवत्ता प्रभावित होने लगी है। साथ ही जहरीले रसायनों के अनियंत्रित उपयोग के चलते खेत बिगड़ते गए । शहर के उत्तर दिशा सहित रूपाथल, अड़वड़, लूणसरा के अधिकांश उपजाऊ खेत ऊसर हो गए। जहां मजबूरी में किसानों को मानसूनी फसल पर निर्भर होना पड़ा है।
इनका कहना है
पहले कुचेरा में अच्छे व गुणवत्ता वाले पानी व उपजाऊ जमीन के कारण गेहूं सहित अन्य फसलों और सब्जियों की बम्पर पैदावार होती थी। वर्तमान में पानी गहराई में जाने व फ्लोराईड की मात्रा बढ़ने से फसल उत्पादन घट गया है।
रामचन्द्र ,किसान ,कुचेरा।
कुचेरा क्षेत्र में पिछले करीब ढाई दशक में भूजल की गहराई तीन से चार गुणा बढ़ गई। इससे फसल उत्पादन घटने के कारम कई किसानों ने कुएं व नलकूप बन्द कर दिए। कई किसान नगदी फसलें पान मैथी, कपास, इसबगोल आदि की बुवाई करने लग गए।
प्रेम प्रकाश फरड़ोदा किसान गाजू
पहले कुचेरा का पानी मीठा होने से बसों में यात्रा करने वाले यात्री मेड़ता या नागौर के बाद यहीं आकर पानी पीते थे। सब्जी के बीज जहां भी डालो ऊग जाते थे। भूजल की गहराई बढ़ने के साथ ही उसमें फ्लोराईड की मात्रा बढ़ने के कारण पानी का स्वाद बिगड़ गया है। फसल उत्पादन घटकर नाम मात्र का रह गया।
बजरंग सिंह किसान बुटाटी
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