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नागौर

ज्यादातर समझदार हो रहे साइबर ठगों का शिकार

कम पढ़े-लिखे या अनपढ़ साइबर ठगी का शिकार नहीं बन रहे। मोबाइल के साथ पे-फोन/गूगल पे तो लगभग सबको ऑपरेट करना आ गया पर अलग-अलग झांसे में पढ़े-लिखे सरकारी नौकर/अफसर या व्यापारी ही फंस रहे हैं।

नागौरJun 30, 2024 / 09:50 pm

Sandeep Pandey

पांच साल की हकीकत

नब्बे फीसदी मामलों में पढ़े-लिखे

केस-1

डॉलर की ऑनलाइन खरीद करने वाले जेएलएन अस्पताल के डॉक्टर साजिद को साइबर ठगों ने चपत लगा दी। करीब दस हजार रुपए ऑनलाइन पेमेंट के बाद भी जब डॉलर नहीं मिले तो इन्होंने शिकायत दर्ज कराई ।
केस-2

सरकारी टीचर ने ज्योतिष की सलाह के लिए गूगल पर सर्च किया। फर्जी वेबसाइट पर मिले साइबर ठगों ने करीब एक लाख की चपत लगा दी। ठगी के पहले फोन पर कई बात की, ऑनलाइन पेमेंट भी कई अलग-अलग खातों में डलवाए।
केस-3

सरकारी नौकरी से रिटायर एक कर्मचारी ने निवेश पर मोटे मुनाफे के चक्कर में करीब एक करोड़ रुपए साइबर ठगों को अलग-अलग खातों में निवेश कर दिए। कुछ महीनों बाद ठगी का पता चला।
एक्सपोज

नागौर. कम पढ़े-लिखे या अनपढ़ साइबर ठगी का शिकार नहीं बन रहे। मोबाइल के साथ पे-फोन/गूगल पे तो लगभग सबको ऑपरेट करना आ गया पर अलग-अलग झांसे में पढ़े-लिखे सरकारी नौकर/अफसर या व्यापारी ही फंस रहे हैं। नागौर (डीडवाना-कुचामन) जिले में साइबर क्राइम से करीब नब्बे फीसदी पीडि़त भी यही हैं। किसी ने नौकरी से रिटायरमेंट पर मिली रकम को साइबर ठगों के हवाले कर दिया तो किसी ने आईपीओ में मोटी कमाई के लालच में लाखों रुपए उनके खातों में डाल दिए।सूत्रों के अनुसार साइबर थाना ही नहीं सभी थानों में पिछले पांच साल के मामलों में यही सामने आया। गिने-चुने मामलों में ही कोई किसान/अनपढ़ या फिर कम पढ़ा लिखा इनके चंगुल में फंसा। यहां के एक सरकारी विभाग में कार्यरत लिपिक को साइबर ठगों ने करीब छह महीने तक ठगा, हालांकि उन्होंने छोटी-छोटी रकम खातों में डलवाई। कभी दस हजार तो कभी पांच हजार। उससे व्हाट्सएप कॉल के जरिए कहा गया कि थोड़ी-थोड़ी रकम शेयर मार्केट में निवेश कर रहे हैं, जितनी रकम दोगे वो सालभर में डबल हो जाएगी। ऐसे में जितना-जितना पैसा हो वो अलग-अलग खातों में डालते रहना। बाद में लिंक भेजने लगे फिर एक दम से सबकुछ बंद हो गया। लिपिक को करीब नब्बे हजार रुपए का फटका लगा।
सूत्र बताते हैं कि एटीएम में कैश जमा कराने वाले एक कर्मचारी के साथ साइबर ठगों ने 35 हजार की चपत लगा दी। पढ़े-लिखे इस कर्मचारी ने शर्म के मारे मामला तक दर्ज नहीं करवाया। करीब छह महीने पहले एक कारोबारी के पास फोन आया कि दिल्ली पुलिस से बोल रहे हैं, आपके बेटे पर बलात्कार का मामला दर्ज हो रहा है। ज्यादा देर करोगे तो उसकी गिरफ्तारी कर लेंगे। कारोबारी का ऐसा माइन्ड वॉश किया कि उसने सत्तर हजार रुपए भेजे गए पे-फोन पर डाल दिए। बाद में ठगी का खुलासा हुआ। इन्होंने भी पुलिस अफसरों से बातचीत तो की पर मामला दर्ज नहीं करवाया। हाल ही कोतवाली थाने में ऐसा ही एक मामला दर्ज हुआ जिसमें पंद्रह लाख की ठगी हुई। अलग-अलग ब्राण्ड की फ्रेंचाइजी लेने के लिए वेबसाइट के जरिए खोजबीन की तो फर्जी वेबसाइट पर बैठे साइबर ठगों ने करीब पंद्रह लाख की चपत कारोबारी को लगा दी।
पांच साल का यह रहा हाल

सूत्र बताते हैं कि कुछ समय पहले तक मोबाइल पर बिजली का कनेक्शन काटने का डर, सिम बंद होने या फिर अन्य छोटी-छोटी चेतावनी/धमकी पर रकम डलवाकर साइबर ठगी होती थी। धीरे-धीरे अलग-अलग तरीकों से यह ठगी बढ़ती गई। पहले ऐसे मामले थानों में दर्ज होते थे, ढाई साल पहले साइबर थाना खुला तो एक लाख से अधिक की ठगी के मामले यहां तो इससे नीचे अथवा धोखाधड़ी के मामले संबंधित थानों में दर्ज होने लगे। करीब अस्सी फीसदी से अधिक पढ़े-लिखे, कारोबारी-सरकारी लोगों को ठगी शिकार होना पड़ा।
कैसे पता लगता है एमाउण्ट का

साइबर क्राइम से जुड़े एक्सपर्ट बताते हैं कि कई मामलों में ऐसा देखने को मिला कि बढ़ा एमाउण्ट दो दिन पहले आया और तुरंत ठगी हो गई। अब साइबर ठगों को यह सब कैसे पता चलता है , समझ के बाहर है। यह अब तक समझ नहीं आया कि बैंक एकाउंट में आई रकम या फिर अधिक रकम वालों को ही यह क्यों चुन लेते हैं?
इनका कहना

यह सही है कि अक्सर पढ़ा-लिखा, कारोबारी-सरकारी नौकर ही साइबर ठगी का शिकार होता है। अस्सी से नब्बे फीसदी मामलों में ऐसा ही देखने को मिला, अब मोटी रकम वालों का ये कैसे पता लगा लेते हैं, यह भी हैरतभरा है। किसी भी फोन अथवा लिंक/मैसेज के जरिए सतर्क रहने की जरुरत है।
-उम्मेद सिंह, सीओ साइबर थाना नागौर

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