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नहरी जमीन के बदले सेना के जवान को सूखी उम्मीदों के टीले

संदीप पाण्डेय

नागौर. बहादुरी के नाम पर मिले अवॉर्ड से भी खिलवाड़ हो गया। पदक के बदले मिलने वाली नहरी जमीन की आस करते-करते उसकी आंखें थक चुकी हैं। गुहार करते-करते जुबान तालू से चिपक गई। उम्मीद बुझ गई तो उत्साह ठंडा पड़ गया है।

नागौर

Published: November 19, 2021 10:32:51 pm

- --पंद्रह बरस बाद भी हाथ खाली, टीलों पर जमीन का मजाक क्यों?-सम्मान का अपमानएक्सक्लूसि

जान की बाजी लगाकर सेना में नौकरी कर रिटायर हुए अरसा बीतने के बाद मलाल भी यही है, आखिर सम्मान के हक में 'बेईमानी कैसे हो रही है? सरकार की ही घोषणा/वादे के बाद भी इस सेना के जवान को उसका ही हक क्यों नहीं मिल पा रहा है? यह सवाल खुद अपने से पूछने वाले इस जवान का नाम सरवन राम है। नागौर की जायल तहसील के कठौती गांव का रहने वाला सरवन राम अब अपने सम्मान से हो रहे 'मजाक पर खून का घूंट पी रहा है।हजारों सपने के साथ सेना में हवलदार भर्ती हुआ था सरवन राम। देश के लिए कुछ करने का जज्बा, घर-परिवार को छोड़कर कभी सीमा पर तैनाती तो कभी कश्मीर आतंकवाद पर पहरा। सर्द हवाएं भी उसका गर्म जोश ठण्डा नहीं कर पाईं। 28 अक्टूबर 1991 सं 31 अक्टूबर 2013 तक सेना की ड्यूटी निभाई। अनेकों बार मौत से भी सामना हुआ पर घबराया नहीं, हौसलों से लड़ा और दुश्मनों के दांत खट्टे कर दिए।जब तीन गोली लगी सरवन राम का सामना 15 मई-2005 को राजोरी सेक्टर में आतंकियों से मुकाबला हुआ। जान हथेली पर लेकर वो भिड़ पड़ा, तीन आतंकी ढेर कर दिए, इसके बदले उसके पांव में तीन गोलियां लग गई। लहूलुहान सरवनराम अस्पताल लाए गए। उपचार हुआ और भगवान की दया से बच गउ और पूरे जोश से कुछ कर गुजरने की मंशा फिर सेना अफसरों को बताई। सरवनराम के हौसले की दाद देते हुए अफसरों ने नए जवानों को इसका उदाहरण तक दिया। इसी बहादुरी पर सरवनराम को 15 अगस्त 2006 को सेना मेडल मिला। कुछ दिन बाद ये सुनकर भी खुशी हुई कि उसे करीब 25 बीघा नहरी जमीन भी मिलेगी। उत्साह और खुशी का यहीं से लौटना शुरू हो गया।
sarvan ram
गेलेंट्री अवॉर्ड के नाम खिलवाड़
जगी उम्मीद फिर टूटी

सरवन राम को जमीन दिलाने की पहल शुरू हुई तो उसे लगने लगा, जल्द मिलने वाली है, जल्द मिलेगी। सैनिक कल्याण बोर्ड की ओर से इसके लिए खत पर खत भेजे गए, कलक्टर भी इसे आगे सरकाते रहे। दिन-महीने-साल गुजरे। गत साल अगस्त 2020 को सरवनराम की खुशी का ठिकाना नहीं रहा जब उसे जमीन मिलने का पत्र प्राप्त हुआ। खुशी के मारे रातभर नहीं सो पाया। दूसरे दिन अपने किसी साथ कप्तान के निकल पड़ा जैसलमेर जमीन देखने, बीस हजार की किराए की गाड़ी लेकर।
टीले ही टीले, पानी का नामोनिशान तक नहीं

सरवन राम अपने साथी डीडवाना के कप्तान महबूब के साथ जमीन देखने को निकल लिया। जैसलमेर के आगे जब ये गाड़ी ने आगे जाने में दिक्कत पैदा की तो वहां किराए की एक और गाड़ी कर पहुंचे तो जमीन देखकर माथा पीट लिया। टीले ही टीले, पानी दूर तक नहीं, ऐसे में यह जमीन नहरी कैसे हो गई। टूटी आस लेकर बीकानेर स्थित उपनिवेशन विभाग जाकर सारी आपबीती सुनाई। तब से फिर नहरी जमीन मिलने का इंतजार शुरू हो गया। आखिर सरवन राम के साथ इस मजाक की क्या जरूरत थी। पंद्रह बरस बीतने के बाद सेना के इस रिटायर जवान के टूटते भरोसे को संभाले कौन?इनका कहना है
पिछले साल अगस्त में जमीन के नाम पर टीले ही टीले मिले। अब ऐसी जमीन का क्या करें। उपनिवेशन विभाग को भी सब पता है। पंद्रह बरस बाद भी सेना के मेडल (गेलेंट्री अवॉर्ड) के साथ खिलवाड़ ही तो है ये।
-सरवन राम, रिटायर हवलदार सेना

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