Nagaur:यह क्या कर दिया राजस्थान रोडवेज के मुखिया ने, अब क्या होगा

शरद शुक्ला:नागौर.राजस्थान पथ परिवहन निगम में घाटे का रोना रोने वाले मुख्यालय स्तर के अधिकारी खुद निगम के ताबूत में आखरी कील ठोंकने में लगे हैं। निगम स

By: Sharad Shukla

Published: 09 Dec 2017, 10:54 PM IST

शरद शुक्ला:नागौर. मुख्यालय स्तर के अधिकारियों द्वारा लंबे समय से घाटे में चल रहे निगम के हित की जगह अनुबंधित एजेंसियों के आर्थिक हित को ज्यादा तरजीह दी जा रही है। डिपो स्तर पर होने वाले बसों के अनुबंध को पहली बार मुख्यालय ने निरस्त कर खुद के स्तर पर करने का फैसला तत्कालीन प्रबन्ध निदेशक रहे राजेश यादव के कार्यकाल में किया गया था। इस निर्णय के तहत स्टार लाइन, ब्लूलाइन, स्लीपर एवं वॉल्वों के बसों के प्रति किलोमीटर के भुगतान की दर पूर्व में होने वाले भुगतान की दर से दो से चार गुना ज्यादा रखी गई। लक्जरी किराए की दर में साधारण स्तर की बसें अनुबंध पर ली गई।
इसका भी नहीं रखा ध्यान
पूर्व में डिपो स्तर पर होने वाले अनुबंधों में डीजल निगम की ओर से देने की स्थिति में राशि वर्तमान में निर्धारित दर से आधी रहती थी। नए अनुंबंध में निर्धारित दरों के कारण हर माह प्रति बस का भुगतान एक लाख से लेकर सवा लाख तक पहुंच जाता है, लेकिन कई बसों का संचालन लगभग 15 किलोमीटर से अधिक होने पर यह आंकड़ा भी बढ़ जाता है। यानी की प्रति बस एक से सवा लाख तक भुगतान डीजल, पार्किंग आदि का देने के बाद भी लोगों के गले नहीं उतर रहा कि सभी सुविधाएं देने के बाद भी इतना भुगतान क्यों हो रहा है। मसलन महज नागौर आगार में ही कुल 17 अनुबंधित बसों का संचालन किया जाता है। इस तरह से हर माह का भुगतान 17 लाख तक पहुंचता है, जबकि अनुबंधित एजेंसी के केवल बस व चालक ही रहते हैं, शेष सुविधा का खर्च निगम वहन करता है। यही नहीं, बसों की धुलाई भी न्यूनतम स्तर पर वर्कशाप में ही करा ली जाती है। स्पष्ट है कि पूरा खर्चा निगम का और, मुनाफा
एजेंसी का।
कहीं सात तो, कहीं 13 रुपए में चल रही बसें
निगम की ओर से संचालित अनुबंध पर स्टार लाइन, ब्लूलाइन, स्लीपर एवं वॉल्वों बसें चल रही है। जानकारों के अनुसार प्रदेश के कुल 52 डिपो में मुख्यालय स्तर पर अनुबंधित बसों के संचालन में प्रति किलोमीटर किराए की दर में अप्रत्याशित रूप से बढ़ोत्तरी कर अनुबंध कर लिया गया। इनमें डिपो स्तर पर दी गई अनुबंधित बसों के किराए में भी खासा अंतर रखा गया। मसलन नागौर में साधारण बसों के प्रति किलोमीटर की दर 7.11, स्टारलाइन बसों की दर 8.90 पैसा रखी गई, जबकि जयपुर , सीकर, जोधपुर एवं अजमेर आदि जिलों के डिपो में अनुबंधित बसों के किराए की दर 7 से 13 रुपए तक तक रखी गई। इनमें सात, आठ, नौ इस तरह की दरें रहीं। पड़ताल में पता चला कि अनुबंध 1035 बसों का था, लेकिन रोड पर केवल 900 बसें चल रही हैं। डिपो स्तर पर इन बसों की संख्या कहीं 15 तो कहीं 20 रखी गई। विभागीय सूत्रों के अनुसार गत अक्टूबर माह में 900 बसों का एक माह का भुगतान 24 करोड़ 62 लाख किया गया। एक साल के अंतराल में यह राशि लगभग तीन सौ करोड़ यानी, तीन अरब पहुंच जाती है। जानकारों के अनुसार पूर्व में हुए अनुबंधों को जोडऩे पर यह आंकड़ा दस गुना तक पहुंचता है।
तो डिपो के बचते डेढ़ अरब
विभागीय जानकारों के अनुसार करीब एक साल पहले तत्कालीन एमडी राजेश यादव से पहले के अधिकारियों के कार्यकाल में बसों का अनुबंध डिपो स्तर पर होता था। इसमें प्रति किमी. की दर अधिकतम पांच रुपए ही पड़ती थी। इस दर से भुगतान होने पर निगम के सीधे डेढ़ करोड़ रुपए बच जाते। पहली बार मुख्यालय स्तर पर लिए गए इस निर्णय ने अनुबंधित एजेंसियों की सेहत तो बना दी, लेकिन रोडवेज की तबीयत बिगड़ गई।
बचते रहे अधिकारी, लगाए आरोप
इस संबंध में निगम के प्रबन्ध निदेशक कुलदीप रांका से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन वह मोबाइल कॉल रिसीव करने से बचते रहे। निगम के जनसंपर्क अधिकारी सुधीर भाटी का कहना था कि यह पॉलिसी मैटर है, इस पर कुछ नहीं कह सकते हैं। बीएएमएस के प्रदेश महामंत्री महेश त्रिवेदी एवं राष्ट्रीय मंत्री सत्यनारायण शर्मा का कहना था कि निगम के आलाधिकारियों की कारगुजारी से रोडवेज की हालत और बिगड़ गई है।

Sharad Shukla Reporting
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