मैं मकराना... दुनिया को चमकाऊं, अपनी तकदीर कहां से लाऊं

कहां तो मयस्सर था चरागां, हरेक घर के लिए , कहां चराग मयस्सर नहीं शहर के लिए

By: Rudresh Sharma

Updated: 04 Oct 2021, 01:18 PM IST

रुद्रेश शर्मा

नागौर. मैं मकराना, वही मकराना जिसका नाम जहन में आते ही चमचमाते खूबसूरत संगमरमर की तस्वीर आंखों के सामने उभर आती है। मेरे गर्भ से निकल रहे मखमली पत्थर से दुनिया जहां की इमारतों की सुंदरता में चार चांद लग रहे हैं।

चाहे दुनिया के आठ अजूबों में शामिल आगरा का ताज महल हो या आबूधाबी की मशहूर शेख जायद मस्जिद। मेरे ही जिस्म के हिस्से से इनका वजूद कायम है। मेरे भीतर छिपे वैश्विक सौंदर्य तत्व ने अपनी खूबरसूरती के दम पर विश्वविरासत के रूप में पहचान पाई है।


लेकिन आज बड़े ही अफसोस के साथ मैं अपना दर्द आपको बताने जा रहा हूं। दर्द यह कि मेरे गर्भ से निकलने वाले खूबसूरत संगमरमर ने भले ही देश और विदेश में राजस्थान और नागौर जिले, खासतौर पर मेरे नाम की पहचान बनाई हो, लेकिन इसके बावजूद मेरा अपना अस्तित्व एक बदसूरत शहर से ज्यादा कुछ नहीं। मेरी बदौलत करोड़ों का राजस्व अर्जित करने वाली सरकारों ने मेरी बेकद्री में कोई कसर नहीं रख छोड़ी है।


मुझे नागौर जिले की दूसरी नगर परिषद होने का तमगा हासिल है, लेकिन मेरी सूरत अपनी बदहाली को चीख-चीख कर बयां कर रही है। मखमली पत्थर उगलने वाले मकराना शहर की धरा जर्जर सडक़ों से छलनी है। बाहर से खूबरसूरत दिखने वाली नगर परिषद की बहु मंजिला इमारत तो सुंदर है, लेकिन बाहर निकलते ही शहर का असली चेहरा लोगों के सामने आ जाता है। दुनिया की खूबसूरती बढ़ाने मेंं इस शहर में शायद ही ऐसी कोई सडक़ हो जहां से बेफिक्र होकर गुजरा जा सके। मेरे से बेहतर हालात तो पड़ोस के गांव जूसरी और बोरावड़ की है। सत्ता के उदासीन चेहरों को मुझसे भला कोई क्या समझेगा।


मैं वही मकराना हूं, जहां सत्ताधारी पार्टी के जिलाध्यक्ष का निवास हैं। मैं उसी विधायक का गृह क्षेत्र हूं, जो विपक्ष में होने के बावजूद अपने क्षेत्र में सर्वाधिक सडक़ें बनवाने का दम भरते हैं। मैं वहीं मकराना शहर हूं, जहां सदैव कांग्रेस का बोर्ड रहा, लेकिन सत्ता में कांग्रेस होने के बावजूद मैं निहाल नहीं हो सका। मुझी से करोड़ों का राजस्व जुटाकर मुझ पर धेला भी खर्च नहीं करना, ये कहां का इंसाफ है, सरकार ।


यूं कहें तो मैं इस जिले का सबसे अमीर शहर हूं, फिर भी मुझ में शहर जैसा कुछ नहीं। न सुकून से चल पाने और रोशनी दिखाने वाली राहें हैं और ना पलभर आराम से गुजारने के लिए बाग-बगीचे। न मेरी सुंदरता बढ़ाने वाले कोई चौराहे और सुविधायुक्त रेलवे स्टेशन।


बस यूं कह सकते हैं कि नाम बड़े और दर्शन खोटे हैं। लब्बोलुआब में दुष्यंत का ये शेर मुझ पर सटीक बैठता है कि कहां तो मयस्सर था चरागां, हरेक घर के लिए , कहां चराग मयस्सर नहीं शहर के लिए । काश सियासतदारों को कोई ऐसा चिराग मिले कि उन्हें दीये तले अंधेरा भी नजर आए।

Rudresh Sharma
और पढ़े

राजस्थान पत्रिका लाइव टीवी

हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned