scriptRamdev Cattle Fair : Famous state level cattle fair across the country | ‘छिणम्या काळ’ से हुई माही मेले की शुरुआत | Patrika News

‘छिणम्या काळ’ से हुई माही मेले की शुरुआत

locationनागौरPublished: Nov 14, 2022 01:44:50 pm

Submitted by:

shyam choudhary

- श्री रामदेव पशु मेला : नागौरी नस्ल के बैलों के लिए देशभर में प्रसिद्ध राज्य स्तरीय पशुमेला
- परिवहन की रोक हटने व ट्रेन चलने से मिलेगी पशु मेले को संजीवनी

Shri Ramdev Cattle Fair : Famous state level cattle fair across the country
Shri Ramdev Cattle Fair : Famous state level cattle fair across the country
नागौर. कृषि उपयोगी बैलों की नागौरी नस्ल को राजकीय संरक्षण देने की पहल जोधपुर रियासत के तत्कालीन नरेश उम्मेदसिंह ने की थी। उन्होंने नागौर शहर से सटे मानासर में श्री रामदेव पशु मेला भरने की शुरुआत 1940, विक्रम संवत 1996 में पड़े भीषण अकाल (विक्रम सम्वत 1996 होने के कारण इसे ‘छिणम्या काळ’ कहा जाता है) में किसानों एवं पशुपालकों को राहत दिलाने के लिए की थी।
माघ मास में शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के दिन से मेला लगने के कारण कालान्तर में यह माघ मेला के नाम से विख्यात हुआ। बाद में अपभ्रंश होकर माही मेला के नाम से आमजन से लोकप्रिय हो गया। नागौरी नस्ल के बैलों की मजबूत कदकाठी एवं कृषि कार्यों में उपयोगी होने के कारण जल्दी ही इस मेले में उत्तर प्रदेश, पंजाब, बिहार, दिल्ली, हरियाणा, मध्यप्रदेश सहित पश्चिम बंगाल तक के व्यापारी पशुओं की खरीद फरोख्त के लिए पहुंचने लगे, लेकिन बछड़ों के परिवहन पर रोक लगने के बाद वैध तरीके से बैलों को खरीदकर ले जाने वाले पशुपालकों को भी रास्ते में परेशान किया जाने लगा।
आज एक बार फिर पशु मेले को संरक्षण की आवश्यकता महसूस की जा रही है। वर्तमान में नागौरी नस्ल पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं, वहीं लावारिस गोवंश की संख्या दिनों-दिन बढऩे से किसानों के लिए भी बड़ा संकट खड़ा हो रहा है। खरीफ के सीजन में लावारिस पशु फसलों को बड़ा नुकसान पहुंचा रहे हैं। ऐसे में यदि तीन साल के बछड़ों के परिवहन पर लगी रोक हटाकर पशु मेलों के दौरान पशु परिवहन के लिए ट्रेन चलाई जाए तो बड़ी समस्या का समाधान हो जाएगा और सरकार जो अनुदान गोशालाओं को दे रही है, वह आधा भी नहीं देना पड़ेगा।
एक दशक बाद मिला स्वरूप
देश की आजादी से सात वर्ष पहले शुरू हुए मेले को राज्य सरकार ने राज्य स्तरीय मेले के रूप में 1957 में मान्यता दी थी और इस राज्य स्तरीय मेले का आयोजन पशुपालन विभाग के जिम्मे सौंपा। मेले के दौरान किसानों व पशुपालकों को सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए जिला कलक्टर की अध्यक्षता में संचालन समिति बनाई गई। समिति के सदस्य जिले के प्रशासनिक अधिकारी विभिन्न व्यवस्थाओं का जिम्मा संभालते हैं।
‘नागौरी’ नस्ल का साहित्य में उल्लेख
साहित्यकार बाबू देवकीनन्दन खत्री ने सवा सौ वर्ष पहले लिखे अपने चर्चित उपन्यास ‘चन्द्रकान्ता सन्तति’ में तेज गति से चलकर कम समय में अधिक दूरी तय करने के लिए नागौरी नस्ल के बैलों का उल्लेख किया था।
मेला स्थल ‘मानासर’ है ऐतिहासिक गांव
डूकोसी ग्राम पंचायत में शामिल मानासर नागौर पंचायत समिति का गांव है, जहां यह मेला भरा जाता है। यहां एक प्राचीन शिव मंदिर, रानी एवं घोड़े की स्मृति में एक कलात्मक छतरी बनी हुई थी। गांव में लगे एक शिलालेख में 1331 विक्रम संवत के उल्लेख से स्पष्ट हो जाता है कि गांव का इतिहास लगभग साढ़े सात सौ वर्ष पुराना है।
बछड़ों पर लगी रोक का असर नागौरी गोवंश पर भी
यूं तो नागौरी नस्ल के बैल देश ही नहीं विश्वभर में प्रसिद्ध हैं। नागौर जिला मुख्यालय सहित परबतसर, मेड़ता एवं डीडवाना में भरने वाले राज्य स्तरीय पशु मेलों में बाहरी राज्यों के पशुपालक पशुओं की खरीदारी के लिए वर्षों से आते हैं, लेकिन वर्ष 2000 में हाईकोर्ट ने तीन वर्ष तक के बछड़ों के परिवहन पर रोक लगा दी। इसके बाद बाहर से आने वाले पशुपालकों को वापस जाते समय रास्ते में कुछ लोग गो तस्करी का आरोप लगाकर परेशान करने लगे। इसका असर यह हुआ कि धीरे-धीरे बाहरी राज्यों से आने वाले पशुपालकों की संख्या घटकर आधी से कम हो गई। पिछले 17 सालों में पशु मेला सिमटकर 20 फीसदी रह गया है। इसके चलते नागौरी गोवंश की स्थिति कमजोर होने लगी।

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