अपने ही काम नहीं आ रहा अपना 'खून'

shyam choudhary

Publish: Jun, 14 2018 11:10:25 AM (IST)

Nagaur, Rajasthan, India
अपने ही काम नहीं आ रहा अपना 'खून'

पर्याप्त स्टोरेज व संसाधनों के अभाव में जिले में दान किए जाने वाले रक्त को भेजना पड़ता
है अन्य जिलों में, जिले के मरीजों को समय पर नहीं मिलता रक्त

नागौर. विज्ञान ने आज कितनी भी प्रगति कर ली है, लेकिन वैज्ञानिक रक्त नहीं बना सके हैं। इसलिए आज तक रक्त किसी फैक्ट्री में नहीं बनाया जा सका है, यह मानव शरीर में ही तैयार होता है। इसकी जरूरत पडऩे पर किसी मानव को ही इसे दान करना पड़ता है। आप दीजिए, ताकि जरूरत पडऩे पर कोई दूसरा आपको रक्त देने में झिझके नहीं। इसी सोच के साथ नागौर के स्वयं सेवी संगठन (भारत विकास परिषद, महावीर इंटरनेरशनल, बीआर मिर्धा कॉलेज, माहेश्वरी समाज, रोटरी क्लब आदि) विभिन्न समाज एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं ने रक्तदान को लेकर जागरूकता का बीड़ा उठाया और उसमें सफल भी रहे। आज नाागौर जिले में हर वर्ष हजारों यूनिट रक्त एक ही शिविर में दान कर दिया जाता है, लेकिन दुर्भाग्य यह है कि शिविरों में दान किया जाने वाला 90 प्रतिशत रक्त बाहरी जिलों में भेजना पड़ता है। वजह है सरकारी चिकित्सा संस्थानों की अक्षमता एवं चिकित्सा अधिकारियों की उदासीनता।
जिला मुख्यालय के जेएलएन अस्पताल में संचालित ब्लड बैंक से रक्त लेने में आम नागरिक के खास को भी पसीने आ जाते हैं। खून की कमी से किसी की जान न जाए, यह सोचकर रक्तदान करने वाला व्यक्ति यहां आकर अपने विचार बदल देता है, जब उसे रक्तदान का कार्ड दिखाने पर भी रक्त नहीं मिलता। गंभीर बात यह है कि रक्तदान शिविर आयोजित करवाने वाले सामाजिक कार्यकर्ता जब उनकी सेवाएं लेने के लिए बुलाते हैं तो बहानेबाजी शुरू हो जाती है। संसाधन नहीं है, स्टाफ नहीं है या फिर पर्याप्त स्टोरेज है आदि। मजबूरन रक्तदान शिविर आयोजित करने वाले आयोजकों को जोधपुर, सीकर, अजमेर एवं जयपुर से सरकारी एवं निजी ब्लड बैंक से सम्पर्क करना पड़ता है जो एक फोन पर पूरी टीम के साथ आकर सेवा देते हैं।

नागौर की स्थिति
ब्लड स्टोरेज की स्थिति पर नजर डालें तो नागौर के जेएलएन अस्पताल में संचालित ब्लड बैंक की क्षमता 300 यूनिट की है, जबकि लाडनंू में ब्लड स्टोरेज यूनिट संचालित हैं। कुचामन व डीडवाना में ब्लड बैंक खोलने की कवायद पिछले दो साल से चल रही है, लेकिन सफलता नहीं मिली है।

युवाओं में जागरूकता, पर फायदा कम
सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि डीडवाना में दो साल पहले मंत्री ने ब्लड बैंक का उद्घाटन किया था, लेकिन आज तक ब्लड बैंक चालू नहीं हो पाई है। मरीजों को परेशानी का सामना करना पड़ता है, बाहर से लाना पड़ता है। सरकारी ब्लड बैंक की लिमिट कम होने के कारण वे बाहर सप्लाई नहीं कर पाते हैं। रक्तदान में नागौर जिले के लोग रिकॉर्ड तोड़ रहे हैं, लेकिन उनका खून यहां के लोगों के ही काम नहीं आ रहा।
डॉ. सोहनलाल चौधरी, चिकित्सक व सामाजिक कार्यकर्ता, डीडवाना

नागौर के अधिकारियों का रवैया ठीक नहीं
मैंने पिछले तीन-चार वर्षों में हजारों यूनिट रक्तदान करवाया है, लेकिन दुर्भाग्य है कि ज्यादातर रक्त हमें दूसरे जिलों के ब्लड बैंक को देना पड़ा। रक्तदान के दौरान जब भी नागौर जिले के ब्लड बैंक अधिकारियों से सम्पर्क किया, उन्होंने हमेशा बहानेबाजी कर टाल दिया। जरूरत पडऩे पर जब रक्त मांगते हैं तो भी उपलब्ध नहीं होने का जवाब मिलता है, वहीं दूसरी तरफ जोधपुर, जयपुर, सीकर, अजमेर जाने वाले मरीजों को फोन करते ही ब्लड उपलब्ध करवा दिया जाता है। नागौर जिले के लोगों में रक्तदान को लेकर जागरुकता तो आ रही है, लेकिन चिकित्सा विभाग के अधिकारियों का रवैया आज भी वही है।
महेन्द्र ग्वाला, सामाजिक कार्यकर्ता, नागौर

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