scriptThree little girls are fascinated by grain | पिता व दादा को बीमारी ने जकड़ा और माता विकलांग, तीन नन्हीं बालिकाएं हुई दाने-दाने को मोहताज | Patrika News

पिता व दादा को बीमारी ने जकड़ा और माता विकलांग, तीन नन्हीं बालिकाएं हुई दाने-दाने को मोहताज


- ग्राम आबास में एक झोपड़े में जीवन काट रहा है परिवार

- 45 डिग्री तापमान में पंखा तक नहीं
- परिवार सरकारी सुविधा से बेखबर: चिकित्सा,शिक्षा व खाने-पीने की सुविधाओं की दरकार

नागौर

Published: May 13, 2022 05:36:46 pm



पत्रिका ह्यूमन स्टोरी

दीपक कुमार शर्मा
नावां शहर. आमजन के लिए केन्द्र व राज्य सरकार कई योजनाएं चला रही है, जिनमें खाद्य सामग्री, चिकित्सा व बच्चों को निशुल्क शिक्षा का ढोल पीटा जा रहा है। लेकिन धरातल पर देखा जाए तो कई परिवार ऐसे हैं जिनमें खाने के तक के लाले पड़े हुए हैं। ये परिवार सरकार की निशुल्क योजनाओं से आज भी बेखबर हैं। ऐसा ही एक परिवार है नावां पंचायत समिति के भगवानपुरा पंचायत के राजस्व ग्राम आबास का। इस परिवार की दर्द भरी कहानी भी कुछ कम नहीं है। परिवार का मुखिया गम्भीर बीमारी के कारण युवा अवस्था में ही दो साल से खटिया में पड़ा है तो बुजुर्ग पिता की आंखों की रोशनी जा चुकी है। पुत्र वधू भी आधे शरीर से विकलांग है। हालत यह हो गई है कि परिवार के समक्ष दो वक्त की रोटी के भी लाले पडऩे लगे हैं। तीन छोटी बालिकाओं को भी भोजन के अभाव में कई बार भूखा सोना पड़ता है।
बीमारी बन गई बोझ
जानकारी के अनुसार ग्राम आबास निवासी 80 वर्षीय मूलाराम गुर्जर पिछले कई वर्षों से आंखों की रोशनी जा चुकी है। उसका 33 साल का पुत्र छीतरमल पिछले दो साल से खटिया में पड़ा जीवन काट रहा है। रीड की हड्डी में तकलीफ का ऑपरेशन होने से उसका उठना- बैठना मुश्किल हो गया है। परिवार का दर्द यहीं कम नहीं हुआ, छीतरमल की पत्नी केलादेवी भी आधे शरीर से विकलांग है। उसके हाथ,पैर व मुंह तक का एक तरफ का हिस्सा काम नहीं करता है। परिवार में कोई कमाने वाला नहीं होने और बीमारियों के इलाज में जमा पूंजी खर्च होने से आज परिवार के समक्ष आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। मूलाराम की तीन पोतियों का पालने पोषण भी मुश्किल हो गया है।
Father and grandfather were caught by illness and mother disabled, three little girls were fascinated by grain
नावां. खटिया पर पड़े बीमार छीतरमल को पानी पिलाती परिजन।
750 रुपए पेंशन व पड़ोसियों पर निर्भर
विकलांग केलादेवी को सरकारी की ओर से हर महीने 750 रुपए विकलांगता पेंशन मिलती है। उसी के सहारे घर खर्च चल रहा है। कुछ माह से ग्रामीण भी मदद कर रहे हैं।
परिवार की दयनीय स्थिति को देख रिश्तेदारों ने भी बालिकाओं को पालने का निर्णय लिया है। केलादेवी ने बताया कि आठ वर्षीय पुत्री मोनिका को रघुनाथपुरा निवासी बुआ घिसीदेवी पाल रही है। इसके साथ ही सात वर्षीय पिंकी को ननिहाल में नानी भंवरी देवी पाल रही है। जबकि सबसे छोटी बेटी पांच साल की आचुकि , आंगनबाड़ी में पढ़ती है। लेकिन आर्थिक तंगी व पति के इलाज के कारण एक मां से पुत्रियांं दूर हो गई है।
45 डिग्री तापमान में बिना पंखे झूपे में जीवन यापन
सरकारी सुविधाओं से वंचित यह परिवार एक छप्परेनुमा कमरे में जीवन यापन कर रहा है। भीषण गर्मी में इनके पास एक पंखा तक नहीं हैं। ग्राम पंचायत या पंचायत समिति का कोई भी जनप्रतिनिधि अब तक परिवार की मदद को आगे नहीं आया है। निशुल्क चिकित्सा सुविधाओं के नाम पर वाह-वाही लूटने वाली सरकार के जिम्मेदार अधिकारी भी इन लाचारों की सुध लेने नहीं पहुंचे हैं। सरकारी सुविधाओं से बेखबर यह परिवार आज हर तरह से मोहताज है।

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