अगर शादी से पहले नहीं करवाई अपने खून की जांच तो आपकी औलाद को भुगतनी पड़ सकती है सजा

अगर शादी से पहले नहीं करवाई अपने खून की जांच तो आपकी औलाद को भुगतनी पड़ सकती है सजा

Deepak Sahu | Updated: 09 May 2019, 05:38:35 PM (IST) Narayanpur, Narayanpur, Chhattisgarh, India

यह बच्चों को उनके माता-पिता से मिलने वाला आनुवांशिक (Genetic) रक्त रोग (Disease) है। इस रोग की पहचान बच्चे में 3 महीने बाद ही हो पाती है।ज्यादातर बच्चों में देखी जाने वाली इस बीमारी की वजह से शरीर में रक्त की कमी होने लगती है और उचित उपचार न मिलने पर बच्चे की मृत्यु तक हो सकती है।

दंतेवाड़ा. आज वर्ल्ड थैलेसीमिया डे (World Thalassemia Day) है और भारत इस बीमारी के मामले में नम्बर वन है। थैलेसीमिया की बीमारी उन गिने चुने बीमारियों में से एक है जो इंसान के जन्म लेने से पहले ही इसका शिकार हो जाता है। देश में हर साल दस हजार बच्चे इस बीमारी के साथ जन्म लेते हैं।

यह बच्चों को उनके माता-पिता से मिलने वाला आनुवांशिक (Genetic) रक्त रोग (Disease) है। इस रोग की पहचान बच्चे में 3 महीने बाद ही हो पाती है।ज्यादातर बच्चों में देखी जाने वाली इस बीमारी की वजह से शरीर में रक्त की कमी होने लगती है और उचित उपचार न मिलने पर बच्चे की मृत्यु तक हो सकती है।

थैलेसीमिया रक्त संबंधित जेनेटिक बीमारी है। सामान्य तौर पर एक स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में रेड ब्लड सेल्स यानी की आरबीसी की संख्या 45 से 50 लाख प्रति घन मिली मीटर होती है। इस बीमारी के दौरान आरबीसी तेजी से नष्ट होने लगते हैं और नए सेल्स बनते नहीं है। सामान्य तौर पर रेड ब्लड सेल्स की औसतन आयु 120 दिन होती है जो घटकर लगभग 10 से 25 दिन ही रह जाती है। इसके कारण शरीर में खून की कमी होने लगती है और धीरे-धीरे व्यक्ति अन्य बीमारियों का भी शिकार होने लगता है।

आइए जानते हैं आखिर क्या है ये बीमारी और इसके लक्षण और बचाव के तरीके

क्या है यह बीमारी

आमतौर पर हर सामान्य व्यक्ति के शरीर में लाल रक्त कणों की उम्र करीब 120 दिनों की होती है, लेकिन थैलेसीमिया से पीड़ित रोगी के शरीर में लाल रक्त कणों की उम्र घटकर मात्र 20 दिन ही रह जाती है । इसका सीधा असर व्यक्ति के हीमोग्लोबिन (hemoglobin) पर पड़ता है । जिसके कम होने पर व्यक्ति एनीमिया का शिकार हो जाता है और हर समय किसी न किसी बीमारी से ग्रसित रहने लगता है ।

थैलेसीमिया के प्रकार

थैलेसीमिया (Thalassemia) दो तरह का होता है। माइनर थैलेसीमिया या मेजर थैलेसीमिया. किसी महिला या फिर पुरुष के शरीर में मौजूद क्रोमोजोम खराब होने पर बच्चा माइनर थैलेसीमिया का शिकार बनता है। लेकिन अगर महिला और पुरुष दोनों व्यक्तियों के क्रोमोजोम खराब हो जाते हैं तो यह मेजर थैलेसीमिया की स्थिति बनाता है। जिसकी वजह से बच्चे के जन्म लेने के 6 महीने बाद उसके शरीर में खून बनना बंद हो जाता है और उसे बार-बार खून चढ़वाने की जरूरत पड़ने लगती है ।

थैलेसीमिया की पहचान

थैलेसीमिया असामान्य हीमोग्लोबिन और रेड ब्लड सेल्स के उत्पादन से जुड़ा एक ब्लड डिसऑर्डर है। इस बीमारी में रोगी के शरीर में रेड ब्लड सेल्स कम होने की वजह से वो एनीमिया का शिकार बन जाता है। जिसकी वजह से उसे हर समय कमजोरी,थकावट महसूस करना, पेट में सूजन, डार्क यूरिन, त्वचा का रंग पीला पड़ सकता है ।

थैलेसीमिया से बचने के लिए घरेलू उपचार

इस गंभीर रोग से होने वाले बच्चे को बचाने के लिए सबसे पहले शादी से पहले ही लड़के और लड़की की खून की जांच अनिवार्य कर देनी चाहिए ।

अगर आपने खून की जांच करवाए बिना ही शादी कर ली है तो गर्भावस्था के 8 से 11 हफ्ते के भीतर ही अपने डीएनए की जांच करवा लेनी चाहिए ।

माइनर थैलेसीमिया से पीड़ित व्यक्ति किसी भी सामान्य व्यक्ति की तरफ अपना जीवन जीता है. बिना खून की जांच करवाए कई बार तो उसे पता ही नहीं चलता कि उसके खून में कोई दोष भी है। ऐसे में अगर शादी से पहले ही पति-पत्नी के खून की जांच करवा ली जाए तो काफी हद तक इस आनुवांशिक रोग से होने वाले बच्चे को बचाया जा सकता है।

थैलेसीमिया का उपचार

थैलेसीमिया का इलाज, रोग की गंभीरता पर निर्भर करता है। कई बार थैलेसीमिया से ग्रसित बच्चों को एक महीने में 2 से 3 बार खून चढ़ाने की जरूरत पड़ सकती है।

बोन मैरो प्रत्यारोपण से इन रोग का इलाज सफलतापूर्वक संभव है लेकिन बोन मैरो का मिलान एक बेहद मुश्किल प्रक्रिया है ।

इसके अलावा रक्ताधान, बोन मैरो प्रत्यारोपण, दवाएं और सप्लीमेंट्स, संभव प्लीहा या पित्ताशय की थैली को हटाने के लिए सर्जरी करके भी इस गंभीर रोग का उपचार किया जा सकता है।

 

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