scriptfishermen said,if this happens, then Mahashir can be saved in Narmada | मछुआरे बोले-अगर ऐसा हो तो बच सकती है नर्मदा-तवा में महाशीर | Patrika News

मछुआरे बोले-अगर ऐसा हो तो बच सकती है नर्मदा-तवा में महाशीर

कोलकाता की सिल्वर चीतल मछली चट कर रही नर्मदा की छोटी मछलियां, मछली बाजार-मंडी में भी इन मछलियों की आवक हो गई खत्म, सैकड़ों मछुआरे बेरोजगार हुए, रेत भराई की मजदूरी भी नहीं दे रही साथ

नर्मदापुरम

Published: April 30, 2022 12:53:13 pm

देवेंद्र अवधिया
नर्मदापुरम. मैं मछली हूं। नर्मदा के आंचल में मेरा घर है। जल को साफ करती हूं। पवित्र जल पीने को देती हूं। मेरा भी परिवार है, बच्चे हैं फिर मुझे क्यों पकड़ते हो, मेरी सांसे टूट रही है, मुझे क्यों मार रहे हो। ऐसे में मेरा अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा। नर्मदा के तटों व घाटों किनारे देखकर माने ऐसा लगता है जैसे मछलियां खुद ये कह रही है। जी हां, हम बात कर रहे हैं नर्मदा के मीठे पानी की महारानी बाड़स यानी महाशीर मछली की। लगातार हो रहे रेत के अवैध उत्खनन और प्रदूषण से जलीय जीवों पर संकट बढ़ रहा है। हालत ये है कि बाड़स-महाशीर मछली भी विलुप्ति की कगार पर है। अब ये खास मछली नर्मदा में बहुत कम दिखाई दे रही है। इनकी संख्या में भारी कमी के कारण मछुआरे भी मछली मार्केट में इन्हें लाकर नहीं बेच पा रहे। ये मछली जिले से बाहर भी सप्लाई नहीं हो पा रही है। अब नर्मदा नदी में बाड़स सहित विशेष प्रजाति की रोहू, नरेन जैसी बड़ी और अच्छी मछलियां नहीं मिलतीं। इसके कारण मत्याखेट और इसके कारोबार-रोजगार पर भी संकट पैदा हो गया है। जिले के हजारों मछुआरा परिवार बेरोजगार हो चुके हैं। मत्स्याखेट के पुस्तैनी धंधे को छोड़कर मछुआरे, मांझी-मल्लाह और केवट समाज के लोगों रास्ता बदला रेत भराई की मजदूरी करने लगे, लेकिन बीते दस माह से खदानें भी बंद होने से यह समाज आर्थिक तंगी से जूझ रहा है। भीषण तपन के वाष्पीकरण के चलते नर्मदा-तवा में पानी का बहाव भी कम हो गया है।

थम नहीं रहा जिले में अंधाधुंध खनन
जिले में नर्मदा-तवा नदी के तटों पर रेत का अवैध खनन थम नहीं रहा है। सालों से जारी इस अंधाधुंध खनन से नदियों के किनारे एवं प्रवाह भी बदल चुके हैं। पानी की गहराई भी कई स्थानों पर कम हो गई है। रेत के टीले तक निकल आए हैं। किनारों के साथ ही पानी के अंदर टै्रक्टर मशीनें चलाकर भी रेत की उलीचा जा रहा है। इस कारण भी मछलियां रहवास बदल रही और इनका प्राकृतिक जीवन भी खतरे में चल रहा है।

मछुआरे भी नहीं कर पा रहे महाशीर का संरक्षण-संवर्धन
जिले में मछुआरों की संख्या करीब 50 से 60 हजार है। ये भी चाहते हैं कि नर्मदा-तवा की मछलियों का संरक्षण-संवर्धन हो, लेकिन जिम्मेदार मत्स्य पालन विभाग के पास इसके लिए बारिश के पहले कोई कार्ययोजना ही तैयार नहीं है। मांझी-निशाद सेना नर्मदापुरम के अध्यक्ष प्रदीप मांझी, संतोष मांझी, देव कहार, अमन कहार आदि का कहना है कि बाड़स के साथ ही रोहू और नरेन प्रजाति की मछली की संख्या भी भारी मात्रा में घट चुकी है। बड़े ठेकेदारों के डैम में बोरियों से पावडर डाल देने से भी मछलियां अचेतन होकर नीचे तल में चली जाती है। जो वापस ऊपर नहीं लौटती। इसलिए भी मछलियों का जीवन संकट में आ गया है। इन मछुआरों व समाज के पदाधिकारियों का कहना है कि विभाग को नर्मदा-तवा में मछलियों के बीज छोडऩे चाहिए और आगामी चार माह के बारिशकाल के प्रजननकाल मत्याखेट पर पूरी तरह सख्ती से रोक लगनी चाहिए। तभी नदियों में मछलियों का संरक्षण-संवर्धन हो सकेगा।
मछुआरे बोले-अगर ऐसा हो तो बच सकती है नर्मदा-तवा में महाशीर
मछुआरे बोले-अगर ऐसा हो तो बच सकती है नर्मदा-तवा में महाशीर
कोलकाता की चीतल मछली चट कर रही छोटी मछलियां
नर्मदापुरम जिले में नर्मदा-तवा नदी में बड़े ठेकेदारों ने यहां कोलकाता से सिल्वर कलर की बड़ी चीतल मछलियां लाकर छोड़ दी है। ये मछली यहां की छोटी मछलियों को लगातार चट कर रही है। इससे भी मछलियों की संख्या में कमी आ रही है।

इनका कहना है...
जिले में मछलियों के संरक्षण-संवर्धन के लिए कार्ययोजना तैयार की जा रही है। इसमें आगामी बारिशकाल के प्रजननकाल में मछलियों के मत्स्याखेट पर सख्ती से प्रतिबंध लगाया जाएगा। साथ ही महाशीर की संख्या को बढ़ाने के हैचरी (बीज उत्पादन केंद्र) बनाने की पांच वर्षीय वृहद कार्ययोजना भी है।
-राजीव श्रीवास्तव, सहायक संचालक मत्स्योद्योग विभाग नर्मदापुरम।

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