scriptDevalokagaman of Shankaracharya Swaroopanand Saraswati at age of 99 | शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती की धर्म यात्रा और उनके द्वारा धर्म स्थापना के लिए किए गए विशेष प्रयास | Patrika News

शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती की धर्म यात्रा और उनके द्वारा धर्म स्थापना के लिए किए गए विशेष प्रयास

- शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती का 99 वर्ष की उम्र में देवलोकगमन
- स्मृति शेष: नरसिंहपुर के झोंतेश्वर में आज दी जाएगी भू-समाधि

नरसिंहपुर

Published: September 12, 2022 03:16:08 am

नरसिंहपुर। द्विपीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती का 99 वर्ष की आयु में रविवार को देवलोकगमन हो गया। वे ज्योतिर्मठ और शारदा पीठ द्वारका के शंकराचार्य थे। उन्होंने नरसिंहपुर के झोंतेश्वर स्थित परमहंसी गंगा आश्रम में दोपहर को अंतिम सांस ली। वे लंबे समय से बीमार चल रहे थे। 2 सितंबर को ही शिष्यों ने उनका 99वां जन्मदिवस मनाया था।

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शंकराचार्य के सचिव सुबुधानंद ब्रह्मचारी ने बताया कि उनकी पार्थिव देह को झोंतेश्वर के गंगा कुंड में अंतिम दर्शन के लिए रखा जाएगा। उन्हें सोमवार को झोंतेश्वर में ही भू-समाधि दी जाएगी। शंकराचार्य स्वरूपानंद के देवलोकगमन की खबर लगते ही परमहंसी गंगा आश्रम में उनके शिष्यों और भक्तों का तांता लग गया। देश भर से उनके शिष्य भी अंतिम दर्शन के लिए नरसिंहपुर के लिए रवाना हो गए हैं।

9 वर्ष की उम्र से ही धर्म यात्रा
महाराज का जन्म 2 सितंबर को मध्यप्रदेश के सिवनी जिले के दिघोरी गांव में ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनका मूल नाम पोथीराम उपाध्याय था। उन्होंने मात्र 9 वर्ष की आयु में गृह त्याग कर धर्म यात्रा आरंभ कर दी। उन्होंने ब्रह्मलीन स्वामी करपात्री महाराज से वेद-वेदांग की शिक्षा ली। उन्होंने वर्ष 1950 में ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती से दंड संन्यास की दीक्षा ली और स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के नाम से प्रसिद्ध हुए। उन्हें 1981 में शंकराचार्य की उपाधि मिली।

धर्म स्थापना के लिए किए गए विशेष प्रयास:
- राम राज्य परिषद का गठन किया।
- आदिवासियों के लिए विश्व कल्याण आश्रम की स्थापना की।
- गोरक्षा के लिए विशेष प्रयास किए।
- राम मंदिर के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी।
- गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित कराया।
- रामसेतु परियोजना का विरोध किया।

क्रांतिकारी संत के रूप में भी पहचाने गए:
जब 1942 में अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन का घोष मुखरित हुआ तो महाराज भी स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े और मात्र 19 वर्ष की अवस्था में क्रांतिकारी साधु के रूप में प्रसिद्ध हुए। इसी सिलसिले में वाराणसी और मध्यप्रदेश की जेलों में क्रमश: 9 और 6 महीने की सजाएं भोगनी पड़ी।

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