पुरुषों में वह श्रेष्ठ, जो मान अभिमान, सुख दुख से परे

पुरुषों में वह श्रेष्ठ, जो मान अभिमान, सुख दुख से परे
नर्मदा किनारे चातुर्मास कर रहे संत षणमुखानंद हीरापुर वाले महाराज ने श्रीमद्भागवत गीता पर उपदेश देते हुए कहा

Ajay Khare | Publish: Jul, 26 2019 09:19:42 PM (IST) Narsinghpur, Narsinghpur, Madhya Pradesh, India

नर्मदा किनारे चातुर्मास कर रहे संत षणमुखानंद हीरापुर वाले महाराज ने श्रीमद्भागवत गीता पर उपदेश देते हुए कहा

करेली। पं.दुर्गाप्रसाद चौबे स्मृति धर्मशाला एवं सत्संग भवन बरमान खुर्द में चातुर्मास कर रहे मां राजराजेश्वरी, मां नर्मदा के उपासक संत षणमुखानंद हीरापुर वाले स्वामीजी महाराज ने श्रीमद्भागवत गीता पर उपदेश देते हुए कहा कि मानवों में श्रेष्ठ पुरुष होता है और पुरुषों में श्रेष्ठ वह है जो मान अभिमान, सुख दुख से परे है। सुख दुख में सम रहना, धीरज धारण करना । ऐसा करने वाले ने समझो मानव जीवन में ही अमृत को पा लिया। मान अभिमान, सुख दुख से विचलित नहीं होना गीता का उपदेश है। अपने आप में स्थिर रहना चाहिए, सदा संतुष्ट रहिये। सुख दुनिया चाहती है, दुख कोई नहीं चाहता। इसका एक तरीका है स्वयं को भगवान को सौंप दो, सुख दुख से दूर हो जाओगे। प्रभु चरणों में परिपूर्ण शरणागति सुख दुख से परे होने का उपाय है। प्रभु की भक्ति की जरा सी भी अनुभूति आपने प्राप्त की हो तभी यह संभव है।
हनुमान स्वयं साक्षात शिव
स्वामीजी ने कहा कि मीराबाई की तरह भगवान की भक्ति करते करते उसमें लीन हो जाओ। लोग कहे मीरा बावरी ् जब प्रभ हृदय में विराज जाएं तो लोग क्या कह रहे हैं यह चिंता कौन करे, यह श्रेष्ठ है भक्ति है। भगवान को पाने, भक्ति के चार उपाय हैं। पहला भगवान को मलिक मानो, उनके दास हो जाओ, बिल्कुल हनुमान की तरह, सदा सम रहना। हनुमान स्वयं साक्षात शिव हैं, शिव के अवतार हैं। वह योगीराज हैं।

सनातन की विशेषता इसमें क्षमा नहीं
स्वामीजी ने कहा कि भक्ति का दूसरा उपाय है भगवान को पिता, जगदंबा को अपनी माता मान लो। तीसरा भगवान का सगा बनकर भी उनकी भक्ति कर सकते हैं और चौथा जीव सब नारी हैं भगवान को अपना पति मानकर भक्ति कर सकते हैं। तुम भगवान को भजो ना भजो उससे भगवान को कोई फर्क नहीं पड़ता। आपका अच्छा बुरा आपके पूर्व जन्म का संस्कार है। सनातन की विशेषता है इसमें क्षमा नहीं होती। भले ही क्षमा मांगने की परंपरा है। साक्षात भगवान को भी एक अवतार की गलती का प्रायश्चित दूसरे अवतार में करना पड़ा है।
मां नर्मदा वेदगंगा है
नर्मदा मैया की महिमा का बखान करते हुए स्वामीजी ने कहा कि जो कलियुग में भी क्षीण नहीं हुई ऐसी नर्मदा मैया साक्षात यहां विराजमान हैं। सातों कल्प नष्ट हो गए, नर्मदा ज्यों की त्यों हैं। नर्मदा मैया आपका यह जीवन भी और अगला जन्म भी सुधरवा देगी। मां नर्मदा वेदगंगा हैं। वे अविरल प्रवाहमान हैं, नर्मदा में स्नान करने से उन्हें न कोई लाभ है न कोई हानि है। तुम्हें जरूर तीर्थ स्नान का लाभ मिलता है, पाप क्षीण होते हैं, शरीर शुद्ध होता है। गुरु महिमा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि गुरु भले ही शरीर छोड़ दे परंतु गुरु तत्व कभी समाप्त नहीं होता, वह सूक्ष्म जगत में शिष्यों के कल्याण के लिए सदैव व्याप्त रहता है। गुरु तत्व का प्रभाव सदैव विद्यमान रहता है। चौबे धर्मशाला में प्रतिदिन संध्या 7 बजे से 8 बजे तक आयोजित सत्संग, उपदेश में धर्म सरिता का प्रवाह हो रहा है।

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