प्रेम और भक्ति में अंतर, भक्ति में मर्यादा है इसलिए शबरी की प्रतीक्षा ही तपस्या हो गई

प्रेम और भक्ति में अंतर, भक्ति में मर्यादा है इसलिए शबरी की प्रतीक्षा ही तपस्या हो गई

प्रेम और भक्ति में अंतर, भक्ति में मर्यादा है इसलिए शबरी की प्रतीक्षा ही तपस्या हो गई- षण्मुखानंद जी महाराज
चातुर्मास धाम बरमान खुर्द में दैनिक उपदेश, सत्संग जारी

नरसिंहपुर/करेली-नर्मदा जी शिवप्रिया हैं। वे भगवान शंकर की अति प्रिय हैं इसीलिए मेकलसुता भी कहलाती हैं। जगत में जितने प्रकार की सिद्धियां हैं, वह प्रदान करती हैं। नर्मदा जी सकल, सिद्धि, सुख, संपति, राशि प्रदान करती हैं। नर्मदा जी को भज के देखो वह आप पर कृपा करने आप की श्रेणी में उतर के आ जायेंगी। बरमान खुर्द धर्मशाला एवं सत्संग भवन में चातुर्मासरत तपोनिष्ठ संत षण्मुखानंद जी महाराज ने रविवार शाम दैनिक उपदेश में उक्ताशय के आशीर्वचन कहे। उन्होंने नर्मदा जी की व्याख्या करते हुए कहा कि नर यानि सुख और दा यानि देने वाली। नर्मदा जी यह सुख नहीं, वे सच्चिदानंद, शिवानंद, परमानंद सुख देती है। नर्मदा किनारे के झाड़ भी आयु पूर्ण कर नर्मदा जल में गिर जाए तो उनको भी मुक्ति मिलती है। स्वामी जी ने बताया कि चातुर्मास अवधि में सत्संग का विषय श्रीमद्भागवत गीता रखा गया है। कहा कि गीता के 18 अध्याय में 6 अध्याय मैं कर्म की व्याख्या कर्मयोग है, 6 में भक्ति योग और 6 में ज्ञान योग की व्याख्या है। हालांकि कुछ विद्वानों ने कर्म भक्ति ध्यान और ज्ञान के बारे में भी कहा है। उन्होंने कहा कि पहले कर्म करो, आपको जिस परिस्थिति में भगवान ने जन्म दिया उस अनुसार कर्मनिष्ठ बनो, कर्तव्य पूर्ण करो, परंतु कर्म में लिप्त मत रहो, मालिक मत बनो, कराने वाला कोई और है, आप कुछ नहीं हो,आप निमित्त मात्र हो। भक्ति की व्याख्या करते हुए कहा कि प्रेम और प्यार शब्द अधिक प्रचलन में हैं। जीव के साथ हो तो उसे प्रेम व प्यार कहते हैं। गुरुजनों के साथ हो जाए तो गुरु भक्ति और परमात्मा के साथ हो तो भगवत भक्ति कहलाती है। प्रेम और भक्ति में अंतर है, भक्ति में मर्यादा है। भगवान ने शबरी को नौ प्रकार की भक्ति बताई। कहा शबरी की प्रतीक्षा ही तपस्या हो गई। उन्होंने बुढ़ापे तक गुरु आदेश को मन में धारण कर भगवान प्रतीक्षा की, अंतत: भगवान के दर्शन मिले। कहा गुरु प्रसन्न हो जाएं तो आशीर्वाद मिलता नहीं, बरसता है। आप जिस वस्तु को समय नहीं दे रहे हैं, यानी उसे आप हल्का मान रहे हैं। जब तक ईश्वर को श्रेष्ठ नहीं मानेंगे भक्ति नहीं होगी। भगवान के दास को भागवत कहते हैं। श्रीमद् भागवत भगवान के दासों का पुराण है। हालांकि इसमें कृष्ण लीला भी है।
ध्यान के बारे में बताते हुए कहा कि ध्यान के प्रति आजकल ज्यादा आकर्षण है। लोग ध्यान करते हैं परंतु वह लगता ही नहीं है। ध्यान स्वतंत्र सत्ता है, लगना और छूटना यह ध्यान पर ही निर्भर है। वह समय में बंधने वाली क्रिया नहीं है। ध्यान मन से परे वस्तु है। मेडिटेशन, ध्यान के नाम पर आजकल दुकानदारी चल रही है। पहले कर्म, फिर भक्ति में आओगे, तब ध्यान में आ पाओगे। चातुर्मास अवधि के दौरान धर्मशाला में प्रतिदिन प्रात: 8 बजे से 9 बजे तक पूज्यश्री से भेंट व दर्शन, 10.30 बजे से 5 बजे तक दिव्यश्री पूजन, संध्या 7 बजे से 8 बजे तक दैनिक उपदेश, सत्संग चल रहा है।

Amit Sharma
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