scriptaswathama wandering for death | क्या मृत्यु के लिए आज भी भटक रहा है अश्वत्थामा? | Patrika News

क्या मृत्यु के लिए आज भी भटक रहा है अश्वत्थामा?

अश्वत्थामा की मौत नहीं हुई। कृष्ण के शाप के बाद वह आज भी भटक रहा है...

Published: January 17, 2015 11:20:35 am

क्या महाभारत का पात्र अश्वत्थामा आज भी जिंदा है? अगर आधुनिक विज्ञान के नजरिए से देखा जाए तो किसी मनुष्य का इतने साल तक जिंदा रहना नामुमकिन है। वहीं, प्राचीन ग्रंथ और धार्मिक मान्यताएं इस बात की प्रबल समर्थक हैं कि अश्वत्थामा आज भी जिंदा है।

क्यों भटक रहा है अश्वत्थामा
अश्वत्थामा महान योद्धा व शिक्षक द्रोणाचार्य का पुत्र है। वह खुद भी बहुत बहादुर और युद्धविद्या का विशेषज्ञ था। महाभारत के युद्ध में जब पांडवों की ओर से यह घोषणा की गई कि अश्वत्थामा मारा गया तो द्रोणाचार्य को बहुत दुख हुआ। पुत्र के वियोग में उन्होंने अपने हथियार डाल दिए। तब द्रौपदी के भाई धृष्टद्युम्न ने उनका सिर काट दिया।

... लेकिन अश्वत्थामा अभी जिंदा था। युद्ध में अश्वत्थामा नामक हाथी मारा गया था। इससे वह क्रोधित हो गया और उसने अपने पिता की मौत का बदला लेने का फैसला किया।

युद्ध के आखिरी दौर में रात के अंधेरे में उसने धृष्टद्युम्न सहित द्रौपदी के पांच पुत्रों की हत्या कर दी। उसने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग भी कर दिया। भगवान कृष्ण उसके इस कार्य से क्रोधित हुए। उसके माथे पर लगी मणि को निकाल लिया गया।

कृष्ण ने उसे शाप दिया कि वह हजारों साल तक इस पाप को ढोता हुआ निर्जन स्थानों पर भटकता रहेगा। उसके माथे का घाव उसे निरंतर कष्ट देता रहेगा और वह कभी ठीक नहीं होगा।

आज भी आता है अश्वत्थामा!
कहा जाता है कि तब से ही अश्वत्थामा उस कष्ट को भोगता हुआ धरती पर भटक रहा है। ऐसा भी माना जाता है कि वह कुरूक्षेत्र व अन्य तीर्थस्थलों पर भी देखा गया।

कुछ लोगों का मानना है कि शाप के बाद वह रेगिस्तानी क्षेत्र में चला गया और वहीं रहने लगा। इस प्रकार महान शिक्षक का पुत्र अश्वत्थामा ज्ञानी, योद्धा और वीर होने के बावजूद मौत के लिए भटक रहा है। कुछ लोगों का मानना है कि अश्वत्थामा शिव का भक्त है और वह उनके मंदिरों में पूजन करने जाता है।

लोगों से क्या मांगता है अश्वत्थामा
कई लोगों का कहना है कि अश्वत्थामा अपने माथे के घाव के इलाज के लिए उस पर पट्टी बांधे रखता है। कभी-कभी वह लोगों से अपने दर्द को दूर करने के लिए हल्दी और तेल भी मांगता है। आयुर्वेद के अनुसार तेल और हल्दी घाव भरने के काम आते हैं। घरेलू नुस्खों में यह काफी प्रचलित भी है।

कहा जाता है कि महान योद्धा पृथ्वीराज चौहान भी अश्वत्थामा से मिले थे। एक बार पृथ्वीराज चौहान वन में गए। वहां उन्हें एक बूढ़ा साधु मिला। उसके माथे पर गहरा घाव था और उसे इससे पीड़ा हो रही थी।

पृथ्वीराज युद्धविद्या के साथ ही आयुर्वेद की भी अच्छी जानकारी रखते थे। उन्होंने साधु से कहा कि मैं आपका यह रोग ठीक कर दूंगा। साधु उपचार कराने के लिए खुशी-खुशी तैयार हो गया। पृथ्वीराज ने कई औषधियों का लेप तैयार किया और घाव पर लगाया लेकिन घाव बिलकुल भी ठीक नहीं हुआ।

पृथ्वीराज को बहुत आश्चर्य हुआ, क्योंकि उन्होंने जिन औषधियों से लेप तैयार किया था, उससे कितना भी गहरा घाव ठीक हो सकता था। आखिरकार एक दिन उन्होंने पूछ लिया, आप मुझे साधारण मानव नहीं लगते। क्या आप अश्वत्थामा हैं? क्योंकि आयुर्वेद की कोई भी औषधि सिर्फ अश्वत्थामा का ही घाव ठीक नहीं कर सकती।

कहा जाता है कि साधु ने यह बात स्वीकार कर ली कि वह अश्वत्थामा ही है। उसने पृथ्वीराज को शब्दभेदी बाण का प्रयोग करने की विधि भी सिखाई।

इस कथा में कितनी सत्यता है, यह सिद्ध करना असंभव ही है। क्योंकि पृथ्वीराज भी अब दुनिया में नहीं रहे और अश्वत्थामा के बारे में ऐसी ढेरों कहानियां हैं। फिर भी यह रहस्य तो बरकरार ही है कि अश्वत्थामा कहां गया? किसी भी ग्रंथ में उसकी मौत का जिक्र नहीं किया गया और सभी प्रमाण इस संबंध में मौन हैं।

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