दागियों से दागदार दामन

विडम्बना है कि राजनीति में नैतिकता के मन्त्र-द्रष्टा महात्मा गांधी के देश में बाहुबलियों का जोर बढ़ ...

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Published: 16 Jan 2015, 12:12 PM IST

विडम्बना है कि राजनीति में नैतिकता के मन्त्र-द्रष्टा महात्मा गांधी के देश में बाहुबलियों का जोर बढ़ रहा है। देखा जाए तो राजनीतिक दलों में टिकट बांटने का पैमाना बदल चुका है। बाहुबली, धन कुबेरों, क्षेत्रीय नेताओं को टिकट मिलने लगा है। जब ऎसे लोग चुनकर आएंगे तो संसद में क्या होगा?

डॉ. सतीश मिश््रा, वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक
राजनीति और अपराध का निकट का गठजोड़ तो वैसे पूरे विश्व में है, पर भारत में यह व्यापक तौर पर फैल रहा है। इसकी बुनियाद तो पिछली सदी में साठ के दशक में ही पड़ गई थी जब देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल की मतदाताओं पर पकड़ ढीली होने लगी थी। स्वतंत्रता आन्दोलन का जो मिशनरी भाव था, वह सत्ता की निरंकुश महत्वाकांक्षाओं में तब्दील होने लगा था। शुरूआत में राजनीतिज्ञों ने छवि निर्माण के लिए धनबल, बाहुबल और मीडिया को हथियार बनाया लेकिन समय बीतने के साथ ही धीरे-धीरे राजनीतिक व्यवस्था इन तीनों के कब्जे में आ गई।

सत्ता की भूख से पीडित राजनीतिक नेताओं ने इन तीनों तत्वों को हाथों हाथ लिया क्योंकि अपराधी उनकी और उनके प्रत्याशियों की जीत सुनिश्चित कर देेते थे। शुरू में राजनीतिक दलों और नेताओं ने सत्ता में आने के लिए अपराधियों का इस्तेमाल किया लेकिन बड़ी तेजी से समीकरण बदलने शुरू हो गए। अपराधियों को लगने लगा कि जब वे किसी को जिता सकते हैं तो खुद क्यों नहीं जीत सकते। अपराध और राजनीति का खुला खेल सामने आ गया और अपराधी राजनीति में अपने हिस्से की मांग करने लगे।

सत्तर के दशक के मध्य तक लगभग हर राजनीतिक दल इस कुचक्र की गिरफ्त में आ गया। चुनाव दर चुनाव लोक सभा और राज्यों की विधानसभाओं में अपराधियों के प्रतिनिधित्व में इजाफा होता गया। पन्द्रहवीं लोकसभा में तो हद ही हो गई। जीत कर ऎसे 162 सांसद आए जिनके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज थे। चोरी-डकैती से लेकर हत्या तक के मामले दर्ज थे। यदि हत्या, अपहरण और शारीरिक उत्पीड़न के गंभीर मामलों को ही देखा जाए तो लगभग 14 फीसदी यानी 76 सांसदों पर ऎसे मामले लम्बित थे।

स्थानीय निकायों में भी बोलबाला
राज्यों की विधानसभाओं पर गौर फरमाएं-हर तीन में से एक विधायक पर आपराधिक मामला दर्ज है। 31 फीसदी विधायकों पर कम से कम एक मामला तो दर्ज है ही। इनमें से मोटे तौर पर 15 फीसदी के खिलाफ गंभीर किस्म के आरोप हैं। पंचायतों और शहरी निकायों के समुचित आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं लेकिन उपलब्ध तथ्य बताते हैं कि प्रशासन की यह स्थानीय कड़ी भी आपराधीकरण से मुक्त नहीं है। एडीआर ने अपराध और राजनीति पर व्यापक शोध किया है। उसके आंकड़ों के मुताबिक मुम्बई और दिल्ली के नगर निगम में क्रमश: 17 और 21 फीसद सभासद आपराधिक गतिविधियों में लिप्त हैं।

आम चुनावों को लेकर एक आकलन से पता चलता है कि अपराधियों के चुनाव जीतने की सम्भावनाएं ज्यादा हैं। पिछले दो चुनावों के आंकड़े साक्ष्य हैं कि किस तरह बड़ी संख्या में कानून तोड़ने वाले ही कानून निर्माता बन रहे हैं। यह भी देखा गया है कि साफ-सुथरी छवि के उम्मीदवार की जगह संगीन अपराधियों के चुनाव जीतने के अवसर बढ़े हैं। इस प्रकार वे किसी राजनीतिक दल को सत्ता के करीब ले आते हैं तो उन्हें दूसरों की बजाय ज्यादा तवज्जो दी जाती है। बड़ा सवाल यह है कि ऎसे उम्मीदवारों की विजय के पीछे क्या कारण हैं?

धन और ताकत का मेलजोल
बाकी कारकों के अलावा, एक प्रभावी कारण है धन या भारी नगद। अपराधी हथियारों की तस्करी, ड्रग्स का अवैध व्यापार या नारकोटिक्स का धंधा, महिलाओं की सौदेबाजी समेत अन्य दूसरी तरह के अवैध व्यापार से काला धन आसानी से पैदा कर लेते हैं। यह धन और ताकत का मेलजोल ही है, जो उन्हें विजयी बनाता है। एक बार जीत जाने पर ये अपराधी ऎसी प्रतिरक्षा बना लेते हैं कि कानून लागू कराने वाली संस्थाएं इन्हें अवैध धंधों में लिप्त होने के आरोप में पकड़ने से भी हिचकिचाने लगती हैं। राजनीति में अपराध की पकड़ बढ़ती ही जा रही है।

2004 के आम चुनाव में लोकसभा में 24 फीसद आपराधिक पृष्ठभूमि वाले सांसद चुनकर आए थे, यह तादाद 2009 के चुनाव में बढ़कर 30 फीसद हो गई। आपराधिक पृष्ठभूमि के इस बढ़ते चलन ने 90 के दशक में सरकार का ध्यान खींचना शुरू किया। पूर्व गृह सचिव एनएन वोहरा के नेतृत्व में एक समिति का गठन किया गया, जिसने 1993 में इस मसले पर अपनी रिपोर्ट सौंपी। इस समिति ने ध्यान दिलाया कि देश के कई हिस्सों में आपराधिक नेटवर्क अपनी समानांतर सरकार चला रहे थे।

आजादी के 50 बरस पूरे होने के अवसर पर (15 अगस्त 1997) तत्कालीन राष्ट्रपति के आर नारायणन ने संसद के संयुक्त सत्र में कहा था, "विशुद्ध अवसरवादिता और मूल्य रहित सत्ता की राजनीति ने सिद्धांत और आदर्शवाद, जनता के बीच सम्बंध, समूह एवं दल की राजनीति की जगह ले ली है।... भ्रष्टाचार हमारी राजनीति और समाज की अत्यावश्यक चीजों का क्षरण कर रहा है।... ऎसा लगता है कि लोगों को अवश्य ही आगे आकर भ्रष्टाचार, साम्प्रदायिकता, जातिवाद और राजनीति में अपराधीकरण के खिलाफ अपनी भूमिका निभानी होगी।

यहां तक कि चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट ने भी राजनीति के अपराधीकरण की गंभीर समस्या का संज्ञान लिया है, लेकिन आधे-अधूरे मन से किए गए प्रयासोें के चलते अपराधीकरण पर चोट पहुंचाने में विफलता ही हाथ लगी है।

जनता ही बना सकती है दबाव
निर्वाचन आयोग और सुप्रीम कोर्ट के प्रयासों के बावजूद स्थिति में बिगाड़ जारी है। सरकार और राजनीतिक दल भी इस खतरे पर चुप हैं। कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। इस अवधि में सभी दलों की सरकारें रही हैं लेकिन किसी ने भी लोकतंत्र को खा रही इस बीमारी के इलाज के लिए कुछ नहीं किया है। इसी कारण आम जन, खास तौर पर मध्यम वर्ग इस मुद्दे पर मुखर हुआ है और जन आन्दोलन खड़ा हुआ है।

दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की सफलता को भी सामान्य लोगों की राजनीति एवं अपराध के गठजोड़ को तोड़ने की इच्छा के परिणाम के रूप में देखना चाहिए। राजनीतिक दलों और राजनेताओं पर जनदबाव तो बना है लेकिन दुर्भाग्य से पार्टी हितों के फेर में राजनीतिक दल सुधार की तरफ नहीं बढ़ रहे। लोकतंत्र में केवल जनता ही राजनीति दलों पर दबाव बना सकती है। इसलिए आने वाले चुनावों में जनता को उन सभी उम्मीदवारों को हराकर पार्टियों को स्पष्ट संदेश देना चाहिए, जिनकी छवि दागी है।


फिर उतरे दागी
देश के प्रमुख दलों की अब तक घोषित सूचियां बता रही हैं कि वे अब भी पुराने ढर्रे पर ही चल रही हैं। भाजपा की पहली और दूसरी सूची में शामिल 37 फीसदी के खिलाफ मामले दर्ज हैं जबकि कांग्रेस की सूची में 26 फीसदी। इनमें से कई उम्मीदवार तो ऎसे हैं जिनपर बीस-तीस मुकदमे चल रहे हैं। छोटी पार्टियां भी पीछे नहीं हैं। शिवसेना के पहली सूची में शामिल 14 उम्मीदवारों में से 12 दागी हैं वहीं, राकांपा के तेरह उम्मीदवारों में से 08 पर मुकदमे दर्ज हैं। बसपा हो या सपा या फिर जदयू, सभी ने कुछ ऎसे उम्मीदवार उतारे हैं, जिन पर कोई न कोई मामला चल रहा है।

अब तक घोषित उम्मीदवारों की एक बानगी
किरीट सोमैया
मुम्बई उत्तर-पूर्व, भाजपा
मामला : डकैैती का
गोपीनाथ मुंडे
बीड, भाजपा
मामला : अपहरण का
सर्बानंद सोनवाल
लखीमपुर, भाजपा
मामला : हत्या
अब्दुल मन्नान हुसैन
मुर्शिदाबाद, कांग्रेस
मामला : हत्या का प्रयास, अपहरण
रतन सिंह
प्रतापगढ़, कांग्रेस
मामला : हत्या का प्रयास
विनय कुमार पांडे
शरावस्ती, कांग्रेस
मामला : हत्या का प्रयास
अधीर रंजन चौधरी
बहरामपुर, कांग्रेस
मामला : हत्या का
नाना पटोले
भंडारा-गोंदिया, भाजपा
मामला : निर्वाचन उल्लंघन

इन पर कई मामले दर्ज
कामेश्वर
पलमाउ, झामुमो मामले : 46
हंसराज
चन्द्रपुर, भाजपा मामले : 30
नेपाल मेहतो
पुरूलिया, कांग्रेस
मामले : 22

जनता अपराधियों को नकारती क्यों नहीं?
डॉ. वशिष्ठ नारायण सिंह, वरिष्ठ पत्रकार
भारतीय राजनीति में अपराधीकरण की समस्या गहराती जा रही है। सभी दल व नागरिक इस समस्या को गंभीर मानते तो हैं, पर इस पर रोक न लगने से लोकतंत्र को खतरा उत्पन्न हो गया है। अपराधियों की घुसपैठ की वजह से विकास के मुद्दे गौण हो गए हैं। जनता की आकांक्षाएं पूरी नहीं हो पा रही हैं। तात्पर्य यह है कि जनता सरकारों, राजनीतिक दलों द्वारा छली जा रही है। इसका एक बहुत बड़ा कारण राजनीति में अपराधीकरण है।

चाहे राष्ट्रीय दल हों, क्षेत्रीय या अन्य, सभी में अपराधियों का बोलबाला है। न्यायालय की सजगता के बावजूद मौजूदा परिस्थिति में राजनीति में अपराधियों की घुसपैठ पर रोक न लगना यह साबित करता है कि दलों को न समाज प्यारा है और न तो देश। उन्हें बस अपनी कुर्सी ही प्यारी है, जिसके लिए वह कुछ भी कर सकते हैं। योजनाओं का ज्यादा धन सफेदपोश राजनेता कमीशन के नाम पर खा जाते हैं, जिसमें सूचीबद्ध अपराधियों की
संख्या अधिक है।

कैसे जगह बना लेते हैं अपराधी
एक निश्चित मुकाम पर पहुंच जाने के बाद संरक्षण की तमन्ना पाले अपराधी किसी न किसी राजनीतिक दल का पल्लू पकड़ लेते हैं। दलों को कुर्सी के लिए धन और अपराधियों को राजनेता का मुखौटा लगाकर अपना चेहरा छिपाने की जरूरत आ पड़ती है। वह धन और बाहुबल के सहारे लोगों का भयादोहन तो करते ही हैं, साथ में समाजसेवा का ढोंग रचकर भ्रमित करने का भी काम करते हैं। कहने का अर्थ यह है कि दलों की मजबूरी है पैसा और कुर्सी एवं अपराधियों की मजबूरी है अपना संरक्षण।

कैसे लग पाएगी रोक
सभी राजनीतिक दल स्वार्थ में अंधे हो गए हैं। प्राय: यह देखा जाता है कि चुनाव लड़ने के पहले जिस नेता की माली हालत खस्ता रहती है, जीतने के बाद वह मालामाल दिखाई देते हैं। पिछले दिनों में अरबों के घोटाले जो सामने आए हैं, उससे लगता है कि सभी के कुंड में भांग पड़ी हुई है। सभी एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं। ऎसा नहीं कि ऎसे मामलों में कार्रवाई नहीं हुई है।

अगर हुई भी है तो इक्का-दुक्का लोगों के खिलाफ। सभी दलों में ऎसे मगरमच्छ बैठे हैं जिनके मन में यह भावना है कि यदि राजनीति में अपराध पर रोक लगी तो हमारा क्या होगा? इसी के चलते खूंखार से खूंखार अपराधियों का भी राजनीति में प्रवेश बदस्तूर जारी है। अत: दिल से कोई भी दल यह नहीं चाहता कि राजनीति में अपराध रूके। कारण कि वह स्वार्थ के वशीभूत हैं। उनकी राजनीति अपराध की बदौलत है और अपराधी राजनीति की बदौलत जीवित हैं।

...पर मजबूरियां भी कम नहीं
भारत की जनता में अभी उतनी जागरूकता नहीं है कि वह राजनीति में अपराधीकरण का खुलकर विरोध कर सके। उसके सामने कई तरह की मजबूरियां हैं। एक तो यह कि अपराधियों को वोट नहीं देंगे तो वह हमारा भयादोहन करेंगे। ऎसे में कोई साथ नहीं देगा। दूसरी मजबूरी यह है कि जनता वोट की कीमत नहीं समझती। इसके बावजूद किसी न किसी राजनीतिक दल को वोट देना मजबूरी है।

ऎसे में क्यों न ऎसे ही व्यक्ति को चुनें जो हमें सता न सके। इसके अतिरिक्त जाति-धर्म व परिवारवाद की राजनीति भी आडे आ रही है। अपराधियों को समझते हुए भी जनता तमाम तरह की भावनाओं में पड़कर उन्हें वोट देती है। इसका फायदा उसे तो कम, राजनेता को ज्यादा मिलता है।

क्या हैं इसके दुष्परिणाम
राजनेता जनता व सरकार के बीच की धुरी होते हैं। वह जनता की बात सरकार और सरकार की बात जनता तक पहुंचाने का माध्यम हैं। राजनेता व्यक्ति और समाज के शोषण का विरोध करता है और देश के प्रति सोच पैदा करता है। पर राजनीति में अपराधीकरण से उपर्युक्त सारे के सारे रास्ते बंद होते जा रहे हैं। इसी का नतीजा है कि देश के प्रति सोच खत्म होती जा रही है। महंगाई और भ्रष्टाचार बढ़ रहा है। बेरोजगारी का दंश युवाओं का सता रहा है। नैतिकता नाम की कोई चीज नहीं रह गई है। तात्पर्य यह है कि देश पतन के रास्ते पर जा रहा है।
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