"सफाई" के लिए वक्त तय

पब्लिक इंटरेस्ट फाउंडेशन की जनहित याचिका पर निर्णय देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सांसदों और विधायकों

By:

Published: 16 Jan 2015, 12:12 PM IST

हरबंश दीक्षित, विधि विशेषज्ञ
पब्लिक इंटरेस्ट फाउंडेशन की जनहित याचिका पर निर्णय देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सांसदों और विधायकों के खिलाफ चल रहे मामलों का निस्तारण एक वर्ष में अवश्य कर लिया जाए। अदालत ने यह भी कहा कि यदि कोई विवाद एक वर्ष की अवधि के अंदर निस्तारित नहीं हो पाता है तो निचली अदालत के द्वारा उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को उसके कारणों का उल्लेख करते हुए सूचना देनी होगी।

यदि मुख्य न्यायाधीश उस कारण से संतुष्ट हैं तो समय सीमा को आगे बढ़ा सकते हैं। यह निर्णय सुप्रीम कोर्ट द्वारा 09 जुलाई 2013 को दिए गए उस निर्णय की श्ृंखला में है जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 8 (4) को असंवैधानिक घोषित करते हुए आदेश दिया था कि यदि कोई जनप्रतिनिधि निचली अदालत के द्वारा दोषी ठहराया जाता है, तो अगले छह वर्षो के लिए वह स्वत: ही चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य हो जाएगा। उसकी यह नियोग्यता केवल तभी दूर हो सकेगी जब अपील में उसे बरी कर दिया जाए। यह फैसला राजनीतिक सुधार में मददगार साबित होगा।

न्यायिक प्रक्रिया में बढेगा भरोसा
सुप्रीम कोर्ट का सांसदो और विधायकों से सम्बंधित मामलों को समय सीमा के अंतर्गत निपटारे के आदेश का दूरगामी प्रभाव देखने को मिलेगा। कोर्ट के इस निर्णय के बाद एक अच्छी परंपरा की शुरूआत होगी। यदि मुकदमे का समयबद्ध निस्तारण करना सम्भव नहीं हो पाता तो उसके लिए या तो नई अदालतों का गठन करके या प्रक्रियात्मक विधि में संशोधन कर इस समस्या का निराकरण किया जा सकता है।

दूसरी बात, यदि कोई दोषी है तो समय सीमा के तहत दोष सिद्ध होने पर वह अपनी सदस्यता से वंचित हो जाएगा। इससे आम जनता का न्यायिक प्रक्रिया में भरोसा भी बढ़ेगा साथ ही राजनीति को स्वच्छ रखने में मदद मिलेगी। न्यायिक प्रक्रिया का दुरूपयोग रोकने में भी मदद मिलेगी, क्योंकि ऎसी आम धारणा है कि राजनेता अपने अच्छे कानूनी सलाहकारों और पैसे के बल पर मुकदमों को लम्बे समय तक लटकाए रहते हैं। जिसके कारण राजनीतिक व्यवस्थाऔर अदालतों में लोगों का भरोसा कम होता है। इस निर्णय से इस कमी को दूर करने में मदद मिलेगी।

अमली जामा पहनाना चुनौती
मौजूदा निर्णय सुप्रीम कोर्ट के 09 जुलाई 2013 के फैसले से जुड़ी हुई कमियों को कुछ सीमा तक दूर कर सकता है। बशर्ते, इसको अमली जामा पहनाया जा सके। दूसरे कुछ और कानूनों में मुकदमों के निर्णय करने की समय सीमा तय की गई है, लेकिन उसके पालन करने में व्यावहारिक कठिनाईयां आती हैं इसलिए समय सीमा के अंतर्गत मुकदमों का निस्तारण नहीं हो पाता है। उदाहरण के तौर पर, किशोर अधिनियम में मुकदमों के निपटारे की समय सीमा चार महीने तय की गई है, लेकिन लाखों में से कोई एक मुकदमा ही होता होगा, जिसमें निश्चित समय सीमा के अंतर्गत उसका निपटारा हो पाता हो।

इसकी व्यावहारिक वजह है, पहली तो यह कि निचली अदालतें मुकदमों के बोझ से दबी हुई हैं और जबतक इसके लिए विशेष अदालतों का गठन नहीं किया जाएगा, तबतक समय सीमा के अंतर्गत मुकदमों का निस्तारण करना अदालतों के लिए अव्यावहारिक ही होगा। दूसरा बात, आज देश के कानून की क्रियान्वयन में इतनी कमियां हैं कि अदालतें चाहकर भी मुकदमों का निपटारा समय सीमा के अंदर नहीं कर पाती हैं।

स्थायी उपाय नहीं
आज देश की अदालतों में न्यायाधीशों की बड़ी संख्या में कमी है। करोड़ों मुकदमे लम्बित हैं। ऎसी स्थिति में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को क्रियान्वयन करना काफी कठिन होगा। आज विकसित देशों में प्रति दस लाख पर 110 न्यायाधीश हैं, जबकि भारत में यह संख्या 15 के आसपास है। ऎसी स्थिति में मुकदमे की सुनवाई एक साल के अंदर पूरा करना एक चुनौती है। जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह कहा है कि सांसदों और विधायकों से जुडे मामलों की सुनवाई प्रतिदिन के आधार पर की जाए। कोर्ट का यह फैसला स्थायी उपाय नहीं है क्योंकि ऎसी स्थिति में दूसरे मुकदमों की सुनवाई पर असर पडेगा।

इसका दायरा बढ़ाना पड़ेगा

वी. एन. खरे, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश

अपराधी राजनेताओं को सदनों से दूर रखने और राजनीति में आपराधीकरण को खत्म करने की दिशा में यह एक अच्छा फैसला है। ऎसे मामलों में तेजी से निर्णय होने की जरूरत थी। ऎसे ही कई और श््रेणियां भी हैं, जिनमें तेजी से फैसले सुनाने चाहिए। मसलन, भ्रष्टाचार, महिलाओं की लज्जा भंग आदि मामलों पर भी जल्द से जल्द फैसले सुना देने चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने अपराधी राजनेताओं पर सख्ती के लिए लगातार सराहनीय कार्य किया है। अपराधियों को रोकने के लिए इसकी बहुत जरूरत थी। आज देश में 15-20 साल तक फैसले लटके रहते हैं और अपराधी राजनेता कार्यकाल पूरा करते रहते हैं। इसलिए इस फैसले से कड़ा संदेश जाएगा। पार्टियां अपराधियों को टिकट देने से कतराएंगीं।

राजनीति की सफाई के लिए यह अच्छा निर्णय आया है। हालांकि मौजूदा परिस्थितियों में इस फैसले के लागू होने पर सवाल उठाए जा रहे हैं। जजों और जांच अधिकारियों की संख्या में कमी के चलते जल्द फैसले सुनाने में देरी तो होती ही है। सरकार तो जज, अदालतों और जांच अधिकारियों की तादाद बढ़ा नहीं रही है। ऎसे में जिस वर्ग पर जल्द फैसले से देश को फायदा हो सकता है, उसे प्राथमिकता दी जा सकती है। अपराधी राजनेताओं पर जल्द फैसले से देश को ही लाभ होगा।

सिर्फ फास्ट टै्रक करने से काम नहीं चलेगा

नरेश चंद्रा, चेयरमैन, पब्लिक इंटरेस्ट फाउंडेशन
सुप्रीम कोर्ट का फैसला स्वागतयोग्य है। लेकिन इस निर्णय को लागू करने को लेकर सवाल हैं। जब कभी न्याय प्रक्रिया में तेजी की बात होती है, तो हम फास्ट ट्रैक कोर्ट की बात करने लगते हैं। बेशक हमें अदालतें बढ़ानी पड़ेगी, क्योंकि अभी भारत में ट्रायल कोर्ट की संख्या अफ्रीकी देशों के मुकाबले भी कम है। लेकिन बड़ी मुश्किल पुलिस बल के स्तर पर आती है। थानों में जांच अधिकारियों के ज्यादातर पद खाली पड़े हैं। ऎसे में जल्द फैसला आने की उम्मीद करना बेमानी ही होगा। जब तक थानों में जांच अधिकारी, जजों और अदालतों की संख्या नहीं बढ़ेगी, तब तक कुछ भी नहीं होने वाला है।

देरी के लिए दूसरा पक्ष यह भी है कि अदालतों में लम्बे-लम्बे फैसले दिए जाते हैं। अदालतों में लम्बे स्थगन और बहस बहुत लम्बी होती है। इन पर हमारे देश में कोई सख्ती नहीं है। इसलिए अदालतों में सुस्ती रहती है। तेजी के लिए बस कह देते हैं कि सब फास्ट ट्रैक कर देंगे। बलात्कार से लेकर, आतंकी और राजनीति में अपराधी सबके लिए फास्ट ट्रैक कर दिया जाएगा, तो बाकी मामलों का क्या होगा। इससे तो आम आदमी के लिए न्याय प्रक्रिया और भी सुस्त हो जाएगी। इस लिहाज से फास्ट टै्रक अच्छा कदम नहीं है। इससे बाकी लोगों को खमियाजा भुगतना पड़ेगा।

अदालतों की संख्या बढ़ाने की योजना न तो कोई राज्य सरकार पेश करती है, न ही न्यायपालिका। बस बयानबाजी होती रहती है कि देश की अदालतों पर बहुत भार है। इस स्थिति को बदलने की जरूरत है। राज्य सरकारे जजों की भर्ती करें, पुलिस में रिक्त पड़े पदों पर भर्तियां करें। राज्यों में पुलिस कम स्टाफ की वजह से पिछड़ रही है। सभी मुख्यमंत्री कहते हंै कि कानून-व्यवस्था राज्य के हाथ में है, वह सिर्फ "पावर" के लिए ऎसा कहते हैं, लेकिन उसके लिए जिम्मेदारी नहीं पूरी करते हैं। जनता को जितने पुलिसकर्मी चाहिए, उतने नहीं हैं। ज्यादातर थानों में पद रिक्त पड़े हैं। तमाम राज्य सरकारें पहले पुलिस सुधार पर कार्य करें, तब तेज फैसलों की ओर बढ़ा जा सकता है।

(सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इसी संगठन की याचिका पर आया है।)
हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned