scriptHistory repeated again? As BJP's stature increased, allies broke up with it | बीजेपी का 'इतिहास' है, जिस राज्य में बढ़ाया कद उस राज्य में सहयोगी दल ने किया किनारा | Patrika News

बीजेपी का 'इतिहास' है, जिस राज्य में बढ़ाया कद उस राज्य में सहयोगी दल ने किया किनारा

Bihar Politcal Crisis: बिहार की राजनीति में बड़ा सियासी घमासान देखने को मिला। यहाँ एक बार फिर से नीतीश कुमार ने बीजेपी का साथ छोड़ राजद और कांग्रेस के साथ सरकार बना रहे हैं। बीजेपी को दरकिनार कर उसपर पार्टी को कमजोर करने का आरोप लगाया है। ये पहली बार नहीं जब बीजेपी को इस तरह के हालात का सामना करना पड़ा है।

Published: August 09, 2022 10:38:45 pm

बिहार में बीजेपी और और जेडीयू की राहें अलग हो गई हैं। जेडीयू ने राजद और कांग्रेस के साथ गठबंधन सरकार बनाने का निर्णय लिया है।जेडीयू ने अचानक बीजेपी का साथ नहीं छोड़ा है बल्कि वो राज्य में बीजेपी के बढ़ते कद से परेशान थी। अरसीपी सिंह के इस्तीफे के बाद से ही बिहार का सियासी पारा चढ़ गया था और अंततः नीतीश कुमार ने ये निर्णय लिया। इस निर्णय के पीछे भी कई घटनाक्रम शामिल हैं जिसके बारे में आपको विस्तार से बताएंगे। पर गौर करें तो पर गौर करें तो बीजेपी का इतिहास रहा है जब भी किसी राज्य में उसका कद बढ़ता है सहयोगी दल उससे किनारा कर लेते हैं। महाराष्ट्र में भी उसकी दशकों की सहयोगी पार्टी शिवसेना ने बीजेपी का साथ छोड़ दिया था जब पार्टी का राज्य में कद बढ़ा था।
History repeated again? As BJP's stature increased, allies broke up with it
History repeated again? As BJP's stature increased, allies broke up with it

महाराष्ट्र में जब शिवसेना ने छोड़ा था साथ


कुछ ऐसा ही महाराष्ट्र में बीजेपी के साथ हो चुका है जो अब बिहार में हो रहा है। बीजेपी और शिवसेना का गठबंधन 1989 में हुआ था। BJP और शिवसेना के बीच गठबंधन 33 साल पहले 1989 में हुआ था। 33 सालों में बीजेपी का यहाँ कद 152% बढ़ा है जबकि शिवसेना का 24 फीसदी घटी।
पिछले 33 सालों में BJP 42 से 106 सीटों पर पहुंच गई, जबकि शिवसेना अधिकतम 73 सीटों से घटकर 56 सीटों पर आ गई। यानी, महाराष्ट्र में BJP 152% बढ़ गई वहीं, शिवसेना 24% सिमट गई। बीजेपी 1989 से 73 सीटों से घटकर पिछले विधानसभा चुनावों में 56 पर ही सिमट गए।
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बीजेपी का कद बढ़ा तो शिवसेना के निर्णयों में बीजेपी का हस्तक्षेप बढ़ने लगा जो उद्धव को रास नहीं आया। वर्ष 2009 में बीजेपी 20 सालों में पहली बार शिवसेना से आगे निकली थी और समय के साथ उसकी सीटें बढ़ती गईं। इसके बाद वर्ष 2019 के विधानसभा चुनावों के बाद शिवसेना का बीजेपी के साथ टकराव बढ़ा और फिर शिवसेना ने NCP और कांग्रेस के साथ गठबंधन कर लिया। इस तरह से यहाँ बीजेपी का बढ़ता कद उसके सहयोगी दलों को रास नहीं आया।

बिहार में जेडीयू ने किया किनारा


अब बात बिहार की करते हैं। यहाँ बीजेपी ने जब जेडीयू से गठबंधन कर सरकार बनाई थी तब बीजेपी का कद एक छोटी पार्टी का था। उस समय जेडीयू बड़े भाई की भूमिका में थी और कैबिनेट से लेकर बड़े फैसलों में नीतीश कुमार की चलती थी। वर्ष 2005 के बाद वर्ष 2010 के चुनावों में भी NDA को जीत मिली। जेडीयू ने 243 में से 141 सीटों पर चुनाव लड़ा और 115 सीटें जीतीं जबकि बीजेपी ने 102 पर चुनाव लड़ा और 91 सीटें जीती थीं। NDA की सरकार बनी और नीतीश कुमार सीएम बने।

वर्ष 2015 के विधानसभा चुनावों जेडीयू ने अपना पाला बदला और राजद के साथ चली गई। तब बीजेपी को 243 सीटों में से 53 सीटें और जेडीयू को 71 सीटें मिली थीं। हालांकि, 2017 में जेडीयू ने महागठबंधन का साथ छोड़ फिर से बीजेपी के साथ हाथ मिला लिया लेकिन इस बार के गठबंधन में थोड़ी खींचतान अवश्य देखने को मिली।
बीजेपी गठबंधन में रहते हुए अपनी उपस्थिति को बढ़ाने के लिए लगातार प्रयासरत दिखाई दी और धीरे-धीरे इसका असर भी दिखाई देने लगा

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वर्ष 2020 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी की मेहनत रंग लाई और 243 सीटों में से बीजेपी के कहते में 74 सीटें गई जबकि जेडीयू को 28 सीटें कम मिली और वो 43 पर ही सिमट गई। गठबंधन की सरकार बनी और बिहार में फिर एनडीए का शासन हुआ। पर राज्य में बीजेपी की पकड़ मजबूत होने से बीजेपी ने कई बड़े फैसलों में हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया। आरसीपी सिंह को मोदी कैबिनेट में नीतीश की मंजूरी के बिना शामिल करना हो या सुशील मोदी को बिहार की राजनीति से अलग करन हो।

ऐसे कई निर्णय बीजेपी ने आगे बढ़कर लिए और यही जेडीयू को रास नहीं आए। गठबंधन तोड़ने के बाद जेडीयू ने कहा भी कि बीजेपी उनकी पार्टी को कमजोर कर रही थी। हालांकि, राजनीति में जिसका कद बढ़ता है तो पार्टियों का रणनीति बनाने और फैसलों में हस्तक्षेप भी बढ़ता है।

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