scriptMann Ki Baat: The story of Kalpana, who got 92 marks in Kannada | Mann Ki Baat : पीएम मोदी ने जितना बताया, उससे भी प्रेरक है 3 माह में कन्नड़ सीख 92% अंक लाने वाली कल्पना की कहानी | Patrika News

Mann Ki Baat : पीएम मोदी ने जितना बताया, उससे भी प्रेरक है 3 माह में कन्नड़ सीख 92% अंक लाने वाली कल्पना की कहानी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा उत्तराखंड की कल्पना के बारे में उल्लेख किए जाने के बाद कल्पना सुर्खियों में बनी हुई हैं। बता दें उत्तराखंड के जोशी मठ से आने वाली कल्पना ने हाल में अपनी कन्नड में 10वीं की परीक्षा पास की है। लेकिन इस क्रम में किए गए कल्पना के प्रयासों और उनके हालात ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को "मन की बात" में उनका उल्लेख करने के लिए मजबूर कर दिया। दरअसल पीएम मोदी ने कल्पना की जितनी तारीफ की है वो कम है, कल्पना का संघर्ष और उसकी सफलता कहीं अधिक है।

जयपुर

Published: May 29, 2022 05:53:19 pm

प्रधानमंत्री ने अपनी मन की बात के संबोधन में कहा कि, मित्रो, हमारा देश अनेक भाषाओं, लिपियों और बोलियों का खजाना है। विभिन्न क्षेत्रों में विविध पोशाक, व्यंजन और संस्कृति हमारी पहचान है। एक राष्ट्र के रूप में यह विविधता हमें मजबूत करती है और हमें एकजुट रखती है। मैं आप सभी के साथ इससे जुड़ा एक बहुत ही प्रेरक उदाहरण साझा करना चाहता हूं, जो कि बेटी कल्पना का है।
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प्रो तारामू्र्ति और कल्पना। फोटो - Star of Mysore
'एक भारत श्रेष्ठ भारत' का सच है कल्पना

पीएम मोदी ने 'मन की बात' के 89वें एपिसोड में कहा कि उस बेटी का नाम कल्पना है, लेकिन उसका प्रयास 'एक भारत श्रेष्ठ भारत' की सच्ची भावना से भरा है। दरअसल, कल्पना ने हाल ही में कर्नाटक में 10वीं की परीक्षा पास की है, लेकिन उनकी सफलता की सबसे खास बात यह है कि कल्पना कुछ समय पहले तक कन्नड़ भाषा नहीं जानती थीं, प्रधानमंत्री ने कहा कि उन्होंने न केवल कन्नड़ भाषा सीखी है, बल्कि तीन महीने में सीखी है और परीक्षा में 92 अंक हासिल करके इसे साबित भी किया है।
टीबी के बाद तीन में पढ़ने के दौरान नहीं रही आंखों की रोशनी

पीएम मोदी ने कहा कि "यह जानकर आपको हैरानी हो सकती है, लेकिन यह सच है। उनके बारे में और भी कई बातें हैं जो आपको हैरान कर देंगी और आपको प्रेरित भी करेंगी। पीएम मोदी ने बताया कि कल्पना मूल रूप से उत्तराखंड के जोशीमठ की रहने वाली हैं। वह पहले टीबी से पीड़ित थी और जब वह तीसरी कक्षा में थी तो उसकी आंखों की रोशनी भी चली गई थी, लेकिन, जैसा कि कहा जाता है, 'जहाँ चाह है, वहाँ राह है'। पीएम मोदी ने कहा कि कल्पना बाद में मैसूर निवासी प्रोफेसर तारामूर्ति के संपर्क में आईं, जिन्होंने न केवल उन्हें प्रोत्साहित किया बल्कि उनकी हर तरह से मदद भी की। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि, 'आज अपनी कड़ी मेहनत से उन्होंने हम सभी के लिए एक मिसाल कायम की है। मैं कल्पना को उनके धैर्य के लिए बधाई देता हूं।
संघर्षों से भरी है कल्पना की कहानी

तो चलिए आपको बताते हैं उस कल्पना, उनकी शिक्षक प्रो. तारामूर्ति और कल्पना के परिवार की पूरी कहानी। यह भी कि क्यों उसे जोशी मठ से निकलकर पढ़ने के लिए मैसूर आना पड़ा।
पिता ने भी कर ली दूसरी शादी, दादा बने अभिभावक

रवींद्र सिंह और आशा की बेटी कल्पना ने अपनी माँ को तब खो दिया जब वह तीन साल की थी और उसके पिता ने बाद में दूसरी महिला से शादी कर ली। उनके पिता और सौतेली मां द्वारा उपेक्षित किए जाने के बाद उनके दादा रामसिंह नेगी कल्पना के अभिभावक बने। लेकिन उसकी परेशानी को और बढ़ाते हुए नेगी को पता चला कि कल्पना की टीबी की बीमारी हो चुकी है।
टीबी ग्रस्त कल्पना ने गंवा दी आँखें

कल्पना की मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुई, उपेक्षित होने और टीबी रोग के संयुक्त तनाव के कारण उनकी आंखों की रोशनी भी चली गई। तब तक वह तीसरी कक्षा में पढ़ रही थी और उसकी शिक्षा यहीं अचानक समाप्त हो गई।
इस सबसे से दुखी होकर, उसके दादा, जो कल्पना को अच्छी शिक्षा देना चाहते थे, उन्होंने मैसूर की प्रो. तारामूर्ति से संपर्क किया, जो कई वर्षों से शिक्षक की भूमिका निभाती आ रही थीं। बता दें वर्तमान में प्रो. तारामूर्ति, ईशा फाउंडेशन की एक स्वयंसेवक के रूप में लोगों की विविधतापूर्ण जीवन शैली को समझने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों का दौरा करती रहती हैं।
बात तब की है जब वे चार साल पहले ऐसे ही एक दौरे पर उत्तराखंड गई थीं और 2 साल तक कल्पना के किराए के घर में रहीं। अपने प्रवास के दौरान, कल्पना के दादा ने उनसे मदद मांगी और उनसे यह देखने का अनुरोध किया कि उनकी पोती को देश के किसी भी हिस्से में शिक्षा मिल सके।
इलाज और शिक्षा के लिए प्रो. तारामूर्ति ले आईं कल्पना को बैंगलुरू

कल्पना की मदद करने के लिए प्रो. तारामूर्ति कल्पना को एक निजी अस्पताल में अपनी आंखों की जांच कराने के लिए बैंगलुरू ले आईं। जांच करने पर, डॉक्टरों को लगा कि उसकी आंखों की रोशनी बहाल करना संभव नहीं है, जिसके बाद तारामूर्ति ने कल्पना को मैसूर में रखा और उसे शहर के रंगा राव मेमोरियल स्कूल फॉर डिफरेंटली एबल्ड में भर्ती करा दिया।
सबको हैरान करते हुए, कल्पना ने स्कूल के शिक्षकों और साथी छात्रों के सहयोग से मात्र तीन महीनों में कन्नड़ सीख ली और धाराप्रवाह बोलना शुरू कर दिया।
कन्नड़ में कल्पना को मिले 92 प्रतिशत अंक

यह सुनिश्चित करने के लिए कि COVID महामारी के दौरान उसकी शिक्षा प्रभावित न हो, प्रो. तारामूर्ति ने कल्पना को घर में ही सभी विषय पढ़ाए और कल्पना को सीधे SSLC (सेकंडर स्कूल लीविंग सर्टिफिकेट) परीक्षा दिलाने के इरादे से, प्रो. तारामूर्ति ने उसे वर्ष 2022 की SSLC परीक्षा के लिए पूरी तरह से तैयार किया। कल्पना की इच्छा शक्ति, कड़ी मेहनत, समर्पण और दृढ़ता के साथ प्रो. तारामूर्ति के मार्गदर्शन और सहयोग से बहुत अच्छे परिणाम सामने आए हैं। कल्पना ने कन्नड़ में ही 92 अंक हासिल किए हैं।
मैसूर बन चुका है शिक्षा का हब

स्थानीय मीडिया से कल्पना की बात करते हुए प्रो. तारामूर्ति कहती हैं कि , मैसूर शिक्षा का केंद्र बन गया है और जो लोग यहां शिक्षा की तलाश में आते हैं, वे इससे वंचित नहीं रहे हैं और वास्तव में इस दिशा में अच्छा काम हुआ है। इसी तरह, उत्तराखंड के एक गाँव की रहने वाली कल्पना ने कन्नड़ सीखी है और कन्नड़ में अपनी परीक्षाएँ लिखी हैं।
प्रो तारामूर्ति ने मुझे आधी रात तक पढ़ाया...

वहीं, स्थानीय मीडिया के अनुसार, कल्पना ने अपनी सफलता पर कहा कि, प्रो. तारामूर्ति ने मेरी सफलता के लिए बहुत मेहनत की है और मुझे आधी रात तक सबक सिखाया है। उनके मार्गदर्शन के कारण ही मैंने आज अच्छे अंक प्राप्त किए हैं। मैं मैसूर में अपनी शिक्षा जारी रखना चाहता हूं और आईएएस की पढ़ाई करना चाहता हूं।

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