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वन नेशन, वन इलेक्शन: विपक्षी दल विरोध में, क्षेत्रीय दल भी चिंतित, क्या चाहती है जनता, यहां मिलेगा हर सवाल का जवाब

locationनई दिल्लीPublished: Feb 01, 2024 02:09:53 pm

भारत एक विशाल भूभाग वाला देश है। यहां कभी राज्यों के तो कभी केंद्र में सरकार के गठन के लिए चुनाव होते ही रहते हैं। इन चुनावों के चलते देश के खजाने पर भारी बोझ पड़ता है। ऐसे हालात में वन नेशन, वन इलेक्शन के सिद्धांत को लेकर विपक्ष और क्षेत्रीय दल अपना विरोध दर्ज कराते रहते हैं। हालांकि इसके उलट आम जनता को वन नेशन, वन इलेक्शन को राहत की बात लग रही है। पढ़िए अनिल कैले/जग्गोसिंह धाकड़ का विशेष आलेख...

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किसी भी जीवंत लोकतंत्र में चुनाव एक अनिवार्य प्रक्रिया है। स्वस्थ एवं निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र की आधारशिला होते हैं। भारत जैसे विशाल देश में निष्पक्ष चुनाव कराना कम चुनौती नहीं। देश में होने वाले चुनावों पर नजर डालें तो पाते हैं कि हर छह माह में किसी न किसी राज्य में चुनाव होते रहते हैं। एक तरह से देश हमेशा चुनावी मोड में ही रहता है। चुनावी माहौल के बीच न केवल प्रशासनिक और नीतिगत निर्णय प्रभावित होते हैं, बल्कि देश के खजाने पर भारी बोझ भी पड़ता है। इसे देखते हुए ही नीति निर्माता लोकसभा तथा राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने की प्रक्रिया तय करने की कवायद में जुटे हैं।

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वन नेशन, वन इलेक्शन पर है देश की नजर

संसद ने कई विधेयक पारित करके देश के कानूनों में बदलाव किया है। बहुप्रतीक्षित महिला आरक्षण विधेयक भी पारित हो गया है। अब देश की नजर वन नेशन, वन इलेक्शन के प्लान पर है। उम्मीद की जा रही है कि 2029 से देश में यह व्यवस्था लागू हो सकती है। अभी इस विषय पर उच्च स्तरीय समिति (एचएलसी) पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में कार्य कर रही है जिसकी अब तक चार बैठकें हो चुकी हैं। आजादी के बाद कई लोकसभा और विधानसभा के आम चुनाव एक साथ हुए। वर्ष 1967 तक ऐसा हुआ। इसके बाद कुछ राज्य विधानसभाओं के समय से पहले भंग होने के कारण एक साथ चुनाव की व्यवस्था बाधित हो गई। अभी तक जनता से लिए गए सुझावों में ज्यादातर ने इस व्यवस्था का समर्थन किया है, लेकिन विपक्षी राजनीतिक दल इसके समर्थन में नहीं हैं। अभी विशेषज्ञों से भी इस विषय पर समिति की ओर से फीडबैक लिया जा रहा है। इसमें कई बाधाएं भी हैं लेकिन यह विचार आगे बढ़ता दिख रहा है। विधि विशेषज्ञों के अनुसार कुछ संविधान संशोधनों के बाद इसे लागू किया जा सकता है।

पक्ष की ये मजबूत दलीलें

-चुनाव खर्च में आएगी कमी।

-प्रशासनिक बंदोबस्त में समय की बचत।

-आचार संहिता के चलते लोक कल्याण परियोजनाओं में अवरोध नहीं होगा।

एक साथ चुनाव कराने में ये हैं चुनौतियां-

-यदि लोकसभा समय से पहले भंग हो गई तो मध्यावधि चुनाव कराने होंगे, तब क्या होगा?

-राज्य चुनावों में भी मतदाता राष्ट्रीय मुद्दों पर मतदान करते हैं तो बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों को ही फायदा होगा।

-क्षेत्रीय पार्टियों के हाशिए पर जाने की आशंका।

-बड़े पैमाने पर चुनाव चुनौतीपूर्ण।

-ज्यादा सरकारी मशीनरी की जरूरत होगी।

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इन देशों में होते हैं एक साथ चुनाव

विश्व के कई देशों में सभी चुनाव एक साथ होते हैं। जैसे बेल्जियम, स्वीडन और साउथ अफ्रीका में सभी चुनाव एक साथ होते हैं। दक्षिण अफ्रीका की राष्ट्रीय संसद और प्रांतीय विधानसभाओं के चुनाव हर पांच साल में एक साथ कराए जाते हैं। अफ्रीकी देश में नौ प्रांत हैं। राष्ट्रीय संसद में 400 सांसद हैं लेकिन नौ प्रांतीय विधानसभाओं की संरचना अलग-अलग है, जो प्रांत की जनसंख्या के आधार पर 30 से 90 सीटों तक होती है।

पूरे देश में ऐसे कराए जाते हैं मतदान

राष्ट्रीय और प्रांतीय विधानसभाओं के लिए मतदान करने के लिए मतदाताओं को अलग-अलग मतदान पत्र दिए जाते हैं। इन चुनावों का निष्पादन स्वतंत्र चुनाव आयोग (IEC) करता है। आईईसी की भूमिका भारत के चुनाव आयोग के समान ही है। दक्षिण अफ्रीकी सरकार की वेबसाइट के अनुसार, राष्ट्रीय असेंबली के लिए पार्टियां अपने आधे उम्मीदवार राष्ट्रीय सूची में और आधे प्रांतीय सूची में प्रस्तुत कर सकती हैं। चुनाव परिणाम जब घोषित होते हैं तो आइइसी यह तय करता है कि प्रत्येक पार्टी की सूची से कितने लोगों को विधायिका में सीटें लेनी चाहिए।

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एक साथ चुनाव कराने के लिए कराने पड़ेंगे इतने संशोधन

बार काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा ने उच्च स्तरीय कमेटी को अपने सुझाव में इसके लिए संविधान संशोधन की जरूरत बताई है। उनका कहना है कि इसके लिए लोकसभा के कार्यकाल के समकक्ष विधानसभा का कार्यकाल तय करना होगा। इसके लिए अनुच्छेद -83, 85, 172,174 और 356 में बदलाव करना होगा। चुनाव आयोग के अधिकार व्यापक करने के साथ ही जनप्रतिनिधित्व कानून में भी जरूरी बदलाव करने होंगे। एक साथ मतदान कार्यक्रम ही नहीं बल्कि प्रचार अभियान व चुनाव खर्च की सीमा को भी नए सिरे से तय करना होगा। इसके अलावा राजनीति फंडिंग से संबंधित कानून में बदलाव के साथ लोगों में जागरूकता लानी होगी

क्यों विरोध में है कांग्रेस पार्टी?

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने उच्च स्तरीय समिति को पत्र लिखकर कहा था कि कांग्रेस इस विचार का विरोध करती है। समिति के सचिव को भेजे सुझाव में खरगे का यह भी कहना था कि एक साथ चुनाव कराने का विचार संविधान की मूल संरचना के विरुद्ध है। यदि एक साथ चुनाव की व्यवस्था लागू करनी है तो संविधान की मूल संरचना में पर्याप्त बदलाव की आवश्यकता होगी।

आप भी कर रही है विरोध

आम आदमी पार्टी (आप) ने भी कहा कि देश में एक साथ चुनाव कराने से संसदीय लोकतंत्र के विचार और संविधान के बुनियादी ढांचे को नुकसान होगा। आप ने कहा कि यह व्यवस्था त्रिशंकु विधायिका से निपटने में सक्षम नहीं होगी।

न्यायविदों-विशेषज्ञों से भी परामर्श

कमेटी के अध्यक्ष और पूर्व राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश यूयू ललित, मद्रास उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश संजीब बनर्जी और बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष के साथ भी परामर्श किया है। प्रख्यात न्यायविदों, चुनाव आयोग, राजनीतिक दलों, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों और औद्योगिक निकायों के प्रतिनिधियों से भी राय ली गई है।

विपक्ष का कोई प्रतिनिधि नहीं

इस समिति में विपक्ष का कोई प्रतिनिधि नहीं है। कांग्रेस नेता और सांसद अधीर रंजन चौधरी को समिति में लिया गया था लेकिन उन्होंने इसकी कार्यवाही में भाग लेने से इनकार कर दिया था।

क्षेत्रीय दलों को यह है दिक्कत

विरोधी दलों का आरोप है कि भाजपा पैसे बचाने के लिए एक साथ चुनाव नहीं चाहती। वह इसे इस उम्मीद में चाहती है कि उसके पक्ष में राष्ट्रीय भावना राज्यों पर भी हावी हो सकती है क्योंकि उसके सामने एकमात्र वास्तविक चुनौती क्षेत्रीय दलों से है। यह व्यवस्था चुनाव कराने के तरीके को ही बदल देगी। इससे क्षेत्रीय दलों को दिक्कत होगी।

क्या है एक राष्ट्र, एक चुनाव की अवधारणा

भारत में फिलहाल राज्यों के विधानसभा और देश के लोकसभा चुनाव अलग-अलग समय पर होते हैं। वन नेशन, वन इलेक्शन का मतलब है कि पूरे देश में एक साथ ही लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव हों। इसके साथ राज्यों की अन्य निकायों के चुनाव भी कराए जा सकते हैं। ऐसी व्यवस्था में मतदाता लोकसभा और राज्य के विधानसभाओं के सदस्यों को चुनने के लिए एक ही दिन, एक ही समय पर या चरणबद्ध तरीके से वोट डाल सकेंगे।

भारत में पहले एक साथ होते थे चुनाव

एक साथ चुनाव की अवधारणा देश में वर्ष 1967 तक प्रचलित भी रही। दल बदल, सरकारों की बर्खास्तगी और सरकार के विघटन जैसे विभिन्न कारणों से यह व्यवस्था बाधित हो गई। वर्ष 1971 में भी समय से पहले लोकसभा चुनाव कराए गए। राज्यों के पुनर्गठन से भी यह व्यवस्था प्रभावित हुई।

अभी इन राज्यों में एक साथ चुनाव

देश के चार राज्यों-आंध्रप्रदेश, ओडिशा, अरुणाचल प्रदेश और सिक्कम में विधानसभा और लोकसभा चुनाव एक साथ होते हैं।

देश में चुनावी रेल के बीच एक साथ चुनाव कराने की कवायद

नवम्बर 2022- गुजरात व हिमाचल विधानसभा

अप्रैल 2023- कर्नाटक विधानसभा

नवम्बर 2023- राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, मिजोरम, तेलंगाना

अप्रैल-मई 2024- लोकसभा व 4 राज्यों के विधानसभा चुनाव

अक्टूबर 2024- महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखण्ड

फरवरी 2025- दिल्ली

फैक्ट फाइल

-21000 सुझाव अबतक मिले, 81 प्रतिशत लोगों ने देश में एक साथ चुनाव कराने में सहमति जताई।
-46 राजनैतिक दलों से मांगे गए है सुझाव
-4 बैठकें हो चुकी हैं

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