देशभर में आलोचना: अखबारों के विज्ञापन रोकना संविधान प्रदत अधिकारों का हनन

राजस्थान पत्रिका के विज्ञापनों को रोकने का मामला लोकसभा में उठने के बाद देशभर में इसको लेकर नाराजगी जाहिर की गई है। कई बड़ी हस्तियों ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण और निष्पक्ष मीडिया पर हमला बताया।

केन्द्र एवं राज्य की भाजपा सरकार की ओर से राजस्थान पत्रिका के विज्ञापनों को रोकने का मामला लोकसभा में उठने के बाद देशभर में इसको लेकर नाराजगी जाहिर की गई है। कई बड़ी हस्तियों ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण और निष्पक्ष मीडिया पर हमला बताया। कांग्रेस और भाजपा सहित अन्य दलों के नेताओं ने इसे संविधान प्रदत अधिकारों का हनन बताया है।



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केन्द्र एवं राज्यों की भाजपा सरकारों की ओर से अग्रणी समाचार-पत्र समूह 'राजस्थान पत्रिका' के विज्ञापन बंद किया जाना दुर्भाग्यपूर्ण एवं स्वतंत्र व निष्पक्ष मीडिया पर हमला है। सरकार विज्ञापन तुरन्त शुरु करे। भाजपा सरकारों का यह कदम अकेले पत्रिका समूह का ही दमन नहीं बल्कि समूचे भारतीय मीडिया जगत पर हमला है। इसकी जितनी निन्दा की जाए, कम है। मैं हमेशा कहता रहा हूं कि भाजपा अधिनायकवादी पार्टी है और उसे उसकी हां में हां मिलाने वाले चाहिए, चाहे मीडिया हो या अन्य लोग। यदि लोकतंत्र और मीडिया की आजादी में भरोसा रखने वाले लोगों ने मजबूत आवाज बुलन्द नहीं की तो आज यह पत्रिका समूह के साथ हुआ है, कल देश भर के मीडिया के साथ होगा। कांग्रेस के शासनकाल में किसी भी समाचार पत्र समूह ने सरकार की किसी भी प्रकार की आलोचना की हो, फिर भी नीति के अनुसार सभी समाचार-पत्रों को विज्ञापन जारी होते रहे। राजस्थान की भाजपा सरकार तो मीडिया और पत्रकारों के दमन में जैसे देश में सबसे आगे है। जब राज्य में कांग्रेस की सरकार थी, उस समय निष्पक्ष और निर्भिक पत्रकारिता को प्रोत्साहन देने और पत्रकारों में सामाजिक सुरक्षा का भाव बनाने की दृष्टि से उनके लिए मासिक पेन्शन योजना लागू की। उनके लिए राज्य भर में आवासीय योजना बनाकर प्लाट आवंटित किए और लोकतंत्र के आधार साप्ताहिक एवं छोटे समाचार-पत्रों को सम्बल देने के लिए स्पष्ट विज्ञापन नीति बनाई। यह अफसोसजनक है कि राज्य सरकार ने अपना स्तुतिगान करने वाला मीडिया तैयार करने के लिए इन सभी योजनाओं को बंद कर दिया। इन सभी योजनाओं को फिर से शुरू किया जाए।

- अशोक गहलोत, पूर्व मुख्यमंत्री



राजस्थान पत्रिका के सरकारी विज्ञापनों पर रोक का मुद्दा, संसद में भूरिया ने बुलंद की आवाज़



भारतीय लोकतंत्र में सत्ता और संतुलन के लिए और जन प्रशिक्षण के लिए संविधान निर्माताओं ने लिखने, बोलने, न्याय प्राप्त करने और अपना जनप्रतिनिधि चुनने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। आपातकाल के समय पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी ने सेंसरशिप लागू की। यहां तक की एक्सप्रेस टावर को गिरा दिया। किसी भी समाचार पत्र को इस आधार पर विज्ञापन बंद करना कि वो सही और सरकार के खिलाफ लिखता है। यह संविधान प्रदत अधिकारों का हनन है।

घनश्याम तिवाड़ी, पूर्व मंत्री/ वरिष्ठ नेता भाजपा



सरकार को विज्ञापन नहीं बंद करना चाहिए। विज्ञापन सरकार का वह माध्यम है, जिसके जरिए वह अपनी योजनाओं व कार्यक्रमों को जनता तक आसानी से पहुंचाती है। विज्ञापनों पर रोक को मैं व्यक्तिगत तौर पर अनुचित मानता हूं। पत्रिका को विज्ञापन बंद करने का कोई कारण नजर नहीं आता। इस समय लोकसभा चल रही है और सत्र के दौरान इस मुद्दे को रखूंगा।

- मनोहर ऊंटवाल  ( भाजपा सांसद, देवास-शाजापुर)



मुझे मामले की ज्यादा जानकारी नहीं है। ऐसा हुआ है तो मैं जरूर इसको लेकर आवाज उठाऊंगी। मीडिया पर सरकारी अंकुश नहीं होना चाहिए।

-सावित्री ठाकुर, भाजपा सांसद धार-महू



केंद्र सरकार देश में आंतक से राज करना चाहती है। वह पत्रिका समूह की निर्भीक पत्रकारिता से नाराज होकर सरकारी विज्ञापन बंद कर रही है। केंद्र और राज्य की भाजपा सरकारों को यह आतंकी व्यवहार बंद करना चाहिए। निर्भीक पत्रकारिता को दबाना लोकतंत्र की हत्या के समान है। पत्रिका ने निर्भीक पत्रकारिता की है, जो केंद्र और राजस्थान व छत्तीसगढ़ की सरकारों को अच्छा नहीं लगा। इसीलिए केंद्र और राजस्थान व पूर्व में छत्तीसगढ़ सरकार ने विज्ञापन बंद करने जैसे गलत कदम उठाए। लोकतंत्र में प्रेस को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी गई है। इसे दबाना गलत है। दबाव की एेसी गंदी राजनीति को बंद होना चाहिए। मैं इसकी घोर निंदा करता हूं।

-दिग्विजय सिंह, राज्यसभा सासंद व पूर्व मुख्यमंत्री मप्र



मीडिया के विज्ञापनों पर रोक लगाना लोकतंत्र विरोधी है। मीडिया को अपने तरीके से उपयोग करने की कोशिशें की जा रही हैं। केंद्र सरकार का पत्रिका को विज्ञापन न देने का निर्णय आश्चर्यजनक है। यह गैरकानूनी है और समाचार पत्र की स्वतंत्रता पर आघात है। ऐसा पहली बार ही हो रहा है। मैंने मंगलवार को लोकसभा में इस मुद्दे को उठाया था। भविष्य में भी मीडिया पर अंकुश लगाने के सरकार के हर कदम का मैं विरोध करूंगा और इस मामले को और आगे ले जाऊंगा।

-कांतिलाल भूरिया, सांसद (रतलाम-झाबुआ)



भाजपा सरकार के अच्छे दिन यही तो हैं। भ्रष्टाचार खत्म हो चुका है। कालाधन बचा नहीं, महंगाई काबू में आ गई है और सब खुश है। हरकोई स्वतंत्रता से लिख-बोल रहा है। लोकतंत्र की हत्या होना ही तो अच्छे दिन है। इन्हीं अच्छे दिनों के

लिए लंबे-चौड़े वादे किएगए  थे। यह अच्छे दिन तो अभी और आएंगे, जब जनता दिन-रात आंसू बहाएगी।

-सत्यव्रत चतुर्वेदी, राज्यसभा सांसद, कांग्रेस



-यह पूरी तरह से अनुचित और अलोकतांत्रिक है। प्रेस की स्वतंत्रता को प्रभावित किया जा रहा है। आपातकाल के समय से ही भाजपा और उससे जुड़े नेता अपने आप को लोकतांत्रिक कहते आए हैं। भाजपा यदि अपने आप को लोकतांत्रिक मानती है तो ऐसा नहीं करना चाहिए।

-किरोड़ी लाल मीणा, पूर्व मंत्री, राजपा नेता



राजस्थान पत्रिका को लेकर केंद्र के रुख की जो जानकारी मिली है वह चिंताजनक है। पत्रिका जैसे बड़े अखबार के विज्ञापन बंद कर देना लोकशाही में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रहार है। राजनीति में इस तरह का दबाव डालना ठीक नहीं है। मीडिया लोकतंत्र का चौथा मजबूत स्तंभ है। उसे और मजबूत किया जाना चाहिए। हमारे ग्रंथों में भी लिखा है कि यदि सारे चाटुकार हो जाएंगे जो अच्छे और बुरे का पता नहीं चलेगा। इसलिए आलोचना करने वालों को करीब रखना चाहिए जिससेअच्छे और बुरे का पता चल सके।

-अमर सिंह, राज्यसभा सांसद, समाजवादी पार्टी



अखबारों की आजादी पर दबाव डालना गलत है। हमारी हमेशा से आपत्ति रही है कि कोई भी केंद्र सरकार या राज्य सरकार विज्ञापन को हथियार बना कर इस्तेमाल न करे और ना ही दबाव बनाए। यह पूरी तरह से जनतांत्रिक भावनाओं के खिलाफ है। हम इसका पूरी तरह से विरोध करते हैं। नियम बनाए गए हैं, जिस अखबार का जितना सर्कुलेशन होता है उस आधार पर उसे विज्ञापन दिया जाता है। अगर कोई सरकार इसमें हस्तक्षेप करती है तो हम उसका विरोध करेंगे।

-सीताराम येचुरी, माकपा के वरिष्ठ नेता और सांसद



केंद्र सरकार और भाजपा मीडिया की आवाज को दबाने का जो षडय़ंत्र रच रहे हैं, उसे हम कतई सफल नहीं होने देंगे। राजस्थान पत्रिका समूह के साथ केंद्र का यह रवैया दर्शाता है कि इस सरकार को लोकतंत्र पर भरोसा नहीं है। बिना कारण बताए किसी भी मीडिया समूह के विज्ञापन बंद करना तानाशाही को उजागर करता है। विज्ञापन के कायदे-कानून बने हैं और कोई भी सरकार इनसे ऊपर नहीं है।

-रणदीप सुरजेवाला मीडिया विभाग प्रभारी, कांग्रेस


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