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शरीर ही ब्रह्माण्ड : ‘पानी है उत्पत्ति का आधार’

Gulab Kothari Article Sharir Hi Brahmand: ‘शरीर ही ब्रह्माण्ड’ शृंखला में पढ़ें पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी का यह विशेष लेख – पानी है उत्पत्ति का आधार

नई दिल्लीJul 12, 2024 / 08:55 pm

Gulab Kothari

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प्राण व्यापार इच्छा के बिना नहीं होता। सही अर्थों में इच्छा के बाहर जीवन है ही नहीं। ब्रह्म की इच्छा ही विश्व है। हमारी इच्छा हमारा विश्व है। ब्रह्म स्वयं दो भागों में जीता है। विद्यारूप स्थिति तत्त्व ब्रह्म है। उसी का गतिभाग कर्मरूप-अविद्या है। इसी को अव्यक्त कहते हैं। ब्रह्म के रस और बल ये ही दो विभाग हैं। प्रकृत में बल भी जब रस में समा जाता है तो केवल ब्रह्म रहता है। प्रलयकाल में यह विश्व नहीं होता। विश्व की ‘माता’ भी नहीं होती। विश्व को पैदा करने के लिए—’एकोऽहं बहुस्याम्’ के लिए ब्रह्म पहले स्त्री रूप मां को पैदा करता है। मां विश्व को पैदा करती है। चूंकि एक जीवात्मा को ब्रह्म से चलकर पार्थिव-पंचभूत रूप—शरीर धारण करने में पांच बार जन्म लेना पड़ता है, अत: माताएं भी पांच प्रकार की होती हैं। सृष्टि की प्रत्येक स्थूल देहधारी मादा पांचवीं माता होती है। हर स्तर पर ब्रह्म पहले माता को पैदा करता है, उसी में प्रविष्ट होकर सृष्टि में अपने को आगे बढ़ाता है—तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्।
सारा विश्व उसी इच्छा का परिणाम है। इच्छा ही स्त्री बनी। ब्रह्म की कामना नहीं बदली। माता रूप स्त्री (स्त्रैण तत्त्व) बदलता गया। सूक्ष्मतम सृष्टि से सूक्ष्म और स्थूल स्तर तक, 84 लाख मां के रूप बने – सातों लोकों में। नर-नारी उनमें से एक हैं। हर योनि में नई मां नया शरीर देती है। ब्रह्म केन्द्र में रहता है। स्थूल, सूक्ष्म तथा कारण रूप तीन शरीर हैं तथा तीन ही माता-पिता प्रत्येक शरीर के हैं। अद्भुत खेल है प्रकृति का भी।
ऋक्-यजु: व साम तीनों अग्निवेद हैं। इनमें ऋक् व साम क्रमश: केन्द्र व परिधि हैं, मन एवं वाक् हैं। इनके मध्य में गतिशील भाग यजु: है। यत् एवं जू रूप दो भागों से यजु: ब्रह्म एवं कर्म हैं। यत् को वायु और जू: आकाश भी कहा जाता है। वायु गति एवं आकाश स्थिति तत्त्व है। स्थिति प्रतिष्ठा है, ब्रह्म है। यह सृष्टि में हर पिण्ड में विद्यमान है। गति कर्म है। अग्नि ऊपर उठता है तथा सोम सदा नीचे प्रवाहित होता है-इस सिद्धान्त के आधार पर संसार का प्रत्येक तत्त्व गतिशील है। क्योंकि सृष्टि अग्नि और सोम के मेल से होती है। सोम को अप् कहते हैं। इस प्रकार अप् भी कर्म है। किसी भी निर्माण में योजक तत्त्व/प्रेरक तत्त्व आवश्यक होता है। उसको मातरिश्वा वायु कहा जाता है। यही अग्नि में सोम की आहुति का प्रेरक है। इसी के कारण अव्यक्त ऋत ब्रह्म स्वयंभू की अग्नि में आहूत होता है। अत: विश्व सृष्टि की प्रथम माता स्वयंभू बनता है। इस प्रजनन यज्ञ में अव्यय पुरुष सृष्टि का प्रथम व्यक्त भाव बनता है।
पुन: स्वयंभू के आग्नेय प्राणों के तपन रूप कर्म से स्वेद (पसीना) बना। उसी स्वेद से आप: लोक— परमेष्ठी का निर्माण हुआ। अप् एव ससर्जादौ… पानी ही सबसे पहले उत्पन्न हुआ है। यह पानी स्वयंभू का स्वेद ही है जो स्थूल सृष्टि का आरंभक बनता है। यही ब्रह्म की कामना पूर्ति हेतु स्त्री रूप अप् तत्त्व है। योषा है। रयि है। सृष्टि के लिए वृषा (ब्रह्म) को योषा (स्त्रैण) की आवश्यकता होती है। अत: मूल प्राण प्रजापति स्वयंभू ही आप में प्रविष्ट होकर प्राण रूप में यजु: ब्रह्म तथा आप: रूप में सुब्रह्म कहलाते हैं। सुब्रह्म ही परमेष्ठी में भृगु व अंगिरा रूप में अग्नि-सोमात्मक हो गया। अत: अग्निसोमात्मक सृष्टि का पहला मूल आपोमय परमेष्ठी ही बनता है। आपोमय परमेष्ठी में जब स्वयंभू ब्रह्मा प्रविष्ट हो जाते हैं तब ब्रह्माण्ड का उदय होता है—’तत् आण्डं समवत्र्तत’।

ईश्वरतत्त्व अनुमान सिद्ध है। अग्निवेद ऋक्-यजु: व साम ही ज्ञान, क्रिया एवं अर्थ हैं। विश्व क्रियामय है, क्रिया से प्राण का अनुमान होता है तथा प्राण व्यापार बिना इच्छा के संभव नहीं। ज्ञानजन्या भवेत् इच्छा, इच्छाजन्या भवेत् क्रिया, क्रियाजन्यो भवेत् अर्थम् रूप में इच्छा ही कामना है। सृष्टि कामना से ही अप् (पानी) में प्रजनन शक्ति आ जाती है। जिसे जायाबल कहते हैं। सृष्टि हेतु इस जायाबल का अग्निबल में प्रतिष्ठित होना आवश्यक है। इसके लिए क्रिया होने पर पानी में धृति यानी प्रतिष्ठाबल अथवा धाराबल पैदा हो जाता है। इसी से सातों लोकों की सृष्टि होती है। सृष्टि कामना से पानी मातरिश्वा वायु की प्रेरणा से यत् रूप अग्नि प्राण को अपने भीतर में प्रतिष्ठित कर लेता है। सोमरूप जायाबल ही स्त्री का उपादान कारण है। अग्नि पुरुष है। वही शोणित रूप में इस जायाबल से वेष्टित रहता है। अत: जायाबल से आवरित (वेष्टित) शोणित ही स्त्री के प्रजननधर्मा होने का मूल आधार बनता है। यत् रूप अग्नि के गर्भित होने के कारण इसको शोणित अग्नि भी कहते हैं।
सोम ही अग्नि में आहूत होकर पिण्ड बनता है। सूर्य पिण्ड ऋक् है, प्रकाशमण्डल साम है। सूर्य-केन्द्र में रहने वाला प्राणाग्नि पुरुष (यजु:) है। यही मौलिक तत्त्व है। शुक्र (रेत) सोम रूप है, जाया है। स्त्री की तरह पुरुष भी जाया अर्थात् प्रजननधर्मा है। आत्मा का प्रथम प्रवेश पुरुष शरीर के इसी जाया तत्त्व में होता है। यह तत्त्व शरीर की अन्नादि धातुओं के क्रम में सातवीं धातु शुक्र बनता है। शुक्र रूप में आना ही जीव का पहला जन्म है। सृष्टि कामना से पुरुष (नर) शरीर के सभी अंग समग्र रूप में इसी में समाहित होकर शोणित में आहूत होते हैं। शरीर के जिस भाग का समावेश इस जाया तत्त्व (शुक्र) में नहीं होता सन्तान में भी उस अंग की कमी रह जाती है। शुक्र भृगु है। भृगु तीन अवस्थाओं में रहता है—आप, वायु और सोम। सृष्टि सोम से होती है—आप: से नहीं। पानी में मधुर और क्षार दो भाग होते हैं। पानी की बूंद जमीन पर गिरती है तो सोमप्रधान मधुर भाग सजातीय आकर्षण से द्युलोक में जाता है। क्षार भाग पृथ्वी के आकर्षण से सफेद धब्बे के रूप में यहीं रह जाता है। सोम शुक्र का मधुर भाग सृष्टि का उत्पादक है, क्षार भाग आग्नेय होता है।

पानी का जो भाग भृगु रूप नहीं बनता, अथर्वा कहलाता है। यही आगे अंगिरा बनता है। मधुर भाग (भृगु) ही क्षार भाग (अंगिरा) की प्रतिष्ठा है। अंगिरा से अग्नि का विकास होता है। आपोमय परमेष्ठी के भृगु व अंगिरा ऋत है। सूर्य में अंगिरा सत्य हो जाता है। स्वयंभू प्रजापति के तप से उत्पन्न यही ऋत-सत्य (भृगु-अंगिरा) सूर्य के जनक बनते हैं। ऋक्-यत्-जू:-साम (वेदत्रयी), आप:, वायु-सोम (भृगु) और अग्नि, यम, आदित्य (अंगिरा), ये दस तत्त्व मिलकर ही विराट (सन्तान) को उत्पन्न करते हैं। तीनों लोकों भू, भुव: तथा स्व: के जनक बनते हैं।

अध्यात्म संस्था भी अधिदेव की प्रतिकृति है। भृगु का मधुर भाव देव सृष्टि करता है। क्षार भाव पार्थिव सृष्टि करता है। प्रत्येक प्राणी के स्वेद में मधुर, क्षार दोनों ही रहते हैं। इन प्राणों का प्रभाव व्यक्ति के साथ जीवनपर्यन्त बना रहता है। भार्गव प्राण का सम्बन्ध द्युलोक से है तथा अंगिरा प्राण का सम्बन्ध पृथ्वी लोक से है। यह अंगिरा प्राण रुधिर में व्याप्त रहता है। रक्त सम्बन्ध से यही संतानधारा में प्रविष्ट होता है।
क्रमश:
gulabkothari@epatrika.com

अग्नि रूप पांच माताएं—
सौराग्नि (द्युलोक में), पर्जन्याग्नि (अन्तरिक्ष में) पार्थिव अग्नि (पृथ्वी पर), जठराग्नि (अन्न का परिपाक करने वाला) योषाग्नि (स्त्री)

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