scriptUniform Civil Code: Next agenda of the Modi government is UCC | Uniform Civil Code: मोदी सरकार का अगला एजेंडा है समान नागरिक संहिता, उत्तरखंड से शुरुआत, राज्यों में मंथन | Patrika News

Uniform Civil Code: मोदी सरकार का अगला एजेंडा है समान नागरिक संहिता, उत्तरखंड से शुरुआत, राज्यों में मंथन

पीएम मोदी के नेतृत्व में भाजपा की केंद्र सरकार अब कॉमन सिविल कोड लाने की पूरी तैयारी कर चुकी है। स्वतंत्रता के 75 साल पूरे होने पर भाजपा आजादी के अमृत महोत्सव के मौके पर अब देश को एक खास भेंट देने की तैयारी में है। यह भेंट है समान नागरिक संहिता को देश में लागू करना। खुद देश के कानून मंत्री किरण रिजीजू ने ये मान लिया है कि अब उनकी सरकार का प्रमुख एजेंडा है Common Civil Code को लागू करना। देवभूमि उत्तराखंड में इस पर अमल भी शुरू हो गया है।

जयपुर

Published: May 29, 2022 09:49:06 am

समान नागरिक संहिता को लागू करना भाजपा का मुख्य एजेंडा रहा है और पार्टी ने इससे कभी इंकार भी नहीं किया है। पिछली साल दिसंबर में भाजपा नेता निशिकांत दुबे संसद के पटल से यूनिफॉर्म सिविल कोड या Common Civil Code (या CCC) को लागू करने की मांग आजादी के 75 साल पूरे होने के मौके पर कर चुके हैं। अब भाजपा की उत्तराखंड सरकार ने इस मुद्दे पर ठोस कदम आगे बढ़ा दिया है। इस तरह से उत्तराखंड समान नागरिक संहिता (यूनिफॉर्म सिविल कोड या UCC) की दिशा में काम करने वाला देश का पहला राज्य बन गया है। उत्तराखंड की पुष्कर धामी सरकार इसको लागू करने के लिए ड्राफ्टिंग कमेटी गठित कर दी है। धामी सरकार की इस कमेटी में पांच लोग शामिल हैं। बता दें, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपनी पहली कैबिनेट बैठक में ही राज्य में यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) लागू करने का फैसला ले लिया था। इस पर अमल करने के लिए अब उत्तराखंड सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त जज रंजना देसाई की अध्यक्षता में एक्सपर्ट कमेटी का गठन भी कर दिया गया है। इसमें समिति में पूर्व मुख्य सचिव शत्रुघ्न सिंह, दून विश्वविद्यालय की कुलपति सुरेखा डंगवाल, उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश प्रमोद कोहली, टैक्स पेयर एसोसिएशन से सामाजिक कार्यकर्ता मनु गौड़ को शामिल किया गया है। उत्तराखंड की भाजपा के सरकार के इस कदम को अब देश में समान नागिरक संहिता लागू करने की दिशा में पहला बड़ा कदम माना जा रहा है।
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कानून मंत्री ने माना, UCC लागू करने की है तैयारी
बता दें कानून मंत्री किरण रिजीजू का इस बारे में बयान आ गया है। भाजपा सरकार की ओर से पहली बार किसी मंत्री का इस बारे में बयान आया है। कानून मंत्री किरण रिजीजू ने मीडिया से बात करते हुए कहा है कि यूनिफॉर्म सिविल कोड को लाना भाजपा के मुख्य एजेंडा में से एक रहा है और इसे लागू करने के लिए हम कृत संकल्पित हैं। रिजीजू ने कहा कि इस बारे में तैयारी चल रही है और यह कानून जरूर लाया जाएगा।
बता दें उत्तराखंड सरकार की इस कमेटी के लिए मसौदा और निर्देश बिन्दु केंद्रीय कानून मंत्रालय से ही दिए गए हैं। ये साफ संकेत है मॉडल कानून का मसौदा केंद्र सरकार के पास बना हुआ है और केंद्र के स्तर पर भी तैयारी चल रही है।
निशिकांत दुबे ने संसद में उठाया था मुद्दा

भाजपा के तीन बार सांसद रह चुके निशिकांत दुबे ने पिछले दिसंबर में सदन के पटल पर कहा था कि - भारत का बँटवारा 1947 में हिन्दू व मुस्लिम के नाम पर हो गया। आज़ादी के 75 साल बाद देश में संविधान का ऑरटीकल 44 यानि समान नागरिक संहिता लागू होना चाहिए । यही बाबा साहब अंबेडकर जी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
अन्य राज्यों में चल रहा लागू करने पर मंथन

बता दें, सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, यूनिफॉर्म सिविल लागू करने की दिशा में कमेटी को गठित करने का काम अन्य राज्यों उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश आदि राज्यों में शुरू करने पर विचार हो रहा है। मंथन के बाद अन्य राज्यों में भी ये समितियाँ बनाई जा सकती हैं। बता दें, ये राज्य सैद्दांतिक तौर पर समान नागरिक संहिता के लिए पहले ही हामी भर चुके हैं। कमेटी को गठित करने के संदर्भ बिन्दु केंद्र सरकार ने पहले ही दे दिए हैं।

संविधान सम्मत निर्देश है कॉमन सिविल कोड लागू करना

भारत के संविधान के अनुच्छेद 44 में समान सिविल संहिता का उल्लेख मिलता है, जहां राज्य के नीति निर्देशक तत्वों में संविधान में राज्य को कॉमन सिविल कोड के लिए प्रयास करने हेतु निर्देशित किया गया है। आधुनिक भारत में कॉमन सिविल कोड की आवश्यकता प्रतीत होती है, हालांकि इस पर स्पष्ट और खुलकर बातचीत कभी भी नहीं हो पाई क्योंकि इसे विवाद और राजनीति का मुद्दा बना दिया गया है। कॉमन सिविल कोड का अर्थ होता है सभी व्यक्तिगत विधियां एक समान कर दी जाएं। अभी भारत में व्यक्तिगत विधियां अलग-अलग हैं। व्यक्तिगत विधियां उन कानूनों को कहा जाता है जो नागरिकों के निजी मामले को नियमित करते हैं। जैसे कि विवाह, तलाक, भरण पोषण, बच्चा गोद लेना और उत्तराधिकार। यह सभी मामले नागरिकों के व्यक्तिगत मामले है, जिस समय भारत का संविधान बनाया गया तब इन मामलों में भारत के सभी लोगों को उनके धर्म या जाति के रीति-रिवाजों के अनुसार कानून मानने की छूट दी गई।
वर्तमान में सभी संप्रदायों के लिए अपने अपने व्यक्तिगत कानून हैं। जैसे कि हिंदू समुदाय के लिए हिंदू विवाह अधिनियम,1955, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम,1956 इत्यादि उपलब्ध हैं। यह दोनों कानून हिंदुओं के व्यवहार और उनके उत्तराधिकार के मामलों को नियमित करते हैं। इसी तरह मुसलमानों के लिए भी पार्लियामेंट में कुछ कानून बनाए हैं जैसे कि मुस्लिम विवाह तलाक अधिनियम,1939। इस अधिनियम में मुसलमान महिलाओं को अपने पति से तलाक लेने के अधिकार दिए गए हैं। यह अधिनियम भारत की स्वतंत्रता के पूर्व बनाया गया है। इस अधिनियम में तलाक लेने के जो अधिकार दिए गए हैं, वह सभी अधिकार लगभग लगभग हिंदू विवाह अधिनियम की तरह ही हैं। जिस तरह हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 में दिए गए आधारों पर तलाक लिया जा सकता है। इसी तरह मुस्लिम विवाह विघटन अधिनियम, 1939 में दिए गए आधारों पर एक मुस्लिम महिला तलाक ले सकती है। हालांकि मुसलमान पुरुष को तलाक देने के अधिकार पार्लियामेंट द्वारा नहीं दिए गए, अपितु उन्हें अधिकार शरीयत से दिया जाएगा। एक मुसलमान पुरुष के पास शरीयत के अनुसार मुसलमान औरत को तलाक देने के लिए चार से पांच तरीके उपलब्ध हैं। हाल ही में तलाक ए बिदअत जिसे तीन तलाक कहा जाता है को भारत के पार्लियामेंट में प्रतिबंधित कर दिया है। लेकिन अब भी इस्लाम धर्म के अनुयायी व्यक्तिगत विधि के नाम पर चार शादियां कर सकते हैं। ये एक बड़ा विवाद का विषय बना हुआ है। हिंदुओं और कई जनजातियों में भी ऐसी प्रथाएं हैं, जिन पर काफी विवाद की स्थिति बन जाती है। यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू होने से ये सारे मुद्दे एक साथ सुलझ जाएंगे।

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